मोदी जी बिहारियों को चूना लगाना चाहते हैं, लेकिन ये बिहार है, यहां खैनी के साथ चूना रगड़ा जाता है… वोटर अधिकार यात्रा के दौरान सासाराम में तेजस्वी यादव का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर दिया गया उनका यह बयान न केवल हास्य, व्यंग्य और तंज से भरा था, बल्कि लालू प्रसाद यादव की पुरानी देसी शैली की याद दिला रहा है. पिता लालू यादव की मौजूदगी में तेजस्वी यादव का यह अंदाज चर्चा के केंद्र में है. इस पर चर्चा इसलिए क्योंकि वर्ष 2015 के बाद तेजस्वी यादव ने अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश की थी, लेकिन इस बार वह लालू यादव की सियासी शैली को पूरी तरह अपनाते दिखे. सवाल यह कि राजनीति में एक दशक बिताने के बाद क्या तेजस्वी यादव अब पिता लालू यादव की शैली अपनाने को क्यों मजबूर हो रहे हैं? पार्टी और परिवार से बेदखल किये गए बड़े भाई तेज प्रताप यादव के बिहार में बढ़ते सियासी दखल पर वह अलर्ट तो नहीं हैं? क्या लालू शैली की राह 2025 बिहार विधानसभा चुनाव की रणनीति इसके पीछे हो सकती है?
2015 के बाद तेजस्वी की अलग राह!
बता दें कि वर्ष 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में महागठबंधन की जीत के बाद तेजस्वी उपमुख्यमंत्री बने तो उस समय उन्होंने लालू यादव की दबंग और देसी छवि से हटकर एक आधुनिक, शिक्षित और गंभीर नेता की छवि बनाने की कोशिश की. सोशल मीडिया पर उनकी सक्रियता, नीतीश कुमार के साथ गठबंधन में संयमित बयानबाजी और बिहार के विकास पर फोकस उनकी इस नई शैली का हिस्सा था. पिछले दस सालों में तेजस्वी यादव ने राजनीतिक जीवन में कई उतार-चढ़ाव भी देखे हैं. वर्ष 2015 में उपमुख्यमंत्री बनने से लेकर 2017 में गठबंधन टूटने, 2020 में विपक्ष के नेता के रूप में उभरने और 2022 में महागठबंधन की सरकार में फिर से उपमुख्यमंत्री बनने तक, उनकी सियासी परिपक्वता बढ़ी. लेकिन 2024 में जेडीयू (JDU) के एनडीए (NDA) में लौटने से राजद (RJD) को झटका लगा. इसके बाद तेजस्वी यादव ने इस दौरान बेरोजगारी, शिक्षा और बाढ़ जैसे मुद्दों पर आक्रामक रुख अपनाया, लेकिन उनका लालू यादव जैसा देसी अंदाज कम ही दिखा. लेकिन, सासाराम का खैनी-चूना वाला उनका बयान इस शैली में बदलाव का संकेत है.
लालू यादव की शैली क्यों अपना रहे?
सासाराम में तेजस्वी यादव का दिया गया बयान लालू यादव की सियासी किताब से निकला हुआ लगता है. राजनीति के जानकारों का मानना है कि बदलाव रणनीतिक है. दरअसल, 2025 विधानसभा चुनाव नजदीक है और RJD को अपने कोर वोटर बेस-यादव, मुस्लिम और EBC समुदायों को मजबूत करना है. लालू यादव की देसी शैली, हास्य और तंज बिहार के ग्रामीण और छोटे शहरों के वोटरों से सीधा कनेक्शन बनाते हैं. तेजस्वी यादव का यह अंदाज BJP और JDU के खिलाफ आक्रामक रुख दिखाने की रणनीति भी हो सकती है. वहीं, कुछ विशेषज्ञ इस बदलाव को तेजस्वी यादव की मजबूरी भी बता रहे हैं. दरअसल, लालू यादव के चारा घोटाले में सजा, कई अन्य मामलों में केस ट्रायल, लालू परिवार के कई सदस्यों पर लटक रही कानूनी कार्रवाई की तलवार और कांग्रेस की आक्रामकता के बीच सियासी तौर पर राजद की डंवाडोल स्थिति ने तेजस्वी यादव को लालू शैली अपनाने पर मजबूर किया है.
