भारत को अंग्रेजों से स्वतंत्रता प्राप्त किए मात्र २९ वर्ष ही हुए थे कि १९७५ में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश पर आपातकाल थोप दिया। आपातकाल लगाने के पीछे की वजह दिलचस्प है। १२ जून‚ १९७५ को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इंदिरा गांधी के खिलाफ एक फैसला सुनाया। फैसले में १९७१ में हुए लोक सभा चुनाव में विपक्ष के प्रत्याशी राजनारायण के तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पर सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल करने के लगाए गए आरोपों को सही पाते हुए रायबरेली के चुनाव को रद्द कर दिया गया था। कोर्ट ने इंदिरा गांधी को छः वर्षों तक किसी भी तरह का चुनाव लड़ने पर भी रोक लगा दी थी। एक तरफ इंदिरा गांधी कोर्ट में अपने आप को बचाने की लड़ाई लड़ रही थीं तो दूसरी तरफ कांग्रेस सरकार में हो रहे भ्रष्टाचार एवं महंगाई को लेकर जनता में भारी आक्रोश था। उन दिनों बिहार एवं गुजरात में छात्र आंदोलन भी चरम पर था‚ जिसका नेतृत्व पूरे विपक्ष की तरफ से लोकनायक जयप्रकाश नारायण कर रहे थे। २५ जून‚ १९७५ को दिल्ली के रामलीला मैदान में सरकार के खिलाफ एक रैली का आयोजन हुआ था जिसमें अटल बिहारी वाजपेयी‚ चौ. चरण सिंह‚ बीजू पटनायक‚ लालकृष्ण आडवाणी‚ आचार्य जेबी कृपलानी‚ मोरारजी देसाई जैसे दिग्गज नेता इंदिरा गांधी के खिलाफ एकजुट हुए थे। विपक्ष की रैली में उमड़ा जनसैलाब देखकर बौखलाई इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लगाने की घोषणा कर दी।
आपातकाल को जारी रखने का अनुमोदन करने वाला प्रस्ताव संसद के किसी भी सदन द्वारा विशेष बहुमत से पारित किया जाना चाहिए लेकिन २१ महीने तक चले इस आपातकाल को बिना किसी प्रक्रिया के ही बढ़ाने की मंजूरी दी गई थी। न्यायपालिका द्वारा आपातकाल की समीक्षा करने की बात भारतीय संविधान में निहित है। आपातकाल लगाने के पश्चात २२ जुलाई‚ १९७५ को भारतीय संविधान में ३८वां संशोधन कर न्यायपालिका से आपातकाल की समीक्षा करने का अधिकार भी कांग्रेस ने छीन लिया था। आपातकाल के दरम्यान ३९वां संविधान संशोधन भी किया गया। इसके अनुसार न्यायालय राष्ट्रपति‚ उपराष्ट्रपति‚ प्रधानमंत्री और लोक सभा अध्यक्ष से संबंधित मामलों की जांच नहीं कर सकता।
हालांकि १९७७ में जनता पार्टी की सरकार ने पुनः संविधान में संशोधन करते हुए आपातकाल के दौरान निरस्त किए गए न्यायालय के सभी अधिकारों को फिर से बहाल कर दिया था। संविधान में ४२वें संशोधन के माध्यम से संविधान में व्यापक स्तर पर बदलाव किए गए। यह भारतीय इतिहास का सबसे विवादास्पद संशोधन था। इसमें जनता को उसके मौलिक अधिकारों से वंचित रखा गया तथा न्यायालयों की प्रदत्त शक्ति को कम किया गया था। आपातकाल लगाकर जनता के अधिकारों का हनन हुआ। परिवार नियोजन के नाम पर लोगों को जबरन पकड़कर उनकी नसबंदी कर दी गई थी।
आपातकाल के दौरान 26 जून को सरकार ने प्रेस पर सेंसरशिप लागू कर दी। प्रेस अब सरकार के मर्जी के बिना न कुछ लिखेगी‚ न कुछ कहेगी। रेडियो और दूरदर्शन जैसे सरकारी साधन तो पहले से ही सरकार के कब्जे में थे‚ सरकार ने अखबारों के दफ्तरों में अधिकारी बिठा दिए। २९० अखबारों के विज्ञापन रोक दिए गए। अखबारों के दफ्तरों में ब्लैकआउट करवाया गया। आयकर‚ बिजली‚ नगर पालिका के बकाये के भुगतान की आड़ में अखबारों पर छापे डलवाए गए। ‘स्टेट्समैन’ और ‘इंडियन एक्सप्रेस’ जैसे अखबारों ने फिर भी घुटने टेकने से इंकार किया तो इन्हें प्रताडि़त करने का लंबा सिलसिला चला। प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया को भी भंग कर दिया गया। सरकार के विरोध में चले जन–आंदोलन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की व्यापक भागीदारी थी। इसलिए संघ से जुड़ी और उसकी विचारधारा का अनुसरण और अनुपालन करने वाली पत्र–पत्रिकाओं पर सबसे ज्यादा असर हुआ। पांचजन्य‚ आर्गेनाइजर‚ मदरलैंड़ (दैनिक)‚ तरुûण भारत‚ विवेक विक्रम‚ राष्ट्रधर्म‚ युगधर्म इत्यादि को सील कर दिया गया था।
आपातकाल को भारतीय इतिहास में लोकतंत्र के काले अध्याय के रूप में याद किया जाता है। उस समय भी देश और पार्टी को मां–बेटा की जोड़ी चलाते थे और आज ४७ वर्षों के पश्चात भी मां–बेटा ही कांग्रेस को चला रहे हैं।







