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योगी मॉडल के कारण कहीं लेने के देने न पड़ जाएं…………..

UB India News by UB India News
June 25, 2026
in TAZA KHABR, अपराध, पटना
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योगी मॉडल के कारण कहीं लेने के देने न पड़ जाएं…………..
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भरत तिवारी एनकाउंटर के बाद बिहार पुलिस विवादों में घिर गयी है। इसकी वजह से सम्राट चौधरी सरकार दबाव में है। इस घटना ने अब राजनीतिक रंग ले लिया है। विपक्षी दल सरकार पर हमले कर रहे हैं। इस पूरे परिदृश्य को देखने के बाद एक सवाल उठता है कि अपराध नियंत्रण का कौन सा तरीका कारगर और सही है? नीतीश कुमार का या सम्राट चौधरी का? नीतीश कुमार ने तो 20 साल राज किया लेकिन कभी किसी एनकाउंटर को लेकर विवादों में नहीं घिरे। लेकिन सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बने हुए करीब सवा दो महीने ही हुए हैं कि उनकी सख्त नीति सवालों के घेरे में आ गयी। भरत तिवारी एनकाउंटर में क्या सही और क्या गलत है, यह तो जांच के बाद पता चलेगा, लेकिन इस घटना के खिलाफ लोगों में जबरदस्त आक्रोश है। अगर सरकार के किसी काम से जनता नाराज है, तो यह शासन के लिए चिंता की बात है।

ऐसा पुख्ता सबूत हो कि अपराधी को कड़ी से कड़ी सजा मिले

नीतीश कुमार ने अपराध नियंत्रण के लिए साइंटिफिक इन्वेस्टिगेशन और स्पीडी ट्रायल का सहारा लिया था। जल्द से जल्द सटीक अनुसंधान करो, अपराधी के खिलाफ पुख्ता सबूत जुटा कर कोर्ट में पेश करो ताकि कोर्ट स्पीडी ट्रायल कर जल्द से जल्द सजा दे सके। इस पूरी योजना में ‘पुख्ता सबूत’ सबसे अहम कड़ी थी। कोई गवाह चाह कर भी पलट नहीं सकता था। सबकी कुंडली पुलिस के पास रहती थी। इसकी वजह से कोर्ट त्वरित गति से अपराधियों को सजा सुनाने लगा। ऐसी दफा के अंदर सजा का ऐलान होता कि बेल मिलना भी मुश्किल हो जाता। इससे अपराधी जेल के अंदर पहुंच गये। जो बाहर थे वे डर गये। इस तरह राज्य में अमन-चैन बहाल हो गया।

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वैज्ञानिक अनुसंधान ढीला, कमजोर सबूत, अपराधी को जमानत

हालांकि बाद में ये तरीका उतना कारगार नहीं रहा। समय के साथ वैज्ञानिक अनुसंधान ढीला पड़ता गया। पुलिस प्रमुख बदलते रहे। सबको अपने-अपने तरीके से काम करना पसंद था। मातहत पुलिस अधिकारियों को पहले जैसा कोई प्रेरणादायी पुलिस प्रमुख नहीं मिला। थाना स्तर की पुलिस जांच में पहले की तरह मुस्तैद नहीं रही। पुख्ता सबूत के अभाव में अपराधियों को जल्द जमानत मिल जाने लगी। जब कुछ दिनों के बाद वे जेल से बाहर आते तो और भी गंभीर अपराध में शामिल हो जाते। इसकी वजह से अपराधियों में कानून का भय खत्म हो गया।

सरकार ने पुलिस के हाथ खोले लेकिन सिर मुंडाते ही ओले

बिहार में जब अपराधियों का तांडव बढ़ने लगा तो सवाल उठा कि लॉ एंड ऑर्डर कैसे ठीक किया जाए? जब सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने अपराध नियंत्रण के लिए उत्तर प्रदेश के योगी मॉडल को अपनाया। उन्होंने पुलिस के हाथ खोल दिये। उन्होंने कहा कि अगर अपराधी पुलिस पर गोली चलाएंगे तो उन्हें 48 घंटे के अंदर जवाब मिलेगा। अब अपराधियों को माला पहनाने की जरूरत नहीं बल्कि उन्हें माला चढ़ाने की जरूरत है। इसके बाद बिहार पुलिस ने सेल्फ डिफेंस में एनकाउंटर का दौर शुरू किया। लेकिन एक-डेढ़ महीने में यह नीति विवादों में घिर गयी। भरत तिवारी एनकाउंटर के बाद पुलिस सवालों में है।

