भोजपुर जिले का बिलौटी गांव केवल कथित पुलिस मुठभेड़ का गवाह भर नहीं है, बल्कि यह बिहार की करवट बदलती दिख रही राजनीति की प्रयोगशाला बनता हुआ प्रतीत हो रहा है. एक ओर जहां एनडीए खेमे के भीतर भी भरत तिवारी एनकाउंटर को लेकर घमासान मचा हुआ है, वहीं इस पर जारी सियासत के बीच महागठबंधन के दो सबसे बड़े दलों- राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस के बीच वैचारिक अंतर ने एनडीए और इंडिया ब्लॉक के गहरे जातीय और राजनीतिक अंतर्विरोधों को उजागर कर दिया है. कई जानकारों की नजर में संभव है कि ये अंतर्विरोध भी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा हो, लेकिन इसको लेकर सामने से दिख रहे तौर-तरीकों को लेकर इंडिया ब्लॉक के भीतर की राजनीति पर सवाल खड़े कर रहा है. एक ओर नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने कैमरे के सामने इसे ‘पुलिसिया हत्या’ तो कहा, लेकिन पीड़ित परिवार के दरवाजे तक जाने से परहेज किया. वहीं, कांग्रेस इस मुद्दे को लेकर जिस तरह अति-सक्रिय यानी एक्स्ट्रा एक्टिव दिख रही है, उसने यह साफ कर दिया है कि बिहार की राजनीति में परदे के पीछे बहुत कुछ नया पक रहा है.
तेजस्वी का बयान आक्रामक, लेकिन राजनीति संतुलित
यहां स्पष्ट करना जरूरी है कि ऐसा नहीं कि तेजस्वी यादव ने सरकार पर हमला करने में कोई कमी नहीं छोड़ी हो. उन्होंने भरत तिवारी एनकाउंटर को फर्जी बताया, न्यायिक जांच की भी मांग उठाई और सरकार को कठघरे में खड़ा भी किया. लेकिन इसके साथ साथ उनकी राजनीति अचानक ही संतुलित दिखने लगी, जो राजनीति के जानकारों को मन को भी असहज कर दिया. दरअसल, उन्होंने खुद जाने के बजाय उदय नारायण चौधरी के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल भेजा.
दरसल तेजस्वी यादव का बिलौटी गांव न जाना और अपनी जगह उदय नारायण चौधरी जैसे धुर-दलित चेहरे के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल भेजना, कोई प्रशासनिक मजबूरी नहीं बल्कि एक सोची-समझी राजनीतिक हिचकिचाहट की ओर संकेत करता है. दरअसल, आरजेडी पिछले कुछ समय से ‘A to Z’ यानी सर्वसमाज की पार्टी बनने का दावा जरूर करती रही है, लेकिन जब बात जमीन पर उतरने की आती है, तो पार्टी अपने पारंपरिक ‘MY’ (मुस्लिम-यादव) और अति-पिछड़ा (EBC) वोट बैंक के दबाव से मुक्त नहीं हो पाती.
भरत तिवारी सवर्ण (ब्राह्मण) समुदाय से थे और उन पर आपराधिक मुकदमे दर्ज थे. तेजस्वी बखूबी जानते हैं कि एक सवर्ण आरोपी के घर खुद जाकर खड़े होना उनके मूल वोटर यानी पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक को खटक सकता है.यह खास तब और हो जाता है जब बीते दिनों तेजस्वी यादव इन वर्गों के लोगों के एनकाउंटर पर खुद सवाल उठाते रहे हैं, जो पुलिसिया इकबाल और वर्चस्ववादी राजनीति के खिलाफ लामबंद होते रहे हैं.

भरत तिवारी के घर पहुंचा RJD का प्रतिनिधिमंडल, उदय नारायण चौधरी ने सरकार को घेरा
तेजस्वी की राजनीति और राजनीतिक संदेश एकसाथ
तेजस्वी यादव यह फैसला सिर्फ कार्यक्रम का नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश का भी था.बीते दिनों एमएलसी चुनाव के नतीजे में भोजपुर से महागठबंधन (आरजेडी) के प्रत्याशी की जीत हुई, उसमें इस समीकरण का बड़ा योगदान था. ऐसे में इस समय तेजस्वी शायद इस पूरे मुद्दे को केवल एक जातीय आंदोलन के रूप में स्थापित नहीं होने देना चाहते. दरअसल,राजद की कोशिश यह भी हो सकती है कि कानून-व्यवस्था के सवाल को उठाया जाए, लेकिन पार्टी किसी ऐसे राजनीतिक फ्रेम में न फंस जाए, जिससे उसका व्यापक सामाजिक गठजोड़ प्रभावित हो.
