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क्या किसानों का आंदोलन अब अपनी साख खो चुका है?

UB India News by UB India News
January 31, 2021
in Lokshbha2024, कृषि, खास खबर, राष्ट्रीय
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लाल किला का डरावना मंजर: प्रदर्शनकारियों ने कैसे वहां झंडा फैराया
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दिल्ली के सिंघू बॉर्डर पर शुक्रवार को एक प्रदर्शनकारी ने तलवार से एक सीनियर पुलिस अफसर पर हमला कर दिया। हमले के बाद खून से लथपथ अफसर की तस्वीर को लेकर पूरे देश में गुस्सा है। यह हमला 26 जनवरी को मचे उस उपद्रव के तीन दिन बाद हुआ जिसमें राष्ट्रविरोधी तत्वों ने लाल किले पर चढ़कर तिरंगे का अपमान किया था और पुलिसवालों को चोट पहुंचाने के लिए तेज रफ्तार ट्रैक्टरों और तलवारों का इस्तेमाल किया था।

बहादुर पुलिस अफसर, अलीपुर के एसएचओ प्रदीप पालीवाल पर शुक्रवार को जिस व्यक्ति ने तलवार से हमला किया, वह पंजाब के नवांशहर का रहने वाला रंजीत सिंह है। वह एक हिंसक भीड़ का हिस्सा था । उस वक्त आसपास के गांवों के लोग प्रदर्शनकारियों से मांग कर रहे थे कि वे सिंघू बॉर्डर से चले जाएं, और थोड़ी ही देर में हालात इतने बिगड़ गए कि दोनों तरफ से पत्थरबाजी होने लगी।

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SHO प्रदीप पालीवाल हालात को काबू करने के लिए अपने साथियों संग वहां पहुंचे थे। वह लोगों को समझा रहे थे, लेकिन तभी एक टेंट से निकल कर दंगाई हाथ में नंगी तलवार लेकर बैरीकेड्स के पीछे से आया और सीधा पुलिस टीम पर हमला कर दिया। लोग कुछ समझ पाते, इससे पहले ही रंजीत सिंह ने SHO पालीवाल पर तलवार से कई वार कर दिए। प्रदीप पालीवाल का हाथ कई जगह से कट गया, और उनकी हथेली से खून की धार बहने लगी। इंडिया टीवी के संवाददाता कुमार सोनू से बात करते हुए प्रदीप पालीवाल ने कहा कि पुलिस पर हमला सतनाम सिंह पन्नू और सरवन सिंह पंढेर के कहने पर हुआ। ये दोनों नेता वहां मौजूद लोगों को हमले के लिए उकसा रहे थे।

अब इसमें शक की कोई गुंजाइश नहीं रहनी चाहिए कि हिंसा की इन घटनाओं को पन्नू और पंढेर जैसे स्वयंभू किसान नेताओं की शह पर अंजाम दिया जा रहा है। ये नेता अभी भी किसानों के शीर्ष नेतृत्व का हिस्सा हैं। 26 जनवरी को लाल किले पर हुई घटनाओं को लेकर इन दोनों नेताओं पर पहले से ही देशद्रोह के आरोप लगे हैं। अगर किसान संगठनों के नेता इन लोगों को सपोर्ट नहीं करते, इन्हें अपराधी मानते हैं, तो किसानों के आंदोलन में सतनाम सिंह पन्नू और सरवन सिंह पंढेर के टेंट क्यों लगे हैं?

शुक्रवार को सिर्फ एक ही पुलिस अफसर का खून नहीं बहा था। विभिन्न जगहों पर इस तरह के हमलों में कई पुलिसवाले घायल हुए। नरेला के SHO पर भी तलवार से हमला हुआ, उनके हाथ में भी चोट आई, लेकिन चूंकि वहां मौके पर पुलिसकर्मियों की संख्या ज्यादा थी इसलिए उन्हें बचा लिया गया। उन्हें हॉस्पिटल ले जाया गया, और प्राथमिक उपचार के बाद नरेला के SHO फिर ड्यूटी पर पहुंच गए। पत्थरबाजी के जरिए भी पुलिस को निशाना बनाया गया जिसमें एक IPS अफसर घायल हो गए।

