प्रशांत में ऑस्ट्रेलिया‚ भारत‚ जापान और अमेरिका देशों के बीच बने (क्वाड्रिलैटरल सिक्योरिटी डायलॉग) अर्थात ‘चतुर्भुज सुरक्षा संवाद’ के एक ठोस स्वरूप धारण करने के पश्चात अब एक ‘नया क्वाड’ खाड़ी क्षेत्र में तैयार करने की प्रस्तावना लिखी जा चुकी है। इसके तहत भारत‚ इस्राइल‚ अमेरिका और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने पश्चिम एशिया सहित एशिया में प्रमुख आर्थिक वैश्विक एवं सम सामयिक मुद्दों पर मिलकर समय के साथ काम करने का निर्णय लिया है। इससे समुद्री सुरक्षा पर घनिष्ठ सहयोग के साथ ही एक नये भू–राजनीतिक‚ भू–आर्थिक तथा सामरिक समीकरण का नया मार्ग प्रशस्त हो गया है।
इन चारों देशों के विदेश मंत्रियों की पहली बैठक वर्चुअल माध्यम से विगत १८ अक्टूबर सोमवार को देर रात को आरंभ हुई। भारतीय विदेश मंत्री डॉक्टर एस. जयशंकर ने उस समय इस्राइल की यात्रा पर होने के कारण तेल अवीव से इस बैठक में अपनी सहभागिता की। इसमें इस्राइल के विदेश मंत्री याईर लैपिड‚ अमेरिका के विदेश मंत्री एंटोनी ब्लिंकन तथा संयुक्त अरब अमीरात के विदेश मंत्री शेख अब्दुल्लाह बिन जायद ने भाग लिया। विदेश मंत्रियों ने आपस में मिलकर आर्थिक सहयोग‚ जलवायु परिवर्तन से मुकाबला‚ ऊर्जा सहयोग एवं सामुद्रिक सुरक्षा संबंधित सामाजिक तथा ज्वलंत मुद्दों पर विचार विमर्श किया। यद्यपि इस संगठन को कूटनीतिक दृष्टिकोण से एक नये बनेे ‘क्वाड’ के रूप में देखा जा रहा है‚ किन्तु सभी चार देशों ने इस संगठन को ‘क्वाड’ नाम से चिह्नित नहीं करने का निर्णय लिया हुआ है और इस संगठन को ‘अंतरराष्ट्रीय फोरम’ के रूप में बताया गया है। यद्यपि इस संगठन का एजेंडा बहुत हद तक हिंद प्रशांत क्षेत्र में ऑस्ट्रेलिया‚ अमेरिका‚ जापान तथा भारत द्वारा स्थापित ‘क्वाड’ संगठन जैसा स्वरूप ही है। इस प्रमुख बैठक में सभी चारों देशों के विदेश मंत्रियों ने आधुनिक संचार प्रौद्योगिकी के माध्यम से लोगों को आपसी मेल–मिलाप बनाए रखने के साथ कोविड–१९ महामारी के इस दौर में सार्वजनिक स्वास्थ्य के मामले में समर्थन देने के विषय पर चर्चा की गई। वास्तव में यह तथाकथित ‘नया क्वाड’ मूल रूप से चीन की विस्तारवादी नीति से मुकाबला करने के लिए मात्र केंद्रित नहीं है‚ बल्कि इसके साथ ही इसमें सामूहिक सशक्त साझा एवं समाहित लक्ष्य का अभाव भी नजर आ रहा है। इसके बावजूद यह भारतीय विदेश नीति की लक्ष्य पूर्ति में सक्रिय सहयोग देने वाला अवश्य सिद्ध हो सकता है। इस व्यवस्था द्वारा भारत को विश्व मंच पर अपनी भूमिका का विस्तार करने‚ मध्य पूर्व के देशों के साथ निकटता से संपर्क साधने और अमेरिका के साथ सहयोग को सशक्त और सक्षम बनाने पर विशेष बल मिलेगा।
इसके साथ ही यह भी सत्य है कि भू–कूटियोजनात्मक दृष्टि से मध्य पूर्व क्षेत्र का विशेष महत्व है। यह अपने ऊर्जा आयात पर अत्याधिक निर्भर करता है और फारस की खाड़ी में लगभग ९ लाख से अधिक भारतीय श्रमिक कार्य कर रहे हैं। इस्राइल और भारत परस्पर सबसे प्रमुख और महkवपूर्ण सहयोगी रहे हैं। इस्राइल इस समय भारत के शीर्ष प्रमुख रक्षा आपूर्तिकर्ताओं में से एक है। पाकिस्तान तुर्की के साथ बढ़ती दोस्ती भी नये गठजोड़ की ओर बढ़ रही है‚ उस पर अंकुश लगाने के लिए यह भारत और पश्चिम एशिया में ‘नया क्वाड’ महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में कार्य करेगा। यह भारत और पाकिस्तान के संबंधों को सामान्य और संतुलित बनाने में सक्रिय सहयोग देगा।
