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21वीं सदी की वैश्विक आपदा कोविड–19 मनुष्यता को नये तरीके से परिभाषित कर रहा………..

UB India News by UB India News
October 31, 2021
in Lokshbha2024, खास खबर, ब्लॉग, समाज
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21वीं सदी की वैश्विक आपदा कोविड–19 मनुष्यता को नये तरीके से परिभाषित कर रहा………..
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21वीं सदी की वैश्विक आपदा कोविड–19 कोरोना मनुष्यता को नये तरीके से परिभाषित कर रहा है। समानान्तर रूप से मानवता को बचाने और कलंकित करने की नित नई घटनाओं से हम सब परिचित हो रहे हैं। इस आपदा ने हर आयु वर्ग के लोगों के अंदर डर पैदा किया है। सबसे कठिन चुनौतियां वृद्ध जीवन के सामने हैं। एक तरफ वह महामारी से लड़ना पड़ रहा है‚ तो दूसरी तरफ परिजनों के अमानवीय व्यवहार से।

भारतीय समाज में बुजुर्गों के प्रति सम्मान की एक लम्बी परम्परा रही है‚ जिसका संबंध हमारी श्रेष्ठ संस्कृति से है। कोई भी समाज सिर्फ एक ही आयु वर्ग के लिए नहीं होता है‚ लेकिन बदलते हुए समय और समाज में वृद्ध जीवन की चुनौतियां निरन्तर बढ़ती जा रही हैं। हमारा समाज भी वृद्धों को लेकर बहुत उदारता का परिचय नहीं दे रहा है। इसका सत्यापन सूचनाओं और अनुभवों के आधार पर होता रहता है। कोरोना ने वृद्धों की तुलना में युवाओं के स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने की सोच को बल दिया है। यह मनुष्य के नैसर्गिक अधिकार की भावनाओं के विरु द्ध है। बुजुर्गों के प्रति उदासीनता और एक हद तक हमारी जीवन शैली में बदलाव का दुःखद परिणाम है। भारतीय संस्कृति और परंपरा में बुजुर्गों के सम्मान को शीर्ष पर रखा गया है। वैश्वीकरण ने वृद्धावस्था को एक हद तक अनुपयोगी और हाशिये में परिवर्तित कर दिया है। मनुष्य की जिजीविषा सर्वविदित है।

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हमारी सामाजिक संरचना और जनतांत्रिक व्यवस्था में उम्रगत कोई भेदभाव नहीं किया गया है। इस आपदा ने उपयोगी और अनुपयोगी के बीच एक विभाजक रेखा खींच दी है। बुजुर्ग अनुपयोगिता के दंश के साथ जीने के लिए अभिशप्त हो रहे हैं। हम एक ऐसे वातावरण का निर्माण कर रहे हैं जहां बुजुर्गों के लिए कोई जगह नहीं है। कोरोना के दूसरे फेज में कई अस्पतालों में वृद्ध लोगों की जगह युवाओं को इलाज के लिए प्राथमिकता दी गई। वृद्ध जीवन की मृत्यु की शर्त पर किसी युवा के जीवन की तलाश कितना अमानवीय हैॽ यह चिंता और चिंतन‚ दोनों का विषय है। दुनिया में पांच ऐसे देश हैं‚ जहां ६५ वर्ष से अधिक उम्र के बुजुर्गों की संख्या सर्वाधिक है। जापान में बुजुर्गों की संख्या २८ फीसद वहीं इटली में २३ फीसद‚ फिनलैंड में २२ फीसद‚ पुर्तगाल २१ फीसद एवं ग्रीस में २१ फीसद है। जापान दुनिया का इकलौता देश है‚ जहां बुजुर्गों के लिए अलग से मिनिस्ट्री ऑफ लोनलीनेस बनाया गया है।

भारत में बुजुर्गों की बदहाली चिंतनीय है। सरकारी योजनाओं और सामाजिक संस्थानों के शिथिल और अदूरदर्शी कदम बुजुर्गों का कितना भला करेंगे‚ यह और भी चुनौतीपूर्ण है। आज समाज में आम धारणा बनती जा रही है कि बुजुर्गों ने तो अपना जीवन जी लिया‚ युवाओं को अवसर मिलना चाहिए। यह एक खतरनाक किस्म की वैचारिकी की शुरु आत है। मनुष्य की उपयोगिता के आधार पर जीवन की प्राथमिकता तय करना बाजार की शर्त हो सकती है‚ मनुष्यता की कतई नहीं। मानवीय जिजीविषा और त्याग के द्वंद्व में जीत हमेशा जिजीविषा की होती है क्योंकि त्याग भी तभी संभव है जब जीवन की उपस्थिति हो। जीवन का सांध्य वृद्धों के लिए कलरव संगीत नहीं है। तब तो और भी नहीं है‚ जब उसका जीवन उपयोगितावाद की कसौटी पर खड़ा होता है। असमर्थ बुजुर्गों की हालत को इस महामारी ने और भी बदतर बना दिया हैं। आर्थिक रूप से कमजोर बुजुर्गों के सामने कई तरह की चुनौतियां हैं। आर्थिक संसाधनों की कमी की वजह से सबसे ज्यादा समझौता बुजुर्गों को ही करना पड़ता है। खानपान से लेकर वस्र‚ दवा‚ मनोरंजन सबमें कटौती की मार झेलनी पड़ती है। कोरोना महामारी ने ऐसे बुजुर्गों की हालत को और भी बदतर बना दिया है। इस कोरोना काल में कई बुजुर्ग घर से बाहर अभी तक निकले ही नहीं हैं‚ या निकलने नहीं दिए गए हैं। भय और सुरक्षा के दृष्टिकोण से शायद यह सही भी है‚ लेकिन बुनियादी सुविधाओं से दूर होकर जिंदगी जिंदगी रह पाती है क्याॽ हताश और निराश बुजुर्गों के सामने आशा का हर कोना अंधेरे में तब्दील हो चुका है। कई परिवारों में बुजुर्ग अकेले जीवन–यापन करने के लिए अभिशप्त हैं। कोरोना ने हमारी स्वास्थ्य सुविधाओं की असलियत पर से पर्दा हटा दिया है। आपदाओं की मार सबसे ज्यादा हाशिये पर पड़े बुजुर्गों पर ही पड़ती है। हर बार की तरह इस बार भी महामारी ने बुजुर्गों की दुनिया को ही ज्यादा बदरंग किया है। समय के साथ इस वैश्विक आपदा से भी हम सब मुक्त हो जाएंगे‚ लेकिन बुजुर्गों की उजड़ती दुनिया को कौन बसा पाएगाॽ

यह सिर्फ प्रश्न नहीं है अपितु जीवन को नये तरीके से देखने का विवेक पैदा करता है। कोविड–१९ से हमने इतना तो सीख ही लिया है कि भौतिक लिप्सा की अंधी दौड़ में आदमी अकेला पड़ जाता है। मनुष्यता का सौंदर्य सामूहिकता में है। संबंधों की मर्यादा और सम्मान में ही मनुष्यता का भविष्य सुरक्षित है। अनर्थकारी और हाहाकारी आपदा के तांडव के बीच हमें मनुष्यों की जीवटता पर आदिम विश्वास रखना ही होगा। मानवीय सहयोग–साहचर्य के पवित्र मंत्रों को याद करके ही हम इस आपदा में बुजुर्गों की दुनिया को सुरक्षित और खुशहाल रख सकते हैं।

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