पूर्वी लद्दाख के गोगरा और हॉट ्प्रिरंग क्षेत्र के पेट्रोलिंग प्वाइंट–१५ से चीन की सेना का हटना भारत की ताकत को दर्शाता है। दो वर्ष बाद चीन की सेना को आखिरकार अपनी जिद छोड़़नी पड़़ी। भारत के अड़े़ रहने और चीन को लेकर अपनी नीतियों में दृढ़ता का समावेश नये भारत की तस्वीर दर्शाता है। चीन अपने अडि़़यल रवैये के लिए विश्व भर में बदनाम रहा है। पूर्वी लद्दाख में उसने वो सब किया जो एक संप्रभु देश का आचरण नहीं होता है। दोनों देशों के कोर कमांड़र स्तर की १६वें दौर की वार्ता में इस बात पर सहमति बनी। अच्छी बात है कि शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) सम्मेलन से पहले दोनों पक्षों ने यह फैसला लिया। गोगरा पोस्ट और हॉट ्प्रिरंग‚ चीन के शिनजियांग और तिब्बत सीमा के करीब हैं। भारत के लिए इनका रणनीतिक महत्व है। दरअसल‚ भारत के लिए चीन सबसे बड़़ी परेशानी की वजह है। कभी लद्दाख तो कभी अरुणाचल तो कभी उत्तराखंड़ तो कभी पाकिस्तान की आड़़ में भारत को अस्थिर करने की कुटिल चाल वह हमेशा से करता रहा है। चीन की नीति और नीयत किस तरह की है‚ इससे दुनिया अनभिज्ञ नहीं है। उसने भारत के साथ तो छल तो किया ही‚ कई अन्य देशों के साथ उसका विवाद यही बताता है कि वह शांति‚ समन्वय‚ संवेदना और समझदारी पर विश्वास नहीं करता है। उसकी विस्तारवादी रवैये से ज्यादातर पड़़ोसी देश आक्रांत हैं। यही वजह है कि चीन के अपने सैनिकों की वापसी की सहमति की बात भारतीय रक्षा मंत्रालय ने अपने फैसले लेने के एक दिन बाद किया। खैर‚ देर आयद दुरुस्त आयद। बावजूद इसके चीन के इस समझदारी भरे फैसले पर पूरी तरह यकीन करने से भारत को फिलहाल बचना होगा। चीन के हर कदम पर बारीकी से नजर रखनी होगी। दोनों देशों के इस कदम से इतना तो है कि तनाव खत्म होगा और रचनात्मक निर्णय लिये जाएंगे। मगर दो बड़़े प्वाइंट्स डे़मचॉक और डे़पसांग पर गतिरोध अब भी बरकरार है। हालांकि आहिस्ता–आहिस्ता विवादित मसले को निपटाने की पहल से दोनों देशों के बीच भरोसा बनेगा भी और मजबूत भी होगा। रिश्तों की ताना–बाना तभी आकार लेगा‚ जब भरोसा फिर से कायम हो।
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