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एकात्म मानव दर्शन की साधिका: अर्चना राय भट्ट ने अर्जित की डॉक्टरेट की गौरवपूर्ण उपाधि

UB India News by UB India News
June 25, 2026
in TAZA KHABR, पटना, महिला युग, शिक्षा
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एकात्म मानव दर्शन की साधिका: अर्चना राय भट्ट ने अर्जित की डॉक्टरेट की गौरवपूर्ण उपाधि
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बिहार मे दूसरी बार एकात्म मानववाद के प्रणेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय पर शोध किया गया, जिसके Viva – Voce की परीक्षा दिनांक 23/06/2026 को पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय के प्रांगण मे सम्पन्न हुई। तथा सर्व सम्मती अर्चना कुमारी उर्फ़ अर्चना राय भट्ट को डॉक्टरेट की उपाधि प्रदान की गयी ।

दृढ़ इच्छाशक्ति, निरंतर परिश्रम और ज्ञान के प्रति अटूट समर्पण किसी भी व्यक्ति को सफलता के शिखर तक पहुंचा सकता है। इसी सत्य को चरितार्थ किया है पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय की शोधार्थी अर्चना कुमारी उर्फ अर्चना राय भट्ट ने, जिन्होंने “पंडित दीनदयाल उपाध्याय एवं एकात्म मानव दर्शन का स्वरूप” विषय पर अपना शोधकार्य सफलतापूर्वक पूर्ण कर पीएचडी की उपाधि प्राप्त की है। यह उपलब्धि न केवल उनकी व्यक्तिगत शैक्षणिक यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव है, बल्कि भारतीय दार्शनिक एवं वैचारिक परंपरा के अध्ययन में एक सार्थक योगदान भी है।

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अर्चना राय भट्ट प्रारंभ से ही अध्ययनशील, जिज्ञासु एवं भारतीय इतिहास तथा संस्कृति के प्रति विशेष रुचि रखने वाली छात्रा रही हैं। उन्होंने कठिन परिस्थितियों और अनेक चुनौतियों के बीच अपने शोधकार्य को निरंतर आगे बढ़ाया। वर्षों की मेहनत, गहन अध्ययन, संदर्भ ग्रंथों के व्यापक विश्लेषण तथा विषय की गहरी समझ के परिणामस्वरूप उन्होंने अपने शोध को सफलतापूर्वक पूर्ण किया। उनकी यह उपलब्धि विशेष रूप से उन महिलाओं के लिए प्रेरणास्रोत है, जो शिक्षा और शोध के क्षेत्र में अपनी पहचान स्थापित करने का सपना देखती हैं।

उनके शोध का विषय “पंडित दीनदयाल उपाध्याय एवं एकात्म मानव दर्शन का स्वरूप” भारतीय राजनीतिक और दार्शनिक चिंतन के अत्यंत महत्वपूर्ण आयामों में से एक है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने स्वतंत्र भारत को एक ऐसी वैचारिक दिशा देने का प्रयास किया था, जिसमें व्यक्ति, समाज, राष्ट्र और प्रकृति के बीच संतुलित एवं समन्वित संबंध स्थापित हो। उनका एकात्म मानव दर्शन पश्चिमी पूंजीवाद और साम्यवाद दोनों से अलग एक भारतीय दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है, जिसमें मनुष्य को केवल आर्थिक इकाई नहीं, बल्कि शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा के समन्वित स्वरूप के रूप में देखा गया है।

अर्चना राय भट्ट ने अपने शोध में इस दर्शन के मूल तत्वों, उसके सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक आयामों तथा समकालीन भारत में उसकी प्रासंगिकता का गहन विश्लेषण किया है। शोध में यह स्पष्ट किया गया है कि एकात्म मानव दर्शन केवल एक राजनीतिक विचार नहीं, बल्कि भारतीय जीवन-दृष्टि का व्यापक स्वरूप है, जो समरस समाज, अंत्योदय, आत्मनिर्भरता और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अवधारणाओं को आधार प्रदान करता है। वर्तमान समय में जब वैश्विक स्तर पर उपभोक्तावाद, सामाजिक असमानता, पर्यावरणीय संकट और नैतिक मूल्यों के ह्रास जैसी चुनौतियां सामने हैं, तब यह दर्शन एक संतुलित एवं मानवीय विकास मॉडल प्रस्तुत करता है।

इस शोधकार्य का निर्देशन पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय के छात्र कल्याण अधिष्ठाता एवं संकायाध्यक्ष प्रो. राजीव रंजन ने किया। वहीं स्नातकोत्तर इतिहास विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. अरविन्द कुमार तथा डी.ए.वी. कॉलेज, बीएचयू वाराणसी के विभागाध्यक्ष एवं वरिष्ठ इतिहासकार प्रो. विनोद कुमार चौधरी का भी महत्वपूर्ण मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। उनके अकादमिक सहयोग और सुझावों ने शोध को एक मजबूत वैचारिक आधार प्रदान किया।

वाइवा परीक्षा के अवसर पर बाह्य पर्यवेक्षक के रूप मे प्रो. विनोद कुमार चौधरी, विभागाध्यक्ष, स्नातकोत्तर इतिहास विभाग, डी. ए. वी. कॉलेज, BHU वाराणसी, विभागाध्यक्ष, प्रो अरविन्द कुमार, स्नातकोत्तर, इतिहास विभाग, पाटलिपुत्र वि. पटना, शोध पर्यवेक्षक : प्रो राजीव रंजन, छात्र कल्याण अधिष्ठाता / संकायध्यक्ष, पाटलिपुत्र वि. पटना, डॉक्टर मुकेश कुमार, इतिहास विभाग, पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय, प्रो. प्रणय कुमार, पी-एच. डी. डिपार्टमेंट हेड, प्रो. रंजन कुमार, प्रो. शिव कुमार, इतिहास संकलन योजना, दक्षिण बिहार प्रान्त के प्रदेश महासचिव शैलेश कुमार, असिस्टेंट प्रोफेसर कुमार देवेश, राहुल झा, आकाश कुमार, एवं भोलेन्द्र कुमार सहित अनेक शिक्षाविद, शोधार्थी और बुद्धिजीवी उपस्थित रहे। उपस्थित विद्वानों ने शोधकार्य की सराहना करते हुए इसे भारतीय वैचारिक परंपरा और आधुनिक विमर्श के बीच सेतु स्थापित करने वाला महत्वपूर्ण अकादमिक प्रयास बताया।

अर्चना राय भट्ट की यह उपलब्धि केवल एक डिग्री प्राप्त करने की घटना नहीं है, बल्कि भारतीय चिंतन, सांस्कृतिक विरासत और राष्ट्र जीवन के मूल्यों को समझने एवं नई पीढ़ी तक पहुंचाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। उनका शोध भविष्य के विद्यार्थियों, शोधार्थियों और इतिहास के अध्येताओं के लिए उपयोगी संदर्भ सामग्री सिद्ध होगा। यह उपलब्धि इस बात का भी प्रमाण है कि समर्पण, अनुशासन और सतत प्रयास के बल पर कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं होता।

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