तेजस्वी यादव के इस बदले अंदाज के पीछे उनके भाई तेजप्रताप यादव का डर भी एक वजह हो सकती है. दरअसल, हाल के दिनों में तेज प्रताप यादव की अप्रत्याशित राजनीतिक सक्रियता और उनका लालू यादव के अंदाज में जनता के आगे प्रस्तुत होना भी तेजस्वी यादव के इस बदलाव का कारण हो सकता है. दरअसल, तेज प्रताप यादव के हाल के बयानों और आरजेडी के कई जमीनी कार्यकर्ताओं पर उनके (तेज प्रताप का) बढ़ते प्रभाव ने भी तेजस्वी यादव के लिए चुनौती खड़ी की है. तेजप्रताप यादव पिता लालू यादव की तरह देसी शैली में जनता से मिलते हैं और कई बार लोगों के बीच उनका प्रभाव भी दिखता है. संभव है कि इसकी काट के लिए भी तेजस्वी यादव ने लालू यादव की तरह जनता से सीधे जुड़ने की रणनीति अपनाई हो सकती है.
तेजस्वी यादव के आगे यह है बड़ी चुनौती
दरअसल 2025 का विधानसभा चुनाव तेजस्वी यादव के लिए करो या मरो की लड़ाई है. लालू यादव की शैली अपनाकर वह ग्रामीण बिहार को लुभा सकते हैं, लेकिन भारतीय जनता पार्टी और एनडीए के अन्य दलों की आक्रामक रणनीति और नीतीश कुमार की शालीन छवि और सुशासन सरकार के साथ सियासी चतुराई तेजस्वी यादव के लिए चुनौती हैं. तेजस्वी का लालू यादव जैसा अंदाज बिहार की सियासत में नई हलचल ला रहा है. बीजेपी और जेडीयू की नीतीश सरकार पर बेरोजगारी और महंगाई जैसे मुद्दों पर तेजस्वी यादव का यह देसी तंज आरजेडी के वोटर बेस को एकजुट कर सकता है. सासाराम में तेजस्वी यादव का यह बयान दिखाता है कि तेजस्वी यादव अब पिता लालू यादव के रास्ते पर चलकर राजद कार्यकर्ताओं और नेताओं को नई ऊर्जा देना चाहते हैं, लेकिन तेजप्रताप के साथ उनके रिश्ते और पार्टी में आंतरिक एकता उनकी सफलता की कुंजी होगी.
क्या बदलेगा बिहार का सियासी समीकरण?
लालू यादव की मौजूदगी और उनकी सियासी विरासत तेजस्वी यादव को लालू यादव के रास्ते पर लौटने के लिए प्रेरित कर रही है, क्योंकि लालू यादव का देसी अंदाज हमेशा से राजद की ताकत रही है. ऐसे में तेजस्वी का यह अंदाज दो पहलुओं की ओर संकेत करता है. एक यह कि तेजस्वी यादव न केवल लालू की विरासत को आगे बढ़ाते दिख रहे हैं, बल्कि बिहार की जनता से उनकी गहरी कनेक्टिविटी बिठाने का प्रयास भी बता रहा है. उनके बयानों में हास्य, व्यंग्य, तंज और बिहारीपन की ठसक का मिलाजुला रूप लालू यादव की शैली की याद दिलाता है. यह जनता से जुड़ने और उनकी लोकप्रियता के लिए सकारात्मक हो सकता है. हालांकि, लालू यादव की छवि से बहुत ज्यादा जुड़ना तेजस्वी यादव के लिए जोखिम भरा भी हो सकता है, क्योंकि नई पीढ़ी के वोटर आधुनिक और प्रगतिशील नेतृत्व की उम्मीद करते हैं. ऐसे में तेजस्वी यादव को देसी और आधुनिक शैली का संतुलन बनाना होगा.