एडीजी ने माना कि पुलिस से चूक हुई

आरोप लगा कि पुलिस ने किसी खुन्नस में एनकाउंटर के नाम पर एक सिरफिरे युवक को खत्म कर दिया। इस मामले में अब आरोपी पुलिसकर्मियों पर एफआईआर दर्ज हो चुका है। एडीजी विधि व्यवस्था सुधांशु कुमार ने भी माना है कि इस मामले में पुलिस से चूक हुई है। बिहार मानवाधिकार आयोग ने इस केस में डीजीपी और मुख्य सचिव को तलब किया है।

  • क्या जल्दबाजी में पुलिस को खुली छूट देकर बिहार सरकार ने गलती की?
  • योगी आदित्यनाथ ने क्राइम कंट्रोल के लिए लागू किया है अलग फॉर्मूला
  • नीतीश राज में स्पीडी ट्रायल बना था क्राइम के खिलाफ कारगर हथियार

बिना तैयारी के योगी मॉडल लागू किया?

आरोप लग रहा है बिहार में बिना किसी तैयारी के योगी मॉडल को लागू करने की कोशिश की जा रही है। यूपी पुलिस ने पिछले 9 साल में 17 हजार से अधिक एनकाउंटर किये जिसमें 290 से अधिक अपराधी मारे गये। 11 हजार 800 से अधिक घायल हुए। लेकिन इसके लिए योगी आदित्यनाथ ने पुलिस तंत्र में बहुत व्यापक सुधार किये। उन्होंने पुलिस को जवाबी कार्रवाई की छूट तो दी लेकिन इस मामले में त्वरित फैसला लेने के लिए बड़े अधिकारियों को भी इसमें शामिल किया।

1972 से दबी थी फाइल, योगी ने पुलिस कमिश्नरेट प्रणाली लागू की

उत्तर प्रदेश में पहली बार उन्होंने सात शहरों (लखनऊ, नोएडा, कानपुर, वाराणसी, आगरा, गाजियाबाद और प्रयागराज) में पुलिस कमिश्नरेट प्रणाली लागू की। उत्तर प्रदेश में IAS अधिकारियों ने 1972 से ये फाइल दबा कर रखी हुई थी। इस प्रणाली के लागू होने से पुलिस कप्तानों को लाठीचार्ज, कर्फ्यू, फायरिंग जैसे सख्त आदेश देने का अधिकार मिल गया। पहले इसके लिए जिला मजिस्ट्रेट (डीएम) से अनुमति लेनी पड़ती थी। इससे पुलिस को गंभीर और संवेदनशील मामलों में त्वरित कार्रवाई का अधिकार मिल गया। यानी पुलिस को कुछ मामलों में ‘मजिस्टेरिल पावर’ भी मिल गया।

बिहार में पुलिस कमिश्नरेट प्रणाली लागू नहीं

लेकिन बिहार में पुलिस कमिश्नरेट प्रणाली लागू नहीं है। बड़ी आबादी वाला राज्य होने के बावजूद किसी शहर में यह व्यवस्था नहीं है। बिहार में कानून व्यवस्था जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक के बीच विभाजित है। यहां किसी हिंसक प्रदर्शन, जुलूस या असामाजिक तत्वों की भीड़ से निपटने के लिए अगर पुलिस को फायरिंग की जरूरत है तो वह कार्यकारी मजिस्ट्रेट के आदेश पर निर्भर रहती है। आपातकालीन परिस्थितियों में पुलिस केवल सेल्फ डिफेंस में ही अपनी मर्जी से गोली चला सकती है। बिहार में बहुत समय से मांग हो रही है कि यहां भी पुलिस कमिश्नरेट प्रणाली लागू की जाए। लेकिन इससे पहले जरूरी है कि बिहार की पुलिस ‘जवाबी कार्रवाई’ के नाम पर कोई मनमानी नहीं करे। केवल जिम्मेदार पुलिस ही सेल्फ डिफेंस में एनकाउंटर कर सकती है।

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