राज्य सभा के पूर्व सांसद और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल के पार्टी छोड़़ने का मामला अभी ठंड़ा भी नहीं पड़़ा था कि गुजरात के हार्दिक पटेल के ‘हाथ’ छुड़़ाने से पार्टी को तगड़़ा झटका लगा है। पाटीदार नेता के तौर पर गुजरात में हार्दिक की मौजूदगी कांग्रेस के लिए सुकून वाली बात थी‚ मगर जिस तरह से उन्होंने कांग्रेस से पल्ला झाड़़कर ‘कमल’ का दामन थामा है‚ वह निश्चित तौर पर पार्टी के लिए बुरे स्वप्न सरीखा है। हार्दिक पटेल युवा थे और इस नाते युवाओं में उनकी छवि अच्छी थी। पाटीदारों की ताकत गुजरात में किसी से छुपी नहीं है। कम–से–कम राज्य की ७० विधानसभा सीटों पर पाटीदारों की भूमिका काफी अहम मानी जाती है। २०१५ में पाटीदार आरक्षण समिति का गठन कर हार्दिक ने तत्कालीन गुजरात सरकार को दबाव में ला दिया था। २०१९ में कांग्रेस का दामन थामने वाले हार्दिक का मन करीब तीन साल में ही ऊब गया। १८ मई को कांग्रेस छोडने के बाद यह कयासबाजी हो रही थी कि वह अब भाजपा के हो जाएंगे। और यही हुआ भी। हालांकि हार्दिक के भाजपा में आने का विरोध भी शुरू हो गया है। खासकर पाटीदार समाज के भीतर से ही उनके खिलाफ मोर्चा खुल गया है। खैर‚ भाजपा की अंदरूनी खींचतान से इतर कांग्रेस को खुद में झांकने का साहस दिखाना होगा। एक–के–बाद–एक नेताओं का ‘हाथ’ छुड़़ाने का चलन पार्टी की आंतरिक लोकतंत्र‚ उसकी रणनीति‚ संगठन की कमजोरी और शीर्ष नेतृत्व की अक्षमता को परिलक्षित करता है। भाजपा से मुकाबिल होने के लिए कांग्रेस को अपने तेवर और कलेवर में बदलाव करने का साहस दिखाना होगा। देश की सबसे पुरानी पार्टी का यह हश्र उसकी नीतियों का दुष्परिणाम है‚ इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है। अपने विधायकों और वरिष्ठ नेताओं में इस बात का भरोसा दिखाना कि–पार्टी जरूर वापसी करेगी–भले दुष्कर कार्य हो किंतु नामुमकिन नहीं है। कांग्रेस के लिए भले ही प्रतिकूल हालात हों‚ किंतु वक्त हमेशा एक सा नहीं रहता है। कांग्रेस को शांत भाव से और बेहद समझदारी से जनता के बीच जाना होगा। जब–जब कोई राजनीतिक पार्टी जनता से दूर हुई है‚ उस पार्टी के दुर्दिन आने लगते हैं। कांग्रेस को इस सूत्र को याद रखना होगा।
19 साल बाद कोलकाता लौटने पर भावुक हुईं तस्लीमा नसरीन, बोलीं- यह घर वापसी
बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन शुक्रवार को 19 साल बाद कोलकाता पहुंचीं। कोलकाता पहुंचने पर तस्लीमा नसरीन बेहद खुश दिखाई दीं।...