फ्रंटफुट पर कांग्रेस, खोई हुई जमीन पाने का नैरेटिव
एक तरफ राजद की राजनीति अपनी जगह है दूसरी ओर तेजस्वी की इसी हिचकिचाहट के बीच बने खाली स्पेस को कांग्रेस ने लपकने की कोशिश की है. बिहार में कांग्रेस लंबे समय से सवर्णों-विशेषकर ब्राह्मण-भूमिहार और राजपूत के साथ अगड़े मुस्लिमों की पहली पसंद हुआ करती थी, इनमें हिंदू सवर्ण को बाद में बीजेपी ने अपने पाले में कर लिया जबकि अगड़े मुस्लिम कांग्रेस और राजद में बंट गए. अब कांग्रेस को लगता है कि इस एनकाउंटर के जरिए वह सवर्ण समाज में नीतीश सरकार के खिलाफ उपजे गुस्से को भुना सकती है.

यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और हरियाणा से विधायक कुलदीप वत्स ने संकेत दिया है कि राहुल गांधी भरत तिवारी के परिजनों से मिल सकते हैं.
कांग्रेस ने वहां अवसर देखा, क्या राजद चूक गया?
राजनीति के जानकारों की नजर में शायद यही वजह है कि बिहार के राजेश राम से लेकर यूपी कांग्रेस के अध्यक्ष अजय राय और हरियाणा के कुलदीप वत्स जैसे बाहरी राज्यों के कद्दावर नेताओं को बिलौटी के मैदान में उतार दिया गया. कांग्रेस नेताओं का यह दावा कि “इस दर्द की गूंज राहुल गांधी तक पहुंचेगी और वे खुद बिलौटी आएंगे”, यह दिखाता है कि पार्टी अब केवल बिहार में आरजेडी के पीछे ‘जूनियर पार्टनर’ बनकर रहने को तैयार नहीं है. वह राष्ट्रीय स्तर पर अपने ‘संविधान बचाओ’ और ‘न्याय’ के नारे को सवर्णों के बीच भी री-ब्रांड करना चाहती है.
क्या ‘A to Z’ की राजनीति केवल एक चुनावी नारा है?
दरअसल, भरत तिवारी एनकाउंटर ने तेजस्वी यादव के उस नैरेटिव की परीक्षा ले ली है, जिसके दम पर वे खुद को नए दौर का आधुनिक नेता (ए ट जेड यानी सर्व समाज) साबित करना चाहते थे. लालू प्रसाद यादव के दौर की राजनीति खुलकर सवर्ण विरोधी और सामाजिक न्याय की थी. तेजस्वी ने खुद को उससे अलग दिखाने की कोशिश की थी, लेकिन इस नाजुक मोड़ पर उनकी दूरी ने यह साबित कर दिया है कि बिहार की चुनावी वैतरणी पार करने के लिए आज भी पुराने और परखे हुए जातीय समीकरणों का सहारा लेना ही उनकी मजबूरी है.
महागठबंधन के भीतर का वैचारिक और रणनीतिक टकराव
भरत तिवारी एनकाउंटर पर महागठबंधन के भीतर का घटनाक्रम साफ तौर पर दिखाता है कि सब कुछ ठीक नहीं है और दोनों दलों के राजनीतिक हित आपस में टकरा रहे हैं. कांग्रेस की यह आक्रामक बैटिंग आरजेडी के लिए एक आंतरिक चुनौती भी है. भोजपुर एनकाउंटर पर हो रही सियासत का सार यह है कि एक दल अपने स्थापित जनाधार को बचाने की रणनीति पर है, तो दूसरा अपने राजनीतिक विस्तार की तलाश में है. इसलिए बिलौटी की यह कहानी केवल एक गांव या एक एनकाउंटर की कहानी नहीं है. यह उस राजनीति की कहानी भी है, जिसमें सहयोगी दल साथ तो चलते हैं, लेकिन हर मोड़ पर अपनी-अपनी जमीन भी तलाशते रहते हैं.







