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अंतत: अमेरिका-ईरान के बाद इजरायल और हिजबुल्ला के बीच भी युद्धविराम लागू……………….

UB India News by UB India News
June 21, 2026
in अन्तर्राष्ट्रीय
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क्या ईरान पर आज होगा अब तक का सबसे घातक हमला ?
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इजरायल और हिजबुल्ला के बीच भी शुक्रवार को युद्धविराम पर सहमति बन गई। हालांकि, इससे पहले उसने लेबनान पर भीषण हमले किए, जिसमें 47 लोगों की मौत और 97 घायल हो गए। संभवत: इसी के चलते अमेरिका-ईरान के बीच स्विट्जरलैंड में होने वाली वार्ता भी टल गई। वार्ता सुबह होनी थी।

एक वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी ने बताया कि अमेरिका, कतर और ईरान की मध्यस्थता के बाद इजरायल और हिजबुल्ला के बीच समझौता हो पाया। वहीं, ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने इजरायली हमलों की कड़ी निंदा की। उन्होंने चेतावनी दी कि ऐसी सैन्य कार्रवाइयों के दूरगामी और खतरनाक परिणाम हो सकते हैं। ईरान का कहना है कि लेबनान में इजरायल की कार्रवाई वहां की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का उल्लंघन है।

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वार्ता के 60 दिवसीय चरण की शुरुआत हुई : राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि अमेरिका को सभी मोर्चों पर पूरी तरह युद्धविराम की उम्मीद है। उन्होंने ‘ट्रुथ सोशल’ पर एक पोस्ट में लिखा कि हम सभी मोर्चों पर पूर्ण युद्धविराम की अपेक्षा करते हैं, जिसमें लेबनान, हिजबुल्ला और इजरायल भी शामिल हैं। समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर होने के साथ ही गुरुवार से 60 दिनों की बातचीत की प्रक्रिया शुरू हुई।

ईरान आईएईए को आमंत्रित करेगा : ईरान संयुक्त राष्ट्र की परमाणु निगरानी एजेंसी को अपने परमाणु स्थलों का निरीक्षण करने के लिए आमंत्रित करेगा। ट्रंप के दूत स्टीव विटकॉफ ने अमेरिकी सांसदों को एक बैठक में यह जानकारी दी।

पोतों से शुल्क नहीं लेगा ईरान : ईरान ने घोषणा की कि 60 दिनों की वार्ता अवधि में होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले पोतों से कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा। ईरान के पीजीएसए (परसियन गल्फ स्ट्रेट अथॉरिटी) ने शुक्रवार को जारी नोटिस में कहा कि अंतरिम समझौते के प्रभावी रहने तक पोतों को अपने आगमन से कम-से-कम 48 घंटे पहले ट्रांजिट अनुरोध देना होगा। वहीं, युद्धविराम समझौते के बाद होर्मुज से गुजरने वाले वाणिज्यिक पोतों की संख्या दो महीने के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई है। गुरुवार को कुल 25 वाणिज्यिक पोत होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरे।

अकेला पड़ता इजरायल

अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध रोकने पर बनी सहमति का जहां दुनिया के ज्यादातर देश स्वागत कर रहे हैं, वहीं इजरायल की चिंता छिप नहीं रही है। अफसोस, युद्ध के अंत पर सहमति के बावजूद इजरायल ने लेबनान को निशाना बनाया। इससे कई सवाल खड़े हो गए। क्या युद्ध की समाप्ति के लिए इजरायल वाकई मन से राजी हो सका है? क्या वह फिर लेबनान को निशाना नहीं बनाएगा? ध्यान देने की बात है कि अभी सिर्फ सहमति पत्र पर हस्ताक्षर हुए हैं, शांति-समझौते को दो महीने में अंतिम रूप दिया जाना है। वैसे, खुद अमेरिका में ताजा सहमति पर आपत्ति जताई जा रही है। सहमति को अमेरिका के प्रतिकूल माना जा रहा है और इसकी चिंता अमेरिकी नेतृत्व से ज्यादा इजरायली नेतृत्व को है। सहमति पत्र पर दस्तखत के बाद ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला मोजतबा खामेनेई भी सक्रिय हो गए हैं और वह आगे अमेरिका से सीधी बातचीत के इच्छुक दिख रहे हैं।

दुनिया देख रही है, इस सहमति से ईरानी नेतृत्व प्रसन्न है। तेहरान नहीं चाहेगा कि अमेरिका ताजा सहमति से पीछे हटे। एक ओर, ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को बनाए रखने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा देगा, तो दूसरी ओर, वह चाहेगा कि उसे अपने पुनर्निर्माण के लिए वादे के मुताबिक, 300 अरब डॉलर जल्द से जल्द मिल जाएं। इन दोनों मुद्दों पर अमेरिका और ईरान के बीच बनी सहमति पर इजरायल में चिंता बहुत हद तक जायज है। ईरान के पुनर्निर्माण के मायने इजरायल के लिए बिल्कुल अलग हैं। ईरान परंपरागत रूप से हिजबुल्लाह जैसे हिंसक संगठनों का पैरोकार रहा है और हिजबुल्लाह से इजरायल की अदावत बहुत पुरानी है। सहमति अमेरिका-ईरान के बीच बनी है। इजरायल-ईरान या इजरायल-हिजबुल्लाह या इजरायल-हमास के बीच नहीं। आशंका है, ईरान के पुनर्निर्माण के साथ कहीं पश्चिम एशिया में इजरायल विरोधी आतंकी संगठनों का पुनर्निर्माण न होने लगे। ईरान के लिए अमेरिका दूर है और इजरायल पास। ईरान की मिसाइलें अमेरिकी जमीन तक नहीं पहुंचतीं, पर इजरायल तक पहुंचती हैं। हिजबुल्लाह और ईरान के हमले में कम से कम 60 इजरायलियों की मौत हुई है। गौरतलब है, हिजबुल्लाह ही नहीं, हमास जैसे आतंकी संगठन को भी ईरान से मदद मिलती रही है। साल 2023 में 7 अक्तूबर को हमास ने जब हमला किया था, तब हजार से अधिक इजरायली मारे गए थे और अनेक बंधक बनाए गए थे।

बेशक, इजरायली आक्रामकता की निंदा होनी चाहिए, पर उसकी चिंता को पूरी तरह नजरंदाज करना नाइंसाफी होगी। हर समाज और देश की अपनी पीड़ा होती है, लेकिन हर बार हथियार उठा लेना हल नहीं है। यह बात इजरायल पर जितनी लागू होती है, उतनी ही उसके दुश्मनों पर भी। एक पहलू यह भी है कि पश्चिम एशिया में मजहबी बुनियाद पर एक बड़ा उम्मा खड़ा दिखता है और उसके रूबरू इजरायल अकेला नजर आता है। ताजा सहमति के बाद इजरायल फिर अकेला है और अमेरिकी उप-राष्ट्रपति जेडी वेंस ने इजरायली ‘घबराहट’ पर तीखा हमला बोला है। ईरान का विश्वास जीतना जरूरी है, पर इजरायल को आशंकाओं के साथ अकेला छोड़ देना, अपना सिर रेत में छिपा लेने के समान है। समय आ गया है, दुनिया में आतंकवाद की समस्या से पूरी ईमानदारी से निपटा जाए। खुद पश्चिम एशियाई मुल्कों को यह तय करना होगा कि वे आपस में आखिर कब तक लड़ेंगे? इन मुल्कों को अमेरिका और यूरोपीय देशों की खुशहाली से कुछ तो सीखना चाहिए।

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