मीडिया किस तरह से खबर प्रेषित हैॽ किस तरह से वह लोगों द्वारा पढी जाती हैॽ किस स्पीड से लोगों तक पहुंचती है और कैसी प्रतिक्रिया पैदा करती हैॽ ऐसे सवालों के जवाब पाने हों तो इंदौर में पीटे गए चूडी वाले मुसलमान युवक तस्लीम की कहानी को देखें जो टीवी से लेकर अखबारों तक और सोशल मीडिया में अपने अनेक पाठों के साथ छाई रही है।
इंडियन एक्सप्रेस (२८ अगस्त‚ २०२१) की खबर को मानें तो इंदौर के गोविंद नगर में चूडी वाले तस्लीम को भीड ने पीटा तो पीटने से पहले आपस में कहा कि ‘बोंबे बाजार का बदला लो’! इंदौर के ‘बोंबे बाजार’ की कहानी‚ चूडीवाली कहानी से पांच दिन पहले बनी थी‚ जो इस प्रकार थीः ‘बोंबे बाजार’ में दो लडकियां एक हिंदू युवक के साथ जा रही थीं। कुछ मुस्लिमों ने समझा कि वे उनके समुदाय की लडकियां हैं‚ जिनको हिंदू लिये जा रहा है। उन्होंने लडÃकियों व युवक को पीट दिया। पुलिस को हस्तक्षेप करना पडा। असल में दोनों लडकियां दलित वर्ग से थीं‚ लेकिन मुस्लिमों के शक का कारण वह शादी थी जो कुछ पहले हुई थी जिसमें एक हिंदू युवक ने एक मुस्लिम लडकी से हिंदू रीति से शादी कर ली थी। इसे ‘रिवर्स लव जिहाद’ कहा गया।
अब चूडी वाले युवक की कहानी को लें। वीडियो में चूडी वाले को कुछ लोग पीटते नजर आते हैं। उस पर आरोप रहा कि चूडी पहनाने के बहाने किसी हिंदू लडकी को छेड रहा था। ‘चूडी कल्चर’ आम स्त्री के श्रृंगार और सुहाग का चिह्न है। हिंदू–मुसलमान सभी औरतें चूडी पहनने की शौकीन होती हैं। चूडी बेचने–पहनाने का काम अरसे से मुसलमान करते आए हैं। बचपन में हमने यह तक देखा है कि एक खास सीजन में चूडी वाले गली–मुहल्लों में फेरी लगाते थे और वे हिंदू घरों के अंदर आकर औरतों को चूडि़यां पिन्हाते थे। जहां औरतें चूडी पहना करतीं‚ वहां घर के मर्दों का आना वर्जित होता‚ लेकिन किसी चूडी वाले द्वारा किसी औरत को छेडने की घटना हमें तो याद नहीं आती। कलाई भर चूडी पहने स्त्री सुहागिन और भाग्यवान मानी जाती है। बहुत से फिल्मी गाने चूडियों को सेलिब्रेट करते हैं जैसे किः मेरे हाथों में नौ नौ चूडियां हैं.’ ‘बिंदिया चमकेगी चूडी खनकेगी.’ ‘चूडी नहीं मेरा दिल है देखो देखो टूटे ना.’ ‘चूडी’ स्त्रियों की अखिल भारत की पॉपूलर कल्चर है। शादी ब्याह या अन्य उत्सवों में बच्चियां और स्त्रियाँ बडे चाव से चूडियां पहनती ही हैं। शादी पर ‘चूडा’ चढाया जाता है। बेटा होने पर हरी–हरी चूडियां पहनी जाती हैं‚ और बहुत सी चूडियां चालू फैशन के हिसाब से भी पहनी जाती हैं। चूडी पहनाने वाले घरों में आते तो घर में उत्सव का सा माहौल होता। वे साइज देखने के लिए औरतों के कलाई पकडते‚ उन पर चूडी चढाते‚ टाइट होने पर उतार कर नये साइज की चढाते। मगर कोई स्त्री शिकायत नहीं करती थी कि इस चूडी वाले ने मुझे ‘छेडा’ है‚ लेकिन इंदौर में चूडी वाले पर यही आरोप लगा कि उसने ‘छेडा’ है। क्या पता कि उसने ‘छेडा’ हो या क्या पता कि लडकी को लगा हो कि उसे ‘छेडा’ जा रहा है‚ या क्या पता यह बाद की राजनीतिक कहानी हो जो केस बनाने के लिए गढी गई हो! यों भी ये दिन ‘चूडी के दुश्मन दिन’ हैं‚ और चूडी पहनाने की कोशिश कानूनन रिस्की है‚ जिसे न तो चूडी वाला तसलीम जानता था‚ न वह लडकी जानती होगी लेकिन राजनीति करने वाले जरूर जानते हैं। ‘नया रेप विरोधी कानून’ कहता है कि चौदह सेकेंड़ से अधिक किसी स्त्री को देखना ‘घूरने’ जैसा अपराध है‚ जिसकी सजा जेल ‘विदाउट बेल’ है। ऐसे में किसी औरत की कलाई को पकड चूडी पहनाना तो और बडा अपराध नजर आता है। अब इसे ‘बोंबे बाजार’ की खबर के कारण बने उस जुमले के साथ पढिए‚ जिसमें एक समुदाय के लोग आपस में कहते हैं कि ‘बोंबे बाजार का बदला लो’! इस ‘हेट कहानी’ का ‘सच’ क्या हैॽ कोई नहीं जानता और शायद ही जान पाए क्योंकि इन दिनों खबर का पाठक ही उसके ‘अर्थ’ तय करता है‚ और कौन किस खबर को किस तरह से पढता है‚ इसी से उसके मानी तय होते हैं। जाहिर है कि ऐसी कोई भी खबर मीडिया के ‘पाठ’ को लेकर नये–नये प्रश्न उठाती है‚ जिनके जवाब इन दिनों के ‘मीडिया–पाठ्यक्रम’ नहीं देते। समझना होगा कि मीडिया की संप्रेषण प्रकिया न ‘सीधी और सरल’ होती है‚ न ‘मासूम’। यह भी कि हर खबर एक राजनीतिक माहौल बनाती है‚ और उसी में पढी जाती है। चूडीवाले की कहानी भी उसी विभक्त माहौल में पढी गई जो मीडिया ने बनाया है।







