बिहार विधान परिषद की 9 सीटों के द्विवार्षिक चुनाव और एक सीट पर उपचुनाव को के लिए चुनाव 18 जून को होना है और नामांकन की अंतिम तिथि 8 जून है. राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) ने अपने अधिकांश उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है. बीजेपी (BJP) ने चार और जेडीयू (JDU) ने चार उम्मीदवार उतारे हैं. वहीं, चिराग पासवान की पार्टी LJPR ने भी अपने उम्मीदवार के नाम का ऐलान कर दिया है. मौजूदा संख्या बल के आधार पर NDA को नौ में से आठ या नौ सीटें मिलने की संभावना जताई जा रही है. लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि विपक्षी खेमे की ओर से तेजस्वी क्या करेंगे? वहीं, एनडीए खेमे की ओर से उपेंद्र कुशवाहा अपने बेटे दीपक प्रकाश का मंत्री पद बचाने के लिए क्या जुगत करेंगे?
दरअसल, NDA की तस्वीर लगभग साफ होने के बाद अब राजनीतिक नजरें महागठबंधन पर टिक गई हैं. विपक्षी खेमे के पास संख्या बल ऐसा नहीं है कि वह एक से अधिक उम्मीदवार को आसानी से जिता सके. ऐसे में राष्ट्रीय जनता दल के सामने सबसे बड़ी चुनौती एक ऐसे उम्मीदवार का चयन करना है जो सहयोगी दलों को भी स्वीकार्य हो. आरजेडी विधानसभा में विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी है, लेकिन विधान परिषद चुनाव की गणित उसे सहयोगी दलों पर निर्भर बनाती है. कांग्रेस, वाम दलों और अन्य सहयोगियों के समर्थन के बिना जीत का रास्ता आसान नहीं है. यही वजह है कि उम्मीदवार चयन केवल संगठनात्मक नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश का भी मामला बन गया है.
तेजस्वी यादव के आगे ‘एक अनार और सौ बीमार’ वाली स्थिति
महागठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल ने अब तक अपने पत्ते नहीं खोले हैं. विधान परिषद के मौजूदा संख्या बल के गणित को देखें तो विपक्ष के खाते में केवल एक ही सीट आती दिख रही है. नियम के अनुसार, एक एमएलसी उम्मीदवार को सीधे जीत दर्ज करने के लिए कम से कम 28 विधायकों के प्रथम वरीयता के समर्थन की आवश्यकता होती है. राजद के पास वर्तमान में अपने केवल 25 विधायक हैं. ऐसे में विपक्ष के इकलौते उम्मीदवार को जिताने के लिए तेजस्वी यादव को कांग्रेस और असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम (AIMIM) के विधायकों के समर्थन की सख्त जरूरत होगी. इस इकलौती सीट के लिए राजद के भीतर दावेदारों की लंबी कतार लग गई है, जिससे तेजस्वी यादव के लिए किसी एक नाम पर मुहर लगाना बेहद पेचीदा हो गया है.
क्या करेंगे तेजस्वी? सामाजिक समीकरण साधने का दबाव
राजद के भीतर इस इकलौती सीट के लिए अल्पसंख्यक, सवर्ण और अति पिछड़ा वर्ग के कई कद्दावर नेता लॉबिंग कर रहे हैं. तेजस्वी यादव के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे किस वर्ग को प्राथमिकता दें. यदि वे किसी मुस्लिम चेहरे को उतारते हैं तो ओवैसी की पार्टी का समर्थन मिलना आसान हो सकता है, लेकिन इससे अन्य वर्गों में नाराजगी का डर रहेगा. सामाजिक समीकरण की चुनावी रणनीतियों और सहयोगी दलों के दबाव और अपने विधायकों को एकजुट रखने की दोहरी चुनौती के बीच तेजस्वी यादव फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं.
राजद की इकलौती सीट, तेजस्वी के सामने बड़ी चुनौती
दरअसल, राजद की इस इकलौती सुरक्षित सीट के लिए दावेदारों की सूची में दो ऐसे हाई-प्रोफाइल नाम जुड़ गए हैं, जिन्हें टालना तेजस्वी यादव के लिए सबसे मुश्किल काम साबित हो रहा है. पार्टी सूत्रों के अनुसार, इस रेस में लालू प्रसाद यादव की बेटी रोहिणी आचार्य और लालू परिवार के संकटमोचक माने जाने वाले बिस्कोमान के पूर्व चेयरमैन सुनील सिंह का नाम सबसे आगे चल रहा है. खास बात यह कि सुनील सिंह को पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी अपना मुंहबोला भाई भी कहती हैं. इन दो दिग्गजों की दावेदारी ने आरजेडी के भीतर ‘एक अनार और सौ बीमार’ वाली स्थिति को और अधिक पेचीदा और दिलचस्प बना दिया है.
