जलवायु परिवर्तन आज दुनिया की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक है. यह न केवल पर्यावरण को प्रभावित करता है, बल्कि अर्थव्यवस्था पर भी गहरा असर डालता है. संयुक्त राष्ट्र आर्थिक और सामाजिक आयोग (UNESCAP) ने अपनी हालिया रिपोर्ट “आर्थिक और सामाजिक सर्वेक्षण एशिया और प्रशांत 2025” में बताया है कि जलवायु परिवर्तन के कारण एशिया-प्रशांत क्षेत्र के कई देशों को भारी आर्थिक नुकसान हो रहा है. जलवायु परिवर्तन भारत और अन्य देशों की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर रहा है.
जलवायु परिवर्तन का आर्थिक नुकसान
UNESCAP की रिपोर्ट में बताया गया है कि एशिया-प्रशांत क्षेत्र के एक-तिहाई देशों को हर साल उनकी कुल अर्थव्यवस्था (GDP) का कम से कम 6% नुकसान हो रहा है. यह नुकसान जलवायु से जुड़ी घटनाओं जैसे बाढ़, गर्मी की लहरें, सूखा और तूफान के कारण होता है. ये प्राकृतिक आपदाएँ न केवल लोगों की जिंदगी को प्रभावित करती हैं, बल्कि देश की आर्थिक स्थिति को भी कमजोर करती हैं.
जब बाढ़ आती है, तो फसलें नष्ट हो जाती हैं, घर और सड़कें टूट जाती हैं, और कारखाने बंद हो जाते हैं. इससे देश को बहुत पैसा खर्च करना पड़ता है ताकि सब कुछ फिर से ठीक किया जा सके. इसी तरह, गर्मी की लहरें लोगों को काम करने से रोकती हैं, जिससे उत्पादन कम हो जाता है. ये सभी चीजें देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुँचाती हैं.
नुकसान को कैसे मापा जाता है?
UNESCAP ने इस नुकसान को मापने के लिए एक खास तरीके का इस्तेमाल किया है, जिसे औसत वार्षिक हानि (AAL) कहा जाता है. इसका मतलब है कि हर साल प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले आर्थिक नुकसान का अनुमान लगाया जाता है. यह अनुमान आपदाओं की संख्या, उनकी तीव्रता, और प्रभावित क्षेत्रों की कमजोरी को देखकर किया जाता है.
रिपोर्ट में 30 देशों का अध्ययन किया गया, और पाया गया कि औसतन इन देशों को अपनी GDP का 4.8% नुकसान होता है. कुछ देशों में यह नुकसान और भी ज्यादा है. जैसे
कंबोडिया: लगभग 11% GDP का नुकसान.
फिजी, म्यांमार, और पाकिस्तान: कम से कम 7% GDP का नुकसान.
यह नुकसान बहुत बड़ा है, क्योंकि यह पैसा स्कूल, अस्पताल, और सड़क बनाने जैसे कामों में इस्तेमाल हो सकता था.
सबसे ज्यादा खतरे में कौन से देश हैं?
रिपोर्ट में 11 विकासशील देशों को सबसे ज्यादा जोखिम में बताया गया है. ये देश हैं: अफगानिस्तान, कंबोडिया, ईरान, कजाकिस्तान, लाओस, मंगोलिया, म्यांमार, नेपाल, तजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान, और वियतनाम.
इन देशों में खतरा ज्यादा होने के कई कारण हैं
1.शहरीकरण: इन देशों में शहर बहुत तेजी से बढ़ रहे हैं. लेकिन शहरों की इमारतें और सड़कें मजबूत नहीं हैं. इसलिए, जब बाढ़ या तूफान आता है, तो बहुत नुकसान होता है.
2.कमजोर बुनियादी ढांचा: इन देशों में सड़कें, पुल, और बिजली की व्यवस्था कमजोर है. यह आपदाओं को और खतरनाक बनाता है.
3.तटीय क्षेत्र: कई देशों के पास समुद्र तट हैं, जो समुद्र के बढ़ते स्तर और तूफानों से प्रभावित होते हैं.
हालांकि ये देश 2024 में विश्व अर्थव्यवस्था में बहुत योगदान दे रहे हैं, लेकिन जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने के लिए उनके पास पर्याप्त संसाधन नहीं हैं.
भारत की अर्थव्यवस्था पर जलवायु परिवर्तन का असर
भारत भी जलवायु परिवर्तन से बहुत प्रभावित हो रहा है. यहाँ कुछ मुख्य खतरे हैं:
1.GDP में कमी: एशियाई विकास बैंक (ADB) के अनुसार, अगर जलवायु परिवर्तन को नहीं रोका गया, तो 2070 तक भारत की GDP में 24.7% की कमी हो सकती है.
2.काम करने की क्षमता में कमी: गर्मी की लहरों के कारण लोग कम समय तक काम कर पाते हैं. 2030 तक भारत में 34 मिलियन नौकरियाँ खतरे में हो सकती हैं. इससे GDP को 4.5% का नुकसान हो सकता है.
3.कृषि पर असर: गर्मी और अनियमित बारिश के कारण चावल और गेहूँ जैसी फसलों की पैदावार कम हो रही है. अगर तापमान 2 डिग्री सेल्सियस बढ़ता है, तो 2050 तक भारत को अनाज का आयात दोगुना करना पड़ सकता है.
