भारत की परीक्षा व्यवस्था इन दिनों अपने सबसे बड़े मंथन के दौर से गुजर रही है। गत दिनों नीट-यूजी 2026 का प्रश्नपत्र लीक होने के कारण 23 लाख विद्यार्थियों की परीक्षा रद करनी पड़ी। इसके विरोध में दिल्ली से लेकर देशभर में व्यापक छात्र आंदोलन हुए। जवाबदेही की मांग के बीच शिक्षा मंत्री ने त्यागपत्र दे दिया तथा एनटीए के 47 अधिकारियों को बर्खास्त कर दिया गया।
इसी बीच केंद्र सरकार ने घोषणा की है कि वर्ष 2027 से नीट परीक्षा ओएमआर शीट के बजाय कंप्यूटर आधारित परीक्षा (सीबीटी) के माध्यम से आयोजित की जाएगी। राधाकृष्णन समिति ने वर्ष 2024 में भी यही सिफारिश की थी। यह एक स्वागतयोग्य कदम है। इससे स्पष्ट होता है कि सरकार ने युवाओं की आवाज सुनी है और सही दिशा में पहल की है, परंतु यह क्षण केवल एक परिवर्तन तक सीमित नहीं है। जब पूरी परीक्षा प्रणाली कागज से स्क्रीन पर स्थानांतरित हो रही है तो आधा-अधूरा बदलाव क्यों किया जाए?
जिस प्रकार वर्ष 1991 के आर्थिक संकट ने भारत की अर्थव्यवस्था के लिए नए द्वार खोले थे, उसी प्रकार वर्ष 2026 का परीक्षा-संकट भारतीय परीक्षा व्यवस्था को इक्कीसवीं सदी के अनुरूप बनाने का अवसर प्रदान कर सकता है, बशर्ते हम दूरदर्शिता के साथ बड़ा सोचें।
प्रस्तावित माडल जेईई मेन की तर्ज पर बहु-पाली सीबीटी का है, जिसमें प्रत्येक पाली के सभी परीक्षार्थियों को एक ही निर्धारित प्रश्नपत्र मिलेगा। यही ढांचा वर्ष 2021 में सेंध का शिकार हो चुका है। जेईई मेन 2021 पूरी तरह कंप्यूटर आधारित थी, फिर भी सोनीपत के एक परीक्षा केंद्र पर ‘रिमोट एक्सेस’ साफ्टवेयर के माध्यम से बाहर बैठे साल्वर परीक्षार्थियों के प्रश्नपत्र हल कर रहे थे। सीबीआइ जांच के अनुसार, प्रति उम्मीदवार 12 से 15 लाख रुपये तक वसूले गए। साफ्टवेयर से छेड़छाड़ के आरोप में एक रूसी हैकर भी पकड़ा गया, जिससे कथित रूप से 800 से अधिक उम्मीदवारों को लाभ पहुंचा।
यदि निर्धारित प्रश्नपत्र और असुरक्षित मशीनें बनी रहीं तो चोरी का रास्ता बंद नहीं होगा, बल्कि वह केवल कागज से खिसककर स्क्रीन पर आ जाएगा। संसद की स्थायी समिति भी कह चुकी है कि वर्ष 2024 में एनटीए द्वारा आयोजित 14 परीक्षाओं में से पांच परीक्षाएं बाधित हुई थीं। इसीलिए हमें पूरी परीक्षा प्रणाली बदलनी होगी, क्योंकि कंप्यूटर आधारित परीक्षा कोई रामबाण समाधान नहीं है।
अमेरिका की जीआरई जैसी परीक्षाएं केवल ‘कंप्यूटर पर’ आयोजित नहीं होतीं, बल्कि वे एडेप्टिव होती हैं। इनमें विशाल एन्क्रिप्टेड प्रश्नबैंक से प्रत्येक परीक्षार्थी को अलग, किंतु समान कठिनाई स्तर वाला प्रश्नपत्र मिलता है और परीक्षा पूरे वर्ष आयोजित की जाती है। इसी प्रकार, सैट वर्ष 2024 से पूरी तरह डिजिटल-एडेप्टिव हो चुकी है। इसमें दो परीक्षार्थियों के प्रश्न एक जैसे नहीं होते, इसलिए ‘पेपर लीक’ की गुंजाइश ही नहीं रहती। ऐसे परीक्षा केंद्रों पर बायोमीट्रिक सत्यापन और ‘लाक्ड-डाउन’ टर्मिनल होते हैं, जिन पर कोई बाहरी साफ्टवेयर चल ही नहीं सकता।