रोहिणी आचार्य को सदन भेजने का पारिवारिक दबाव
सारण लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने के बाद रोहिणी आचार्य बिहार की सक्रिय राजनीति में पूरी तरह स्थापित हो चुकी हैं. लालू प्रसाद यादव को किडनी डोनेट करने के बाद से ही वे समर्थकों और परिवार के बीच बेहद भावुक और मजबूत चेहरा बनी हुई हैं. पार्टी का एक बड़ा धड़ा चाहता है कि रोहिणी आचार्य को विधान परिषद भेजकर सदन में आरजेडी की आवाज को और आक्रामक बनाया जाए.
सुनील सिंह: वफादारी का इनाम या सवर्ण कार्ड?
दूसरी तरफ, सुनील सिंह की दावेदारी भी बेहद मजबूत कही जदा रही है. वे पहले भी विधान परिषद के सदस्य रह चुके हैं और वे पार्टी के सबसे बड़े आर्थिक एवं सांगठनिक स्तंभों में से एक हैं. राजपूत (सवर्ण) समाज से आने वाले सुनील सिंह को दोबारा मौका देकर तेजस्वी यादव सवर्णों के बीच एक सकारात्मक संदेश देना चाहते हैं. सवर्ण वोट बैंक को साधने और लालू परिवार के प्रति उनकी सालों की वफादारी का इनाम देने के लिए सुनील सिंह का पलड़ा बेहद भारी माना जा रहा है. लेकिन एक ही सीट होने के कारण सुनील सिंह और रोहिणी के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं है.
किसे चुनेंगे तेजस्वी? सामाजिक न्याय बनाम इंटरनल बैलेंस
इस इकलौती सीट के लिए फैसला लेने के लिए तेजस्वी यादव के पास अब बहुत कम समय बचा है. उनके सामने एक तरफ रोहिणी आचार्य का पारिवारिक दबाव है, तो दूसरी ओर सुनील सिंह जैसे जमीनी रणनीतिकार की वफादारी. एआईएमआईएम का प्रेशर अलग से है. ऐसे में अब देखना यह होगा कि तेजस्वी यादव इस सियासी चक्रव्यूह से निकलने के लिए कौन सा फॉर्मूला अपनाते हैं-क्या वे अपनों पर दांव लगाएंगे या किसी तीसरे चेहरे को लाकर आंतरिक असंतोष को शांत करेंगे. सूत्रों की मानें तो वे कांग्रेस और वामपंथी दलों के शीर्ष नेताओं से चर्चा के बाद ही आखिरी समय में कोई चौंकाने वाला नाम सामने ला सकते हैं.
उपेंद्र कुशवाहा के रुख पर भी सस्पेंस बरकरार
वहीं, एनडीए गठबंधन का हिस्सा होने के बावजूद राष्ट्रीय लोक मोर्चा के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा की चुप्पी भी कई सियासी कयासों को जन्म दे रही है. जेडीयू, बीजेपी और लोजपा (आर) द्वारा अपने कैंडिडेट घोषित किए जाने के बाद वे मुश्किल में हैं. सूत्रों से खबर है कि कुशवाहा अपने दीपक प्रकाश को सदन भेजने की जुगत में हैं और इसके लिए वे बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व पर लगातार दबाव बना रहे हैं. ऐसे में सवाल यह है कि क्या बीजेपी अपने चार कैंडिडेट्स में से किसी एक का नाम वापस ले लेगी?
अगले 48 घंटे के घटनाक्रम पर टिकी नजर
नामांकन की समय सीमा नजदीक है, ऐसे में आज और कल का दिन बिहार की राजनीति के लिए बेहद महत्वपूर्ण रहने वाला है. RJD को अपने उम्मीदवार का नाम घोषित करना है और NDA के भीतर का पेच भी सुलझना बाकी है. ऐसे में फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या तेजस्वी यादव सभी सहयोगियों को साधते हुए सर्वसम्मति वाला उम्मीदवार उतार पाएंगे और क्या उपेंद्र कुशवाहा NDA से अपनी राजनीतिक अपेक्षाओं के अनुरूप जगह हासिल कर पाएंगे.