मोदी जी बिहारियों को चूना लगाना चाहते हैं, लेकिन ये बिहार है, यहां खैनी के साथ चूना रगड़ा जाता है… वोटर अधिकार यात्रा के दौरान सासाराम में तेजस्वी यादव का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर दिया गया उनका यह बयान न केवल हास्य, व्यंग्य और तंज से भरा था, बल्कि लालू प्रसाद यादव की पुरानी देसी शैली की याद दिला रहा है. पिता लालू यादव की मौजूदगी में तेजस्वी यादव का यह अंदाज चर्चा के केंद्र में है. इस पर चर्चा इसलिए क्योंकि वर्ष 2015 के बाद तेजस्वी यादव ने अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश की थी, लेकिन इस बार वह लालू यादव की सियासी शैली को पूरी तरह अपनाते दिखे. सवाल यह कि राजनीति में एक दशक बिताने के बाद क्या तेजस्वी यादव अब पिता लालू यादव की शैली अपनाने को क्यों मजबूर हो रहे हैं? पार्टी और परिवार से बेदखल किये गए बड़े भाई तेज प्रताप यादव के बिहार में बढ़ते सियासी दखल पर वह अलर्ट तो नहीं हैं? क्या लालू शैली की राह 2025 बिहार विधानसभा चुनाव की रणनीति इसके पीछे हो सकती है?
2015 के बाद तेजस्वी की अलग राह!
बता दें कि वर्ष 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में महागठबंधन की जीत के बाद तेजस्वी उपमुख्यमंत्री बने तो उस समय उन्होंने लालू यादव की दबंग और देसी छवि से हटकर एक आधुनिक, शिक्षित और गंभीर नेता की छवि बनाने की कोशिश की. सोशल मीडिया पर उनकी सक्रियता, नीतीश कुमार के साथ गठबंधन में संयमित बयानबाजी और बिहार के विकास पर फोकस उनकी इस नई शैली का हिस्सा था. पिछले दस सालों में तेजस्वी यादव ने राजनीतिक जीवन में कई उतार-चढ़ाव भी देखे हैं. वर्ष 2015 में उपमुख्यमंत्री बनने से लेकर 2017 में गठबंधन टूटने, 2020 में विपक्ष के नेता के रूप में उभरने और 2022 में महागठबंधन की सरकार में फिर से उपमुख्यमंत्री बनने तक, उनकी सियासी परिपक्वता बढ़ी. लेकिन 2024 में जेडीयू (JDU) के एनडीए (NDA) में लौटने से राजद (RJD) को झटका लगा. इसके बाद तेजस्वी यादव ने इस दौरान बेरोजगारी, शिक्षा और बाढ़ जैसे मुद्दों पर आक्रामक रुख अपनाया, लेकिन उनका लालू यादव जैसा देसी अंदाज कम ही दिखा. लेकिन, सासाराम का खैनी-चूना वाला उनका बयान इस शैली में बदलाव का संकेत है.
लालू यादव की शैली क्यों अपना रहे?
सासाराम में तेजस्वी यादव का दिया गया बयान लालू यादव की सियासी किताब से निकला हुआ लगता है. राजनीति के जानकारों का मानना है कि बदलाव रणनीतिक है. दरअसल, 2025 विधानसभा चुनाव नजदीक है और RJD को अपने कोर वोटर बेस-यादव, मुस्लिम और EBC समुदायों को मजबूत करना है. लालू यादव की देसी शैली, हास्य और तंज बिहार के ग्रामीण और छोटे शहरों के वोटरों से सीधा कनेक्शन बनाते हैं. तेजस्वी यादव का यह अंदाज BJP और JDU के खिलाफ आक्रामक रुख दिखाने की रणनीति भी हो सकती है. वहीं, कुछ विशेषज्ञ इस बदलाव को तेजस्वी यादव की मजबूरी भी बता रहे हैं. दरअसल, लालू यादव के चारा घोटाले में सजा, कई अन्य मामलों में केस ट्रायल, लालू परिवार के कई सदस्यों पर लटक रही कानूनी कार्रवाई की तलवार और कांग्रेस की आक्रामकता के बीच सियासी तौर पर राजद की डंवाडोल स्थिति ने तेजस्वी यादव को लालू शैली अपनाने पर मजबूर किया है.