उल्लेखनीय है कि भारत‚ यूएई और इस्राइल के साथ ‘इंडो अब्राहम’ समझौते की सोच सबसे पहले वॉशिंगटन स्थित मिस्र के निवासी दूरदर्शी कूटनीतिक मोहम्मद सोलीमन की देन थी। भारत विगत वर्ष सितम्बर‚ २०२० में वाशिंगटन में तथाकथित अब्राहम समझौते के अंतर्गत इस्राइल और अरब देशों के बीच अपने संबंधों को सामान्यीकरण करने की रणनीति के तहत कार्य कर रहा है। वास्तव में पश्चिम एशिया के इस नये समीकरण को अभी अलग–अलग रूप में विश्लेषित किया जा रहा है‚ किंतु यह बात निर्विवाद रूप से सत्य है कि कूटनीति‚ राजनीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के संदर्भ में कोई भी किसी भी देश का स्थायी मित्र या स्थायी शत्रु नहीं होता है। समय‚ स्वार्थ एवं परिस्थितियों के आधार पर भू–राजनीति‚ भू–कूटनीति‚ भू–आर्थिक तथा भू–रणनीतिक व्यवस्था में भी भूचाल (जोरदार बदलाव) आने की संभावना से कदापि इनकार नहीं किया जा सकता है।
निःसन्देह आर्थिक और सामाजिक समीकरण स्वार्थ और समय के साथ बदलते हैं। आखिरकार‚ अमेरिका चीन की चुनौती को बड़ी गंभीरता से लेकर अनेक गठबंधन और नई व्यवस्था बनाने पर जोर क्यों दे रहा हैॽ अमेरिका अब चीन और इस्राइल के बीच दूरियां बढ़ाने के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रयास में लगा हुआ है। इस्राइल और भारत के सामरिक संबंधों को प्रगाढ़ होता देखने में अमेरिका का अपना स्वार्थ नजर आता है। चूंकि चीन और इस्राइल के बीच बहुत बड़ी व्यापारिक साझेदारी है। चीन विश्व स्तर पर इस्राइल का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार और पूर्वी एशिया में सबसे बड़ा व्यापारिक सहयोगी रहा है। अमेरिका एक ओर जहां मध्य पूर्व में विमुद्रीकरण करता है तो दूसरी ओर वहां चीनी आक्रमण का मुकाबला करने के लिए हिंद प्रशांत क्षेत्र की ओर भी निरंतर सतर्क निगाहें लगाए हुए है। संयुक्त अरब अमीरात और इस्राइल के चीन के साथ अच्छे संबंध हैं।
इस कारण यह नया संगठन अमेरिका को अप्रत्यक्ष रूप से हितकारी नजर आ रहा है। दूसरी ओर इस्राइल ने बहरीन के साथ कूटनीतिक संबंध बनाए हैं। समसामयिक एवं वैश्विक स्तर पर चर्चित इस अंतरराष्ट्रीय फोरम ‘नया क्वाड’ की प्रथम बैठक उस समय आयोजित हुई‚ जब यूएई तथा इस्राइल अब्राहम समझौते की प्रथम वर्षगांठ मना रहे थे। इस करार की सुढ़ता एवं प्रभावी कार्यकुशलता कुछ समय पश्चात ही प्रमाणित हो सकेगी। जहां एक ओर भारत अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रमुख देश के रूप में उभरा है‚ वहीं क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता में भारत को संयम एवं सूझ–बूझ के साथ काम करना होगा। अपने सामरिक और सामयिक सहयोग नये स्तर पर ले जाने की चुनौती भी भारत के समक्ष है। चूंकि प. एशिया अनेक संघर्ष से गुजर रहा है‚ ऐसे में इसके भंवर जाल में फंसने से भी अपने आप को सुरक्षित रखना होगा और इस क्षेत्र की चुनौती और चेतावनी को बेअसर बनाने के लिए अब असरदार सिद्ध करना होगा।
इस करार की सुदृढ़ता एवं प्रभावी कार्यकुशलता कुछ समय पश्चात ही प्रमाणित हो सकेगी। जहां एक ओर भारत अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रमुख देश के रूप में उभरा है‚ वहीं क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता में भारत को संयम एवं सूझ–बूझ के साथ काम करना होगा। अपने सामरिक और सामयिक सहयोग नये स्तर पर ले जाने की चुनौती भी भारत के समक्ष है। चूंकि पश्चिम एशिया अनेक संघर्ष से गुजर रहा है‚ ऐसे में इसके भंवर जाल में फंसने से भी अपने आप को सुरक्षित रखना होगा॥







