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गोवंस के बांझ बनाने के कारण और समाधान पर राष्ट्रीय स्तर पर बेविनार का आयोजन

UB India News by UB India News
August 13, 2021
in Lokshbha2024, कृषि, खास खबर, समस्तीपुर
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सम्पूर्ण ब्रह्मांड में आज पर्यावरण और खाद्य सुरक्षा, की चिंता के दो प्रमुख विषय हैं। यह कोई आज की ही बात नहीं है , यह अत्यंत प्राचीन काल से ही मानव समाज के लिए चिंतनीय विषयों में सबसे अग्रणी स्थान पर स्थापित रहा हैं। किसी भी कालखंड में समाज का प्रबुद्ध वर्ग पर्यावरण और खाद्य सुरक्षा की चिंता प्रमुखता से उठाता रहा है। अपने देश का वैदिक वांग्मय दीर्घ काल पृथ्वी पर गौवंस को ही मानव जीवन का प्रमुख आधार बताया है। प्राचीन भारत के पवित्र एवं विश्व के सबसे प्राचीन साहित्य वेदों इसके बावत स्पस्ट उल्लेख है कि गौवंस से ही सबका पालन संभव है और इसको ही अभिव्यक्त करने के लिए पौराणिक आख्यानों में पृथ्वी को गाय के रूप में दिखाया गया। यही कारण भी था कि प्राचीन काल से ही देश में गौपालन की एक समृद्ध परंपरा रही थी। गाय हमारे जीवन का हिस्सा थी। जन्म से लेकर विवाह और मृत्यु तक में गाय को शामिल किए बिना कोई कार्य संपन्न नहीं होता था। आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधानों से आज यह स्पष्ट हो चला है कि शाकाहार और गाय आधारित जीवन शैली ही विश्व के पर्यावरण और खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित कर सकता है।

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इसके बारे में ऋग्वेद के 6.48.13 में कहा गया है की ‘भरद्वाजायव धुक्षत द्विता। धेनुंच विश्वदोहसमिषं मिषं च विश्वभोजसम्‌॥ यानी प्रत्यक्ष में तो गायें केवल दूध देती हैं परंतु परोक्ष में ‘गोआधारित जैविक कृषि द्वारा’ विश्व को भोजन प्रदान करती है।
इसी प्रकार ऋग्वेद 1.29.6 में कहा है –पता॑ति कुंडृ॒णाच्या॑ दू॒रं वातो॒ वना॒दधि॑ ,आ तू न॑ इंद्र शंसय॒ गोष्वश्वे॑॥ यानी सहस्रों गौओं और अश्वों पर आधारित अनेक प्रकार के धनों से समृद्ध जीवन शैली से विध्वंस करने वाले झंझावत दूर के वनों में चले जाते हैं।
ऋग्वेद 8.72.12 में कहा गया है की –वशामेवामृतमाहुर्वशां मृत्युमुपासते। वशेदं सर्वमभवद्‌ देवा मनुष्या असुरा: पितर ऋषय: ॥ यानी जहां वनों में गौएं साथ साथ रह कर अपनी रक्षा करती हैं, वहां की भूमि जल से व्याप्त हो कर आर्द्रता को समेट कर रखती है। प्रकृति की शक्ति अनश्वर है। यह शक्ति प्रकृति को गौ से प्राप्त होती है। उनके नष्ट होने से प्रकृति का भी नष्ट होना अनिवार्य है और प्रकृति मत्र्य हो जाती है। गौआधारित समाज में प्रकृति समान रूप से देवता स्वरूप मनुष्यों, असुरों, पितरों, ऋषियों आदि सभी का आधार बनती है।
इस विषय पर ऋग्वेद का मंत्र है ” गावं उपावतावतं महीयज्ञस्य रप्सुदा। उभा कर्णा हिरण्यया।। यानी जहां गोपालन होता है वहां की भूमि में आद्र्रता बनी रहती है। वहां के निवासी इतने समृद्ध होते हैं कि वे कानों में सोने के कुण्डल पहनते हैं।

