केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह एक लंबे समय से घुसपैठियों के खिलाफ सख्त रवैया अपनाए हुए हैं। वे उनकी पहचान करने और उन्हें देश से बाहर निकालने की बातें लगातार करते चले आ रहे हैं। समय-समय पर प्रधानमंत्री भी घुसपैठ का उल्लेख करते रहे हैं। गृह मंत्री और प्रधानमंत्री की ओर से घुसपैठियों के खिलाफ दिए गए बयानों को लेकर विपक्षी दलों की ओर से अक्सर यह कहा जाता रहा है कि वे सीमांत राज्यों और खासकर बंगाल में चुनावी लाभ के लिए घुसपैठ का मुद्दा उठाते हैं, लेकिन अब वहां चुनाव हो गए, तब भी यदि वे घुसपैठियों के खिलाफ अपना अभियान छेड़े हुए हैं तो इसका यही अर्थ है कि वे इसे लेकर गंभीर हैं और इस समस्या का समाधान होते हुए देखना चाहते हैं।
इसकी पुष्टि इससे होती है कि प्रधानमंत्री ने सीमावर्ती क्षेत्रों में जनसांख्यिकी में बदलाव के दुष्प्रभावों का पता लगाने के लिए एक समिति गठित की है। इस समिति के साथ गृह मंत्री दो बार बैठक कर चुके हैं। इसके अतिरिक्त वे बंगाल, पूर्वोत्तर और साथ ही अन्य सीमावर्ती राज्यों में घुसपैठ पर लगाम लगाने के उपायों की समीक्षा कर रहे हैं। इसी क्रम में बंगाल में बांग्लादेश से लगती सीमा पर बाड़ लगाने का काम तेज हो गया है।
घुसपैठियों पर लगाम लगाने की सक्रियता के बीच पिछले दिनों यह खबर आई कि प्रवर्तन निदेशालय अर्थात ईडी ने रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठियों को अवैध तरीके से देश में लाकर बसाने में लिप्त एक ऐसे नेटवर्क के कई ठिकानों पर छापेमारी की, जो ट्रस्ट, एनजीओ आदि के जरिये विदेश से चंदा लेता था। यह नेटवर्क कितना व्यापक है, इसका अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि ईडी ने बंगाल, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, महाराष्ट्र और हरियाणा में कई स्थानों पर छापेमारी की।
उसे बंगाल के एक मदरसे से 40 लाख रुपये और कुछ सोने के सिक्के मिले। इस नेटवर्क के बारे में सुराग तब मिला था, जब उत्तर प्रदेश पुलिस के आतंकवाद विरोधी दस्ते अर्थात एटीएस ने करीब दो वर्ष पहले यह पता लगाया था कि एक नेटवर्क म्यांमार के रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठियों को फर्जी दस्तावेजों से लैस कर और उन्हें आर्थिक सहायता देकर देश के विभिन्न हिस्सों में बसाने में लगा हुआ है। इस नेटवर्क का संबंध आतंकी संगठनों से जुड़े होने के भी संकेत मिले थे। यूपी एटीएस की इस जांच के आधार पर ही ईडी ने अपनी कार्रवाई आगे बढ़ाई और यह पाया कि घुसपैठियों के मददगार नेटवर्क की ओर से विदेशी अनुदान विनियमन अधिनियम अर्थात एफसीआरए के नियमों का उल्लंघन किया जा रहा था।
पूर्वोत्तर और बंगाल में तो न जाने कब से घुसपैठ हो रही है। पिछले कुछ वर्षों से म्यांमार के रोहिंग्या मुसलमान भी भारत में घुसपैठ करने में लगे हुए हैं। उनके मददगार कितने प्रभावशाली हैं, यह इससे समझा जा सकता है कि घुसपैठिए बंगाल से हजारों किलोमीटर दूर जम्मू, हैदराबाद तक जा बसे हैं। बांग्लादेशी घुसपैठियों ने तो करीब-करीब देश के हर राज्य में अपने ठिकाने बना लिए हैं। उन्होंने आजीविका के साधन जुटाने के साथ ही राशन कार्ड, आधार तक हासिल कर लिए हैं। कई मामले ऐसे आए हैं, जिनसे यह पता चला कि वे मतदाता भी बन गए हैं।
