सुपर अल-नीनो जैसी गंभीर जलवायु घटना का खतरा हमारे सिर पर खड़ा हो गया है। इस प्राकृतिक आपदा से जूझने के लिए देश को गंभीर और त्वरित नीति की जरूरत है। जब भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के ऊपर का पानी असामान्य रूप से गर्म होकर दो डिग्री सेल्सियस की सीमा को पार कर जाता है, त वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण पूरी तरह बिगड़ जाता है। इसका सीधा असर भारतीय उपमहाद्वीप के मानसून पर पड़ता है। मानसून के कमजोर पड़ने का मतलब है खरीफ की बुवाई में देरी, सिंचाई के संसाधनों पर दबाव व अंततः अनाज व ताजा उत्पादों की उपलब्धता में भारी गिरावट। इससे देश के करोड़ों किसानों की आय, ग्रामीण रोजगार और बाजार में महंगाई का पूरा चक्र प्रभावित होता है।
ऐतिहासिक साक्ष्य और आंकड़े गवाह हैं कि जब-जब प्रशांत महासागर में यह हलचल तीव्र हुई, तब-तब भारत में औसत मौसमी वर्षा न सिर्फ कम रही, बल्कि उसकी असमानता भी खतरनाक स्तर तक बढ़ी है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग और पिछले 150 वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि देश ने जितने भी भीषण सूखे झेले हैं, उनमें से लगभग अस्सी प्रतिशत का सीधा संबंध अल-नीनो वर्षों से रहा है। वर्ष 1997 और 2015 के सुपर अल-नीनो इसके हालिया उदाहरण हैं, जब देश के सैकड़ों जिले सूखे की चपेट में आ गए थे और मानसून सामान्य से चौदह प्रतिशत तक कम दर्ज किया गया था।
इस साल भी देश के बड़े हिस्से से मानसूनी बादल गायब दिखाई दिए। मौसम विभाग के मुताबिक, 4 जून से 15 जून के बीच देश में सामान्य 53.7 मिमी के मुकाबले सिर्फ 19.2 मिमी बारिश हुई, यानी बारिश में 64 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। इससे बिहार, उत्तर प्रदेश, दिल्ली समेत 16 राज्य प्रभावित हुए हैं। अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान के शोध बताते हैं कि एक तीव्र अल-नीनो से वर्ष में देश के कुल धान उत्पादन में 10 से 15 प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है। जब खरीफ फसलों की पैदावार घटती है, तो स्थानीय बाजारों में आपूर्ति कम होती है और कीमतें आसमान छूने लगती हैं।
इसके साथ ही कृषि लागत का बढ़ना भी एक वास्तविक और बड़ा आर्थिक खतरा है। ये सभी छोटे और सीमांत किसानों के लिए भारी आर्थिक बोझ बन जाते हैं। भारतीय रिजर्व बैंक के शोध-पत्रों के अनुसार, कमजोर मानसून के कारण पैदा होने वाला यह कृषि संकट सीधे तौर पर खाद्य मुद्रास्फीति को एक से डेढ़ प्रतिशत तक बढ़ा देता है। जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल की रिपोर्टों से स्पष्ट है कि अब ग्लोबल वार्मिंग के कारण अल-नीनो का प्रभाव केवल सूखे तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वातावरण में अत्यधिक गर्मी व नमी के कारण बेमौसम तेज बारिश, ओलावृष्टि और तीव्र लू जैसी चरम मौसमी घटनाएं बढ़ जाती हैं।
इस दोहरे खतरे का सामना करने के लिए दीर्घकालिक रणनीति के अंतर्गत नीति आयोग के सुझावों पर हमें कृषि-कर्म में विविधता की नीति अपनानी होगी। कम जल-उपयोग वाली फसलों और मोटे अनाजों को बढ़ावा देकर तथा सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियों को अपनाकर न केवल पानी की बचत की जा सकती है, बल्कि फसल की पैदावार में भी स्थिरता लाई जा सकती है। हमारे कृषि अनुसंधान संस्थानों को चरम मौसमी सहिष्णु बीज विकसित करने पर ध्यान केंद्रित करना होगा। नीति-निर्माताओं को त्वरित वित्तीय सहायता, प्रभावी फसल बीमा योजनाएं और राहत कार्यों के लिए बजटीय आवंटन को सुदृढ़ करना होगा। केंद्र व राज्यों के बीच बेहतर समन्वय ही जल स्रोतों के उचित वितरण और खाद्य उपलब्धता को सुनिश्चित कर सकता है।
यह याद रखना जरूरी है कि सुपर अल-नीनो केवल एक मौसमी घटना नहीं, बल्कि समूचे आर्थिक और सामाजिक तंत्र की परीक्षा लेने वाली आपदा है। इसलिए तैयारियां केवल कृषि मंत्रालय तक सीमित न होकर खाद्य वितरण, जन-स्वास्थ्य, ऊर्जा आपूर्ति और ग्रामीण बैंकिंग सेवाओं तक विस्तृत होनी चाहिए। भारतीय समाज में पारंपरिक रूप से अनुकूलन की अद्भुत क्षमता है, लेकिन इसे जागरूक नीतियों, समयबद्ध कार्रवाई और स्थानीय भागीदारी के मजबूत संबल की जरूरत होगी, तभी हम इस बड़े संकट को टालने में सफल हो सकेंगे।







