देश में 1 जुलाई 2024 से लागू भारतीय न्याय संहिता Bharatiya Nyaya Sanhita , BNS 2023 ने भारतीय दंड संहिता IPC की जगह ली है। नई संहिता में कई अपराधों को नए स्वरूप में शामिल किया गया है। इनमें धारा 152 सबसे चर्चित प्रावधानों में से एक है। यह धारा भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालने वाले कृत्यों को अपराध घोषित करती है। एक बात और है कि इस धारा ने पुराने आईपीसी की राजद्रोह यानी Sedition से जुड़ी संबंधी धारा 124A की जगह एक नया कानूनी ढांचा प्रस्तुत किया है।
BNS की धारा 152 क्या कहती है?
धारा 152 के अनुसार यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर या उद्देश्यपूर्वक शब्दों, लेखन, संकेतों, दृश्य प्रस्तुति, इलेक्ट्रॉनिक संचार, वित्तीय साधनों या अन्य किसी माध्यम से अलगाववाद, सशस्त्र विद्रोह, विध्वंसकारी गतिविधियों को बढ़ावा देता है या भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालता है, तो वह इस धारा के तहत अपराध का दोषी होगा।
यह प्रावधान हिंसा भड़काने या राष्ट्र की एकता को कमजोर करने वाले संगठित प्रयासों को रोकने के उद्देश्य से बनाया गया है। हालांकि कानून यह भी स्पष्ट करता है कि सरकार की नीतियों की वैध और शांतिपूर्ण आलोचना, यदि उससे हिंसा या अलगाववाद को बढ़ावा नहीं मिलता, तो मात्र उसी आधार पर अपराध नहीं बनती। इसलिए प्रत्येक मामले में न्यायालय उपलब्ध तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर निर्णय करेगा।
BNS की धारा 152 के तहत दोषी पाए जाने पर यानी कोई जो भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालने का अपराधी है तो उसे आजीवन कारावास या 7 साल तक की कैद और साथ में जुर्माने की सजा मिलती है।
BNS की धारा 152, देशहित से कैसे जुड़ी है ?
गौरतलब बात है कि धारा 152 का मूल उद्देश्य भारत की राष्ट्रीय एकता और संवैधानिक व्यवस्था की रक्षा करना है। यदि कोई गतिविधि देश को तोड़ने, अलगाववाद को बढ़ावा देने, हिंसक विद्रोह के लिए लोगों को उकसाने या राष्ट्र की संप्रभुता को कमजोर करने का प्रयास करती है, तो यह धारा लागू हो सकती है। आधुनिक समय में सोशल मीडिया, डिजिटल प्लेटफॉर्म और ऑनलाइन अभियानों के माध्यम से भी ऐसी गतिविधियां संचालित हो सकती हैं। इसलिए कानून में इलेक्ट्रॉनिक संचार को भी स्पष्ट रूप से शामिल किया गया है। यह प्रावधान राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
धारा 152 तब लागू होगी जब कथित कृत्य का उद्देश्य या प्रभाव अलगाववाद, सशस्त्र वि द्रोह या भारत की संप्रभुता एवं अखंडता को खतरे में डालने वाली बात हो। सरकार की नीतियों के खिलाफ वैध और शांतिपूर्ण तरीके से असहमति जताना और स्वस्थ आलोचना करना न तो अपराध है और न इस दायरे में आता है।
क्या आलोचना करना अपराध है?
BNS की धारा 152 और IPC की धारा 124A में क्या अंतर है?
पुरानी IPC की धारा 124A को राजद्रोह (Sedition) कानून के रूप में जाना जाता था। BNS लागू होने के बाद उसकी जगह धारा 152 लाई गई। नए प्रावधान में केवल सरकार के प्रति असंतोष व्यक्त करने के बजाय भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालने वाले कृत्यों पर अधिक जोर दिया गया है। और माना यह गया है कि यह बदलाव सरकार-केंद्रित दृष्टिकोण से हटाकर राष्ट्र-केंद्रित दृष्टिकोण की ओर ले जाता है।
नागरिकों के लिए भी अपनी सीमाएं जानना भी जरूरी
बात यह है कि आज के डिजिटल युग में सूचनाएं तेजी से फैलती हैं और सोशल मीडिया का प्रभाव व्यापक है। ऐसे में कोई भी सामग्री यदि हिंसा, अलगाववाद या राष्ट्रविरोधी गतिविधियों को बढ़ावा देती है, तो उसके गंभीर कानूनी परिणाम हो सकते हैं। इसलिए नागरिकों के लिए यह समझना आवश्यक है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राष्ट्र की सुरक्षा के बीच कानूनी सीमाएं क्या हैं।