वास्तव में इसी कारण चुनाव आयोग को बंगाल में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआइआर के दौरान अनेक लोगों के नाम वोटर लिस्ट से इस संदेह के चलते हटाने पड़े कि वे भारत के नागरिक नहीं हैं। बंगाल में बांग्लादेशी घुसपैठियों के प्रति एक लंबे समय से बहुत उदारता का परिचय दिया जा रहा है। पहले कांग्रेस और वाम मोर्चा सरकारों ने घुसपैठ की अनदेखी की। इसके बाद यही काम ममता बनर्जी करने लगीं। कहना कठिन है कि बंगाल, असम और पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों में कितने घुसपैठिए भारतीय नागरिक के रूप में रह रहे हैं, लेकिन सभी इससे परिचित हैं कि बंगाल में एसआइआर के दौरान एक बड़ी संख्या में बांग्लादेशी अपने देश लौटने के लिए कतार लगाए हुए थे।
घुसपैठियों को बाहर निकाला ही जाना चाहिए, क्योंकि वे न केवल देश के संसाधनों पर बोझ हैं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा भी हैं। भारत एक विकासशील देश जरूर है, पर यहां अत्यधिक गरीबी भी है। केंद्र और राज्य सरकारें निर्धनता उन्मूलन के लिए जो अनेक योजनाएं चला रही हैं, उनका लाभ उठाने का अधिकार देश के गरीब लोगों को है, न कि घुसपैठियों को भी। समस्या यह है कि विपक्षी दल घुसपैठियों को एक वोट बैंक के रूप में देखते हैं। वोटों के लोभ में वे राष्ट्रीय सुरक्षा की अनदेखी ही करते हैं।
विपक्षी दल चुनाव आयोग की एसआइआर प्रक्रिया का विरोध इसीलिए कर रहे हैं कि कहीं घुसपैठियों की पहचान न हो जाए। चूंकि घुसपैठिए बड़ी संख्या में मुस्लिम हैं, इसलिए मुस्लिम तुष्टीकरण की भी राजनीति की जा रही है। एसआइआर एक जटिल प्रक्रिया है। चुनाव आयोग के लिए इस प्रक्रिया को बिना किसी गड़बड़ी के पूरा करना कठिन है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि इस प्रक्रिया को होने ही न दिया जाए। इसकी अनदेखी नहीं की जानी चाहिए कि पूर्वोत्तर के राज्यों में घुसपैठिए वैसे ही समस्या बन गए हैं, जैसे बंगाल में बने हुए हैं।
वैसे तो विश्व के अनेक अमीर देशों में गरीब देशों से अवैध तरीके से बसने वाले लोगों को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त होता है, लेकिन वहां की स्थिति अलग है। इन देशों में मानव संसाधन की कमी देखी जा रही है। भारत में ऐसा नहीं है। भारत घुसपैठियों के प्रति उदारता का परिचय नहीं दे सकता, क्योंकि वे देश के सीमित संसाधनों का लाभ उठाने के साथ सीमांत इलाकों में सामाजिक ताने-बाने को प्रभावित करने और स्थानीय संस्कृति और अस्मिता को ठेस पहुंचाने का काम कर रहे हैं। ऐसे में घुसपैठियों के खिलाफ सघन कार्रवाई होनी ही चाहिए। इसी के साथ यह भी आवश्यक है कि घुसपैठियों के मददगारों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाए, क्योंकि अब यह स्पष्ट है कि वे किसी साजिश के तहत सुनियोजित तरीके से उन्हें भारत में लाकर जनसांख्यिकी को बदल रहे हैं और देश की सुरक्षा के लिए खतरा पैदा कर रहे हैं।