ब्रिटेन की यूकैट भी कंप्यूटर आधारित परीक्षा है, लेकिन उसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह रटे हुए ज्ञान के बजाय अभ्यर्थी की निर्णय-क्षमता का मूल्यांकन करती है। अपने देश की बात करें तो कैट परीक्षा भी वर्षों से कंप्यूटर आधारित, बहु-पाली प्रणाली के तहत सफलतापूर्वक आयोजित होती आ रही है और उसमें किसी बड़े स्तर की सेंधमारी देखने को नहीं मिली है। अर्थात समाधान का रास्ता हमारे सामने है और वह कोई अबूझ भी नहीं।
हमारी परीक्षाएं प्रतिभा नहीं, बल्कि स्मरण-शक्ति का आकलन करती हैं। जो परीक्षा देश के भावी डाक्टरों का चयन करती है, वह केवल यह देखती है कि अभ्यर्थी ने जीव-विज्ञान कितना रटा है। जबकि इसकी परख बोर्ड में पहले ही हो चुकी होती है। नीट परीक्षा यह नहीं परखती कि अभ्यर्थी में मरीज का दर्द समझने की संवेदना, तेजी से सीखने की क्षमता और दबाव की स्थिति में सही निर्णय लेने का विवेक है या नहीं। इसी रटंत प्रणाली ने 58 हजार करोड़ रुपये के कोचिंग उद्योग को जन्म दिया है, जिसके लिए अनेक माता-पिता कर्ज तक लेने को विवश हो जाते हैं। ‘एक दिन का जुआ’ आज भी यथावत बना हुआ है। केवल स्क्रीन पर परीक्षा आयोजित कर देने से इनमें से कोई भी समस्या स्वत: समाप्त नहीं हो जाएगी।
सबसे पहले सीबीटी को एडेप्टिव बनाया जाए। इसके लिए एक राष्ट्रीय एन्क्रिप्टेड प्रश्नबैंक तैयार किया जाए और प्रत्येक विद्यार्थी को अलग, किंतु समतुल्य कठिनाई स्तर वाला प्रश्नपत्र मिले, जो परीक्षा शुरू होते ही परीक्षा केंद्र के टर्मिनल पर तैयार हो। इसके साथ ही प्रत्येक केंद्र का स्वतंत्र सुरक्षा आडिट, बायोमीट्रिक सत्यापन तथा रिमोट एक्सेस पर पूर्ण प्रतिबंध सुनिश्चित किया जाए। गांवों और कस्बों तक परीक्षा केंद्रों का व्यापक नेटवर्क स्थापित हो तथा निःशुल्क माक परीक्षाएं उपलब्ध कराई जाएं, ताकि डिजिटल खाई किसी ग्रामीण प्रतिभा को निगल न सके।
प्रत्येक बड़ी परीक्षा वर्ष में दो या तीन बार आयोजित हो और अभ्यर्थी का सर्वश्रेष्ठ स्कोर ही मान्य माना जाए। इससे प्रश्नपत्र लीक का काला बाजार खत्म हो जाएगा। डाक्टरों के चयन के लिए संवेदना और निर्णय-क्षमता का आकलन करने वाले परिदृश्य-आधारित प्रश्न तथा साक्षात्कार जोड़े जाएं। सिविल सेवा परीक्षा में भी तथ्य-स्मरण पर निर्भरता घटे और केस-स्टडी आधारित प्रश्न बढ़ाए जाएं। कुछ प्रश्न ओपन-बुक भी हों। जो परीक्षा रटने की नहीं, बल्कि सोचने और समझने की होगी, उसका प्रश्नपत्र लीक होने पर भी नकल करने वालों को कोई विशेष लाभ नहीं मिलेगा और रटवाने पर आधारित कोचिंग उद्योग भी सिमटने लगेगा।
वर्ष 2024 का सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम 10 वर्ष तक के कारावास और एक करोड़ रुपये तक के जुर्माने का प्रविधान करता है। आवश्यकता उसके कठोर और निष्पक्ष क्रियान्वयन की है। प्रत्येक परीक्षा से पहले साफ्टवेयर का स्वतंत्र तकनीकी आडिट कराया जाए तथा मूल्यांकन में डबल-ब्लाइंड आन-स्क्रीन जांच की व्यवस्था हो, जिसमें एआइ जोड़ संबंधी त्रुटियों और छूटे हुए उत्तरों की पहचान करने में सहायता करे। आज का भारत बेहतर शिक्षा, विश्वसनीय परीक्षा व्यवस्था और रटंत-आधारित परीक्षा तंत्र से मुक्ति की मांग कर रहा है।