4.समुद्र तटों पर खतरा: भारत के 7,500 किलोमीटर लंबे समुद्र तट को खतरा है. 1990 से 2018 के बीच 32% तट कटाव का शिकार हुआ है. समुद्र का स्तर बढ़ने से तटीय शहरों में बाढ़ का खतरा बढ़ गया है.
5.प्राकृतिक आपदाएँ: 1993 से 2023 के बीच भारत को प्राकृतिक आपदाओं से 180 अरब डॉलर का नुकसान हुआ है. इन आपदाओं में कई लोगों की जान भी गई है.
ये सभी समस्याएँ भारत की अर्थव्यवस्था को कमजोर कर रही हैं.
कृषि और मछली पालन पर असर
जलवायु परिवर्तन का असर एशिया-प्रशांत क्षेत्र की कृषि और मछली पालन जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर भी पड़ रहा है.
1.कृषि: 2050 तक चावल की पैदावार में 14% तक की कमी हो सकती है. इससे खाद्य सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है और किसानों की आय कम हो सकती है. भारत जैसे देशों में यह समस्या बहुत गंभीर है, क्योंकि यहाँ बहुत सारे लोग खेती पर निर्भर हैं.
2. मछली पालन: मछलियों की संख्या कम होने के कारण 2050 तक उष्णकटिबंधीय मछलियों के भंडार में 30% तक की कमी हो सकती है. इससे मछुआरों की आजीविका पर असर पड़ेगा
3. ऊर्जा क्षेत्र: भारत, इंडोनेशिया, और चीन जैसे देश जो कोयला और तेल पर निर्भर हैं, उन्हें नवीकरणीय ऊर्जा की ओर बढ़ने की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है. इससे नौकरियाँ और आय कम हो सकती है.
नुकसान को कम करने के उपाय
UNESCAP ने जलवायु परिवर्तन के आर्थिक नुकसान को कम करने के लिए कई उपाय सुझाए हैं.
1.सर्कुलर इकोनॉमी: इसका मतलब है कि कचरे को कम करें और संसाधनों का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करें. जैसे, पुरानी चीजों को फिर से उपयोग में लाना.
2.हरी तकनीक: कार्बन कैप्चर और नवीकरणीय ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में नई तकनीकों का विकास करना.
3.मजबूत बुनियादी ढांचा: बाढ़ और गर्मी से बचने वाली इमारतें और सड़कें बनाना. जैसे, शहरों में बाढ़-रोधी दीवारें.
4. हरी वित्त व्यवस्था: टैक्स और निवेश के जरिए उन उद्योगों को बढ़ावा देना जो पर्यावरण के लिए अच्छे हैं.
5.वैश्विक सहायता: ग्रीन क्लाइमेट फंड और लॉस एंड डैमेज फंड जैसे अंतरराष्ट्रीय फंड का उपयोग करके जलवायु परिवर्तन से निपटना.
भारत के लिए खास उपाय
भारत इन उपायों को लागू करने के लिए कई कदम उठा सकता है:
1. सर्कुलर इकोनॉमी: भारत “वेस्ट-टू-वेल्थ” योजनाओं पर काम कर सकता है. शहरों को कचरा-मुक्त बनाने की कोशिश की जा सकती है.
2.हरी तकनीक: भारत स्टार्ट-अप इंडिया और इनोवेशन मिशन के जरिए जलवायु-तकनीक स्टार्टअप्स को बढ़ावा दे सकता है. ग्रीन क्लाइमेट फंड से पैसा लिया जा सकता है.
3.मजबूत बुनियादी ढांचा: स्मार्ट सिटी मिशन को राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना (NAPCC) के साथ जोड़ा जा सकता है. यूएई के मसदार सिटी जैसे मॉडल से प्रेरणा लेकर जलवायु-रोधी विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाए जा सकते हैं.
4.हरी वित्त व्यवस्था: NAPCC के साथ एक हरी टैक्स व्यवस्था बनाई जा सकती है, जिससे पर्यावरण के लिए अच्छे उद्योगों में निवेश बढ़े.
अंतरराष्ट्रीय मदद की भूमिका
ग्रीन क्लाइमेट फंड और लॉस एंड डैमेज फंड जैसे अंतरराष्ट्रीय फंड बहुत महत्वपूर्ण हैं. ये फंड देशों को पैसा देते हैं ताकि वे जलवायु परिवर्तन से बचने के उपाय कर सकें. बेहतर खेती के तरीके अपना सकें और नवीकरणीय ऊर्जा जैसे सोलर और पवन ऊर्जा पर काम कर सकें.
लॉस एंड डैमेज फंड को और प्रभावी बनाने से इस क्षेत्र के देशों को जलवायु परिवर्तन से निपटने में बहुत मदद मिलेगी.
जलवायु परिवर्तन एक गंभीर समस्या है जो एशिया-प्रशांत क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को बहुत नुकसान पहुँचा रही है. भारत जैसे देशों को खेती, मछली पालन, और बुनियादी ढांचे पर खास ध्यान देना होगा. UNESCAP ने जो उपाय सुझाए हैं, जैसे सर्कुलर इकोनॉमी, हरी तकनीक, और मजबूत बुनियादी ढांचा, वे इस समस्या से निपटने में बहुत मदद कर सकते हैं. अंतरराष्ट्रीय फंड भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं. अगर भारत और अन्य देश अभी से इन उपायों पर काम शुरू करें, तो वे अपनी अर्थव्यवस्था को बचा सकते हैं और भविष्य को सुरक्षित बना सकते हैं.