तनाव तब शुरू हुआ जब दोपहर को आसपास के इलाकों के 200 से भी ज्यादा गांववाले तिरंगा लेकर प्रदर्शन स्थल पर पहुंच गए। उन्होंने मांग की कि प्रदर्शनकारी बॉर्डर को खाली कर दें। नारेबाजी करने के बाद भीड़ पुलिस का घेरा तोड़कर धरना स्थल तक पहुंच गई। प्रदर्शनकारी किसानों ने भी तलवारों और लाठियों से हमला बोल दिया जिसके बाद पुलिस को लाठीचार्ज करनी पड़ी और आंसू गैस के गोले दागने पड़े। ग्रामीणों को आखिरकार पुलिस ने वहां से हटाया और तब कहीं जाकर शांति बहाल हुई।

रिपोर्टर्स ने आसपास के गावों में रहने वाली कई बुजुर्ग महिलाओं से बात की। उन्होंने कहा कि जब से आंदोलन चल रहा है, तब से गांव की बहू-बेटियों का घर से निकलना मुश्किल हो गया है। इन बुजुर्ग महिलाओं ने कहा कि किसानों के बीच में अपराधी घुसे हैं, ये लोग रात में आसपास के गावों में घूमते हैं, नशा करते हैं, छेड़खानी और भद्दे कमेंट्स कसते हैं। अगर किसानों के आंदोलन के नाम पर ऐसी हरकतें हो रही हैं तो कौन समझदार शख्स इसे बर्दाश्त करेगा? ये गांववाले पिछले दो महीनों से प्रदर्शनकारी किसानों को पानी, दूध, फल और सब्जियां पहुंचा रहे थे, लेकिन अब वे नाराज हैं और चाहते हैं कि किसान बॉर्डर छोड़कर चले जाएं।

ऐसी खबरें हैं कि किसानों के नेता धरना छोड़कर वापस लौट रहे अपने समर्थकों को हाथ जोड़कर रोक रहे हैं क्योंकि इससे आंदोलन धीमा पड़ जाएगा, लेकिन वे रुकने को तैयार नहीं हैं। मीडिया के लोगों को कैमरों के साथ टेंट के पास जाने नहीं दिया जा रहा है। ऐसी भी खबरें हैं कि अधिकांश टेंट खाली हो गए हैं और समर्थक पंजाब में अपने घरों के लिए रवाना हो गए हैं। इंडिया टीवी की रिपोर्टर विजयलक्ष्मी को कई टेंट्स में कैमरे का इस्तेमाल करने से रोक दिया गया। उन्होंने आसपास के दुकानदारों से बात की तो पता चला कि अधिकांश किसान 26 जनवरी के दंगे के बाद वहां से जा चुके हैं।

ऐसे ही हालात दिल्ली के टिकरी बॉर्डर पर भी हैं, जहां आस-पास के गावों में रहने वाले लोगों ने विरोध-प्रदर्शन किया। उन्होंने मांग की कि आंदोलन कर रहे किसान रविवार तक वहां से चले जाएं, नहीं तो 36 गांवों के लोग आएंगे और प्रदर्शनकारियों को हटाएंगे। प्रदर्शनकारियों का विरोध करने वालों में महिलाएं भी शामिल थीं, जिन्होंने आरोप लगाया कि प्रदर्शनकारी शाम के वक्त शराब पीकर हंगामा करते हैं और महिलाओं के साथ छेड़खानी करते हैं। महिलाओं ने कहा कि प्रदर्शनकारियों के चलते आसपास के लोगों का जीना दूभर हो गया है। हरियाणा-राजस्थान सीमा स्थित शाहजहाँपुर में भी ऐसे ही हालात हैं जहां स्थानीय ग्रामीण आंदोलनकारियों से लगातार मांग कर रहे हैं कि वे अब चले जाएं।

सिंघु और टिकरी बॉर्डर पर भले ही हंगामा हो रहा हो, लेकिन गाज़ीपुर बॉर्डर पर हालात बिल्कुल अलग हैं। यहां भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत ‘धरने’ पर बैठे हुए हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों ने मुजफ्फरनगर में हुई एक महापंचायत में फैसला किया कि वे गाजीपुर में विरोध प्रदर्शन को फिर से शुरू करेंगे। गुरुवार की शाम राकेश टिकैत ने रो-रोकर जिस तरह अपनी बात दुनिया का सामने रखी, उसने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसानों को फिर से लामबंद कर दिया है और वे अब टिकैत के साथ हैं।

