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बांकीपुर उपचुनाव में किसका पलड़ा भारी……..

UB India News by UB India News
July 15, 2026
in पटना, बिहार, ब्लॉग
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बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव का कार्यक्रम घोषित , 30 जुलाई को मतदान  3 अगस्त को होगी मतगणना……
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बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव हाई प्रोफाइल हो गया है। इस सीट से बीजेपी ने नीरज सिन्हा को मैदान में उतारा है। नीरज सिन्हा के लिए खुद बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मैदान में उतर गए हैं। रेखा गुप्ता के लिए पूरा आरजेडी परिवार है। प्रशांत किशोर खुद अकेले मैदान में हैं। वही पार्टी के सर्वेसर्वा हैं। वरिष्ठ समाजवादी नेता शिवानंद तिवारी ने बांकीपुर चुनाव का आंकलन करने के बाद कहा है कि इस चुनाव में प्रशांत किशोर का पलड़ा भारी दिख रहा है। उन्होंने इसके पीछे कई कारण भी गिनाए हैं।

लंबे समय से बांकीपुर पर बीजेपी का कब्जा
शिवानंद तिवारी ने कहा है कि बांकीपुर सीट लंबे समय से भारतीय जनता पार्टी का मजबूत गढ़ रही है। वर्तमान उपचुनाव इसलिए हो रहा है क्योंकि नितिन नवीन ने भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है। उनसे पहले उनके पिता नवीन किशोर लगातार तीन बार इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते रहे और हर चुनाव में उनकी जीत का अंतर बढ़ता गया। नितिन नवीन ने भी उसी परंपरा को आगे बढ़ाया।

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बीजेपी का सबसे मजबूत गढ़ बांकीपुर
शिवानंद तिवारी ने कहा है कि बांकीपुर को भाजपा का सबसे मजबूत शहरी गढ़ माना जाता है। यह भी धारणा रही है कि यहां कायस्थ मतदाताओं का प्रभाव सबसे अधिक है और लंबे समय से इसी सामाजिक पृष्ठभूमि के उम्मीदवार चुनाव जीतते रहे हैं। लेकिन इस बार परिस्थितियाँ कुछ अलग नजर आ रही हैं। एक राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में इस चुनाव में प्रशांत किशोर का पलड़ा मुझे भारी दिखाई दे रहा है।

आखिर क्यों भारी लग रहा पीके का पलड़ा?
शिवानंद तिवारी ने प्रशांत किशोर का पलड़ा भारी होने के पीछे कारण भी दिए हैं। उन्होंने कहा कि इसके पीछे पहला कारण महागठबंधन की स्थिति है। राष्ट्रीय जनता दल ने फिर उसी महिला उम्मीदवार को मैदान में उतारा है, जो पिछला चुनाव हार चुकी थीं। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि चुनाव के सबसे निर्णायक समय में महागठबंधन के प्रमुख नेता, विदेश प्रवास पर चले गए हैं।

आरजेडी नेता तेजस्वी यादव पर तंज
शिवानंद तिवारी ने इशारों में आरजेडी के तेजस्वी यादव पर तंज कसते हुए कहा है कि जब किसी दल का शीर्ष नेतृत्व अपने उम्मीदवार के चुनाव प्रचार को प्राथमिकता नहीं दे रहा है तो उसका असर कार्यकर्ताओं के मनोबल और मतदाताओं के विश्वास पर पड़ना स्वाभाविक है। राजनीति केवल संगठन का ही नहीं, बल्कि मनोविज्ञान का भी खेल है। दूसरी ओर बीजेपी ने भी उम्मीदवार चयन में जिस प्रकार का भ्रम और असमंजस दिखाया, उसने कई सवाल खड़े किए हैं।