यह तो रही प्राचीन और पौराणिकता गौवंस के बारे में , इसी प्रथा को आगे बढाते हुए भारत में बड़े स्तर पर इसकी महता को प्राथमिकता देते हुए राष्ट्रीय कामधेनु आयोग का गठन केंद्र सरकार ने 6 फरवरी, 2019 को किया । दरसल इस नाम के पीछे कुछ प्राचीन ग्रंथों में गाय को सभी इच्छाओं को पूरा करने वाली “कामधेनु” कहा गया है। कहा तो ये भी जाता है कि इसके सींग भगवान के प्रतीक हैं तो चार पैर, हिंदू वेद ग्रंथों के मुताबिक जीवन के चार उद्देश्यों के प्रतीक हैं। ये उद्देश्य हैं धन, इच्छाएं, पवित्रता और मोक्ष। हिंदू धार्मिक परंपराओं और कथाओं में गाय को पवित्र माना गया है। गाय का संबंध हिंदुओं के भगवान शिव से जोड़ा जाता है तो कहीं इसे भगवान कृष्ण का करीबी माना जाता है। विश्व भर में केवल भारतवर्ष की ही संस्कृति सृष्टि के आदि काल से जीवित है तो इसका मुख्य कारण भारतवर्ष की गौ-संरक्षण और शाकाहारी आहार व्यवस्था ही है।

भगवत पुराण के अनुसार, सागर मन्थन के समय पाँच दैवीय कामधेनु ( नन्दा, सुभद्रा, सुरभि, सुशीला, बहुला) निकलीं। कामधेनु या सुरभि (संस्कृत: कामधुक) ब्रह्मा द्वारा ली गई। दिव्य वैदिक गाय (गौमाता) ऋषि को दी गई ताकि उसके दिव्य अमृत पंचगव्य का उपयोग यज्ञ, आध्यात्मिक अनुष्ठानों और संपूर्ण मानवता के कल्याण के लिए किया जा सके।
इसका एक और मुख्य कारण है वास्तविक रूप में देखे तो गाय केवल दूध देने वाली पशु ही नहीं है बल्कि, चार पैरों पर चलता-फिरता पूरा विज्ञान है। इसी विज्ञान की खोज में आम जन से ख़ास जन तक दिन प्रति दिन अपने अपने स्तर से खोज प्रक्रिया जारी रखे हुए है। इसके लिए राष्ट्रीय स्तर से लेकर ग्रामीण स्तर तक शोध अनुसंधान प्रक्रिया जारी है। आज कोरोना की वैश्विक महामारी को देखते हुए देश के वरिष्ठ शोधार्थियों द्वारा अपने अनुसंधान विवेचना और अनुभवों को साझा करने के लिए तकनीकी की सहायता से एकीकृत होकर बेविनार के रूप में दुनिया के समक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है ।

वेबीनार में भाग लेते हुए पूसा कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ सतीश चंद्र श्रीवास्तव , मिथिला दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ लि के प्रबंध निदेशक धर्मेंद्र श्रीवास्तव एवं सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक आर एस चौहान

इसी कड़ी में मिथिला दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ लिमिटेड की ओर से गोवंश के बांझ बनने के कारण एवं समाधान विषय पर सेवा शिक्षण संस्था एवं बेल्ट्रॉन के सहयोग से वेबीनार का आयोजन किया गया । जिसका मूल विषय था गोवंस के बांझ बनाने के कारण और समाधान जिसमे देश के जाने माने वैज्ञानिक , शिक्षाविद एवं प्रबन्धकीय दक्षता से सम्पन्न महान विभूतियों ने भाग लिया । इस वेबीनार की अध्यक्षता राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय पूसा के कुलपति डॉ आर सी श्रीवास्तव ने की । उनके साथ विशेष अतिथि के रूप में गौ सेवा आयोग हरियाणा के अध्यक्ष श्रवण कुमार गर्ग , भारत के सुप्रसिद्ध प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ आर एस चौहान ने मुख्य वक्ता के रूप में अपने विचार रखे । उनके साथ साथ सेवा शिक्षण संस्थान (न्यास) के अध्यक्ष विषय प्रबोधक वैद्य राजेश कपूर , पूर्व प्रिंसिपल वैज्ञानिक डॉ डीके सजाना , मिथिला दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ लिमिटेड के प्रबंध निदेशक धर्मेंद्र श्रीवास्तव एवं मॉडरेटर इंजीनियर श्री रमेश कुमार ने भाग लेकर अपने अपने विचारों से सबको रूबरू कराये । इस बेविनार का आयोजन सेवा शिक्षण संस्थान (न्यास), बेल्ट्रॉन ग्रीन एनर्जी लिमिटेड, मिथिला दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ लिमिटेड समस्तीपुर, सुभाष सकलानी के द्वारा किया गया था ।