शुक्रवार को राष्ट्रीय लोकदल के नेता अजित सिंह ने राकेश टिकैत से फोन पर बात की और उन्हें अपना समर्थन दिया। उनके बेटे जयंत चौधरी गाजीपुर गए और टिकैत से मिले। आम आदमी पार्टी के नेता मनीष सिसोदिया भी गाजीपुर गए और टिकैत के साथ अपनी एकजुटता दिखाई।

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए चेतावनी दी कि अगर किसानों की समस्या का हल नहीं निकला, तो आंदोलन दूसरे शहरों में भी फैल जाएगा जिससे अस्थिरता पैदा होगी। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार किसानों के विरोध और आंदोलन को कुचलने की कोशिश कर रही है। राहुल गांधी ने अपने उन्हीं आरोपों को दोहराया कि प्रधानमंत्री पांच बिजनेसमेन के इशारे पर काम कर रहे हैं और उन्हीं के कहने पर सरकार पहले नोटबंदी, फिर जीएसटी, और अब तीनों कृषि कानून लेकर आई है।

तमाम नेताओं की बयानबाजी के बीच पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की तरफ से सुलझा हुआ बयान आया। उन्होंने किसान नेताओं से कृषि कानूनों के विवाद को सुलझाने के लिए केंद्र के साथ बैठकों में भाग लेने की अपील की। कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कहा, 26 जनवरी को हुई हिंसा के चलते ‘आंदोलन ने अपनी साख खो दी है।’ साथ ही उन्होंने चेतावनी दी कि यदि समस्या का हल नहीं निकला तो इससे पंजाब में अशांति फैल सकती है और यही पाकिस्तान का एजेंडा है।

शिरोमणि अकाली दल के प्रमुख सुखबीर सिंह बादल ने आरोप लगाया कि बीजेपी स्थानीय ग्रामीणों की आड़ में अपने कार्यकर्ताओं को आंदोलनकारी किसानों को हटाने के लिए भेज रही है। बादल ने अपने पार्टी कैडर को प्रदर्शनकारी किसानों की ताकत को बढ़ाने और बीजेपी की चुनौती का मुकाबला करने के लिए सिंघू, टिकरी और गाजीपुर बॉर्डर पर पहुंचने के लिए कहा।

मैंने इन सारे नेताओं के बयान देखे। ऐसा लगता है कि किसान आंदोलन का समर्थन कम होता देखकर किसान संगठनों के नेता जितने परेशान नहीं हैं उससे कहीं ज्यादा राहुल गांधी और सुखबीर सिंह बादल जैसे नेता परेशान हैं। किसानों के धरना स्थल से लौटने से वे परेशान हो गए हैं। यही वजह है कि वे अब किसानों के आंदोलन को तेज़ करने के लिए अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को लामबन्द करने की कोशिश कर रहे हैं।

जब तक किसानों का आंदोलन अपने पूरे जोर पर था, और सरकार किसानों से बातचीत में लगी हुई थी, ये नेता बहुत खुश थे कि मोदी सरकार धरने से परेशान है। इन नेताओं को एक अच्छी सियासी फसल की उम्मीद थी, लेकिन आंदोलन की साख कम होते देख अब उन्हें लग रहा है कि बाजी उनके हाथ से फिसल रही है। बेहतर होगा कि राहुल गांधी किसानों के आंदोलन पर अपनी ही पार्टी के नेता कैप्टन अमरिंदर सिंह के बातों को सुनें, लेकिन मुश्किल ये है कि वह इसे समझने के लिए तैयार नहीं हैं।

जहां तक किसान नेताओं का सवाल है, वे दिन गए जब वे किसी सियासी लीडर द्वारा धरनास्थल के मंच पर आने की किसी भी कोशिश का कड़ाई से विरोध कर रहे थे। उन्होंने जानबूझकर नेताओं को अपने आंदोलन से दूर रखा था। लेकिन शुक्रवार को धरना स्थलों पर अलग-अलग राजनीतिक दलों के नेताओं के आने के साथ ही किसानों के आंदोलन को राजनीति से दूर रखने का उनका वादा अब हवा हो गया है। किसानों का आंदोलन अब अपनी साख खो चुका है। गणतंत्र दिवस पर हुई हिंसा और तिरंगे के अपमान के कारण आम जनता ने किसानों के आंदोलन में अपना विश्वास खो दिया है। किसान नेता आज चौराहे पर खड़े हैं। वे नहीं जानते कि अब आगे किस रास्ते पर चलना है।

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