बांकीपुर में लड़ाई हुई हाई प्रोफाइल और दिलचस्प
शिवानंद तिवारी यही नहीं रूके उन्होंने कहा कि यह भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष द्वारा खाली की गई प्रतिष्ठित सीट है। पहले घोषित उम्मीदवार को हटाना पड़ा और फिर दूसरे उम्मीदवार को सामने लाया गया, उनको सुनने के बाद भाजपा पर आश्चर्य होता है। कहा जाता है कि सबसे ज़्यादा प्रबुद्ध मतदाता इस विधानसभा क्षेत्र में रहते हैं। ऐसे क्षेत्र से ऐसे उम्मीदवार का चयन तो उन प्रबुद्ध मतदाताओं का अपमान है। इतनी महत्वपूर्ण सीट पर इस प्रकार की स्थिति भाजपा जैसी संगठित पार्टी से अपेक्षित नहीं थी।

‘बीजेपी बांकीपुर में अति आत्मुग्धता की शिकार’
शिवानंद तिवारी ने आगे कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि भाजपा इस चुनाव को लेकर कुछ अधिक आत्मविश्वास में है। यह मान लेना कि केवल सामाजिक समीकरणों के आधार पर यह सीट आसानी से जीत ली जाएगी, शायद गलत साबित हो सकता है। यह सही है कि यहां कायस्थ मतदाताओं का प्रभाव है, लेकिन सिर्फ़ कायस्थ ही मतदाता भाजपा को चुनाव जीत दिलवाते हैं, ऐसा भी नहीं है। इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में ऐसे लोग भी रहते हैं, जिन्हें आज भी बुनियादी नागरिक सुविधाएं पर्याप्त रूप से उपलब्ध नहीं हैं।

प्रशांत किशोर के जीतने के बाद बदल जाएगा समीकरण
शिवानंद तिवारी ने साफ कहा है कि उनके ये विचार किसी सर्वे और सर्वेक्षण से नहीं आए हैं। उन्होंने इसे एक कार्यकर्ता के रूप में देखा है। उन्होंने कहा कि यदि प्रशांत किशोर यह चुनाव जीतते हैं, तो उसके राजनीतिक प्रभाव केवल बांकीपुर तक सीमित नहीं रहेंगे। आगामी विधानसभा चुनाव में विपक्ष की धुरी बदल सकती है और प्रशांत किशोर एक प्रमुख विकल्प के रूप में उभर सकते हैं। इस आकलन का आधार किसी प्रकार का सर्वेक्षण नहीं है। बल्कि एक पुराने राजनीतिक कार्यकर्ता की समझ पर आधारित है।

  • क्यों भारी है प्रशांत किशोर का पलड़ा?
    प्रशांत किशोर की सबसे बड़ी ताकत उनकी राजनीतिक रणनीति और चुनावी प्रबंधन का लंबा अनुभव है। उसका उपयोग करेंगे।
    उन्होंने कई राज्यों में चुनावी रणनीतिकार के रूप में सफल अभियान चलाए हैं। यहां भी रणनीति के हिसाब से कदम बढ़ा रहे हैं।
    उन्होंने बिना गहन अध्ययन और ठोस राजनीतिक गणना के बांकीपुर जैसी सीट से स्वयं चुनाव लड़ने का निर्णय नहीं लिया होगा।
    पीके के लिए निश्चित रूप से एक बड़ा जोखिम है, क्योंकि अब तक भाजपा यहां 50 प्रतिशत से अधिक मत प्राप्त करती रही है।
    लेकिन बड़े राजनीतिक परिवर्तन अक्सर ऐसे ही जोखिमों से शुरू होते हैं। पीके ने सोच समझकर यहां से मैदान में उतरने का सोचा।
    प्रशांत किशोर केवल बीजेपी के कैंडिडेट के विरुद्ध नहीं, बल्कि पूरी सरकार के विरुद्ध जनमत संग्रह के रूप में चुनाव को लिया है।
    वे लगातार कह रहे हैं कि उनका मुकाबला किसी एक प्रत्याशी से नहीं, बल्कि सरकार से है।
    इस रणनीति ने चुनाव को स्थानीय मुकाबले से ऊपर उठाकर व्यापक राजनीतिक विमर्श का विषय बना दिया है।

 

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