रविवार 8 अगस्त को आयोजित इस वैबिनार के मुख्य विषय “गोवंश के बाँझ बनने के कारण तथा समाधान” पर ध्यान केन्द्रित करते हुए वक्ताओं के माध्यम से यह बात स्पष्ट रूप से उभर कर सामने आई कि कृत्रिम गर्भाधान, विदेशी गोवंश के साथ संकरीकरण, विदेशी सीमन तथा गऊ ओं के कारण भारत का करोड़ों गोव॔श बाँझ और नकारा बना है। आहार तथा दशाओं के रसायनों से भी भारतीय गौवंश बाँझ बना है।

वेबीनार में भाग लेते हुए वैद्य राजेश कपूर , गौ सेवा आयोग हरियाणा के अध्यक्ष श्रवण कुमार गर्ग, पूर्व प्रिंसिपल वैज्ञानिक डॉ डीके सजाना , इंजीनियर श्री रमेश कुमार

वैबिनार के विषय प्रबोधक वैद्य राजेश कपूर तथा सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक आर एस चौहान ने इस विषय के ऊपर बहुत स्पष्ट रूप से जानकारी दी।  उन्होंने कहा कि आज से 75 साल पहले देश की आबादी जब 35 करोड़ थी गोवंश की आबादी 100 करोड़ थी । आज जब देश की आबादी 133 करोड़ है और गोवंश की संख्या लगभग 20 से 30 करोड़ है । इसका एक महत्वपूर्ण कारण कृत्रिम गर्भधान का सही से और सही समय पर नहीं होना भी है । अतः हमें फिर से देसी गोपालक एवं देसी गायों को भी प्राकृतिक तरीके से नस्ल सुधार के तरफ जाने की आवश्यकता है ।

आयोजन की अध्यक्षता कर रहे पूसा के कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ सतीश चंद्र श्रीवास्तव जी ने कहा कि जानकारी आंखें खोलने वाली है। उन्होंने आश्वासन दिया कि वे इस विषय पर काम करने के लिए पूर्ण सहयोग प्रदान करेंगे। उन्होंने कहा की उत्तर बिहार के लिए बाढ़ एक विभीषिका है । बाढ़ के समय पशु एवं पशुपालक परिवार सड़कों पर रहने को मजबूर हो जाते हैं । ऐसे में पशुपालकों को गर्भवती महिलाओं एवं उनके परिवार के अन्य सदस्यों के जीवन पर क्या असर पड़ता है इस पर डॉ श्रीवास्तव में अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि उस वक्त पीने का साफ पानी कि उपलब्धता सुनिश्चित करने के साथ उनके गौधन को सुरक्षित और निरोगी रखने के लिए विशेष ध्यान देने की आवश्यकता होगी।

बिहार के सबसे बड़े दुग्ध उत्पादक संघ के प्रबंध निदेशक धर्मेंद्र श्रीवास्तव  ने भूमि में पर रसायनिक खेती के प्रभावों के विषय में बाताया।  श्री श्रीवास्तव जो पिछले 1 वर्ष से गोबर एवं गोमूत्र के मुख्य संवर्धन कार्यक्रम में लगे हुए हैं उन्होंने इसकी उपयोगिता एवं महत्व पर विस्तार से बताया साथ-साथ गोबर एवं गोमूत्र से देशी खाद बनाकर खेतों में उसी को व्यवहार करना ज्यादा लाभकारी होगा । उन्होंने इस पर जोर देते हुए बताया कि रासायनिक उर्वरक के प्रयोग से खेत की मिट्टी निष्क्रिय हो रही है । उसका गुण संवर्धन देशी विधि जिसको आज ऑर्गेनिक के नाम से ज्यादा प्रचारित किया गया है वो व्यवहार में लाने एवं खेती के लागत खर्च को कम करने पर अपने विचार व्यक्त किए ।

इस वेबीनार की अध्यक्षता कर रहे राजेंद्र प्रसाद कृषि विश्वविद्यालय पूसा के कुलपति डॉ सतीश चंद्र श्रीवास्तव के साथ डॉ आर एस चौहान ने भी इस विषय पर अनेक वैज्ञानिक प्रमाण दिए। विशेष अतिथि गौ सेवा आयोग हरियाणा के अध्यक्ष  श्रवण कुमार गर्ग ने हरियाणा में चल रहे हो सेवा के अनेक महत्वपूर्ण कार्यों की जानकारी दी। पूर्देव प्रिंसीपल वैज्ञानिक देवेंद्र कुमार सदाना ने भी संगोष्ठी को सम्बोधित किया।

इस बेविनार में देश भर के लगभग डेढ़ सौ श्री विद्वानों, गोपालको तथा प्रतिभागियों के द्वारा भाग लिया गया जिसमे सबका मत था की ऐसा उपयोगी वेबीनार इससे पूर्व कभी आयोजित नहीं हुआ था ।

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