तेजस्वी यादव के इस बदले अंदाज के पीछे उनके भाई तेजप्रताप यादव का डर भी एक वजह हो सकती है. दरअसल, हाल के दिनों में तेज प्रताप यादव की अप्रत्याशित राजनीतिक सक्रियता और उनका लालू यादव के अंदाज में जनता के आगे प्रस्तुत होना भी तेजस्वी यादव के इस बदलाव का कारण हो सकता है. दरअसल, तेज प्रताप यादव के हाल के बयानों और आरजेडी के कई जमीनी कार्यकर्ताओं पर उनके (तेज प्रताप का) बढ़ते प्रभाव ने भी तेजस्वी यादव के लिए चुनौती खड़ी की है. तेजप्रताप यादव पिता लालू यादव की तरह देसी शैली में जनता से मिलते हैं और कई बार लोगों के बीच उनका प्रभाव भी दिखता है. संभव है कि इसकी काट के लिए भी तेजस्वी यादव ने लालू यादव की तरह जनता से सीधे जुड़ने की रणनीति अपनाई हो सकती है.
तेजस्वी यादव के आगे यह है बड़ी चुनौती
दरअसल 2025 का विधानसभा चुनाव तेजस्वी यादव के लिए करो या मरो की लड़ाई है. लालू यादव की शैली अपनाकर वह ग्रामीण बिहार को लुभा सकते हैं, लेकिन भारतीय जनता पार्टी और एनडीए के अन्य दलों की आक्रामक रणनीति और नीतीश कुमार की शालीन छवि और सुशासन सरकार के साथ सियासी चतुराई तेजस्वी यादव के लिए चुनौती हैं. तेजस्वी का लालू यादव जैसा अंदाज बिहार की सियासत में नई हलचल ला रहा है. बीजेपी और जेडीयू की नीतीश सरकार पर बेरोजगारी और महंगाई जैसे मुद्दों पर तेजस्वी यादव का यह देसी तंज आरजेडी के वोटर बेस को एकजुट कर सकता है. सासाराम में तेजस्वी यादव का यह बयान दिखाता है कि तेजस्वी यादव अब पिता लालू यादव के रास्ते पर चलकर राजद कार्यकर्ताओं और नेताओं को नई ऊर्जा देना चाहते हैं, लेकिन तेजप्रताप के साथ उनके रिश्ते और पार्टी में आंतरिक एकता उनकी सफलता की कुंजी होगी.
क्या बदलेगा बिहार का सियासी समीकरण?
लालू यादव की मौजूदगी और उनकी सियासी विरासत तेजस्वी यादव को लालू यादव के रास्ते पर लौटने के लिए प्रेरित कर रही है, क्योंकि लालू यादव का देसी अंदाज हमेशा से राजद की ताकत रही है. ऐसे में तेजस्वी का यह अंदाज दो पहलुओं की ओर संकेत करता है. एक यह कि तेजस्वी यादव न केवल लालू की विरासत को आगे बढ़ाते दिख रहे हैं, बल्कि बिहार की जनता से उनकी गहरी कनेक्टिविटी बिठाने का प्रयास भी बता रहा है. उनके बयानों में हास्य, व्यंग्य, तंज और बिहारीपन की ठसक का मिलाजुला रूप लालू यादव की शैली की याद दिलाता है. यह जनता से जुड़ने और उनकी लोकप्रियता के लिए सकारात्मक हो सकता है. हालांकि, लालू यादव की छवि से बहुत ज्यादा जुड़ना तेजस्वी यादव के लिए जोखिम भरा भी हो सकता है, क्योंकि नई पीढ़ी के वोटर आधुनिक और प्रगतिशील नेतृत्व की उम्मीद करते हैं. ऐसे में तेजस्वी यादव को देसी और आधुनिक शैली का संतुलन बनाना होगा.