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दलबदल की आंधी तेज है ,टूटने से बचना बहुत बड़ी चुनौती है……………..

UB India News by UB India News
June 18, 2026
in खास खबर, प्रदेश, ब्लॉग
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दलबदल की आंधी तेज है ,टूटने से बचना बहुत बड़ी चुनौती है……………..
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दलबदल या दलों में टूट की सियासत इन दिनों बहुत तेज हो गई है। तृणमूल कांग्रेस की टूट अभी ताजा ही है, तो उद्धव ठाकरे की शिव सेना की टूट सामने आने लगी है। दोनों टूट में फर्क यही है कि तृणमूल का आलाकमान अपनी टूट को बचाने के लिए ऊपरी तौर पर बहुत सक्रिय नहीं दिख रहा था, लेकिन उद्धव ठाकरे अपनी बाकी बची पार्टी को बचाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं। शिव सेना (यूबीटी) के शायद छह सांसद अलग दल के रूप में मान्यता प्राप्त करने के प्रयास में लगे हैं और अंतत: एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिव सेना में शामिल हो जाएंगे। हालांकि, उद्धव ठाकरे और उनके वरिष्ठ नेता-प्रवक्ता संजय राउत पार्टी सांसदों को अपनी चिर-परिचित आक्रामकता के साथ एकजुट करने के प्रयास में लगे हैं। दिल्ली में जिस तरह की कवायद चल रही है, उससे ऐसा लगता है कि उद्धव की सेना में टूट की स्थिति गुरुवार को स्पष्ट हो जाएगी। यह उनके नेतृत्व वाली सेना में दूसरी टूट होगी। अगर यह टूट हुई, तो न सिर्फ महाराष्ट्र की सियासत बदलेगी, बल्कि उद्धव ठाकरे को फिर से जमीनी तौर पर जूझना पड़ेगा। दलबदल की आंधी तेज है और टूटने से बचना बहुत बड़ी चुनौती है।

टूट के बादल राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण उत्तर प्रदेश में भी उमड़ते लग रहे हैं, पर बरसेंगे या नहीं, कहना कठिन है। वैसे, आज की राजनीति में कुछ भी संभव है। यहां अनहोनी को होनी बनने में ज्यादा वक्त नहीं लगता है। राजनेताओं में न पहले जैसी राजनीतिक शुचिता है और न राजनीतिक दलों में पहले जैसा अनुशासन। समय के साथ लगातार महंगी होती राजनीति अपनी अलग ही राह पर आगे बढ़ रही है। दलबदल में धन की भूमिका पर चर्चा तृणमूल कांग्रेस की टूट के समय में नहीं हुई थी, पर उद्धव सेना में पचास करोड़ और पंद्रह करोड़ रुपये के आंकड़े उछाले जा रहे हैं। राजनीति में धन का इस्तेमाल चौंकाता नहीं है, पर यहां जो पीड़ित होता है, वही धन का रोना रोता है। दलबदल के जो मामले सामने आ रहे हैं, उनसे साफ पता चलता है, राजनीतिक दल अब आत्म-समीक्षा नहीं करते हैं। उनके संगठन की अब बड़ी बैठकें नहीं होती हैं। दलों में अब वैसा लोकतंत्र नहीं है, जैसी उम्मीद की जाती है। ये दल किसी एक नेता या उसके छोटे समूह द्वारा संचालित हो रहे हैं। मनमुटाव तो हर पार्टी में होता है, लेकिन परस्पर संवाद या सत्ता की शक्ति से पार्टियां फिर भी मजबूत बनी रहती हैं, पर टूट जब सबके सामने आती है, तब पार्टी की असली कमी-कमजोरी का पता चलता है। तृणमूल कांग्रेस के मामले में हमने यह देखा है, कमजोरियों को दबाया जा रहा था और अब ऐसा लग रहा है कि यह पार्टी कम से कम तीन टुकड़े होने वाली है।

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