सुबह अखबार हाथ में आते ही देश-दुनिया की बड़ी खबरों के बीच नजर अक्सर महंगाई पर टिक जाती है। ‘रसोई गैस का संकट’, ‘सब्जियों के बढ़ते दाम या ‘कमजोर होता रुपया’-ये सिर्फ सुर्खियां नहीं, बल्कि मध्यमवर्गीय परिवारों के बजट, बच्चों की फीस और भविष्य की सुरक्षा से जुड़ी रोजमर्रा की चिंताएं हैं। बदलते मौसम की मार सभी वर्गों की मुश्किलें अलग से बढ़ा रही है। देखा जाए तो ये दोनों चिंताओं की कड़ी कहीं न कहीं एक दूसरे से जुड़ी है। हमें समझना होगा कि पर्यावरण का सीधा संबंध हमारी रसोई, बिजली के बिल, मोटरसाइकिल की टंकी और खेतों की मिट्टी से है।
हाल में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ऊर्जा और संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग, जैविक खेती को अपनाने और ईंधन की खपत घटाने, अनावश्यक विदेशी यात्राओं और सोने की खरीद से बचने और यथासंभव ‘वर्क फ्राम होम’ अपनाने की अपील की। उन्होंने इस दशक को ‘संकटों का दशक’ बताते हुए कहा कि कोविड-19, युद्ध और ऊर्जा संकट जैसी वैश्विक चुनौतियां विकास और गरीबी उन्मूलन की उपलब्धियों पर असर डाल रही हैं। इस वैश्विक परिदृश्य को वित्तीय मामलों के जानकार राबर्ट कियोसाकी की गंभीर चेतावनियों के संदर्भ में भी देखा जा सकता है। उनका तर्क है कि सभ्यताओं का पतन किसी बाहरी हमले से नहीं, बल्कि आंतरिक महंगाई, आर्थिक अनिश्चितता और संसाधनों के दुरुपयोग से होता है। प्रधानमंत्री की अपील के संदर्भ की ही बात करें तो आज भारत अपनी जरूरत का लगभग 90 प्रतिशत कच्चा तेल और 50 प्रतिशत प्राकृतिक गैस आयात करता है।
होर्मुज जलमार्ग में गतिरोध के चलते उपजे भू-राजनीतिक संकट के कारण कच्चे तेल की कीमतें सौ डालर प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं, जिससे देश का आयात बिल तेजी से बढ़ा है। इसी बीच डालर मजबूत होने से रुपया गिरकर लगभग 95 रुपये प्रति डालर के रिकार्ड निचले स्तर पर पहुंच गया, जिसका सीधा असर आम आदमी की जेब और देश की आर्थिक संप्रभुता पर पड़ रहा है। ऐसे कठिन समय में हमारे देश की कृषि नीति इस संकट से निपटने का मजबूत माध्यम बन सकती है। भारत अपनी खाद्य सुरक्षा के लिए आवश्यक यूरिया का लगभग 70 प्रतिशत विदेशों से आयात करता है। यूरिया निर्माण में प्राकृतिक गैस के उपयोग के कारण वैश्विक गैस संकट सरकारी उर्वरक सब्सिडी बजट को कई गुना बढ़ा देता है।
ऐसे में हमें जैविक कृषि और प्राकृतिक खेती की ओर तेजी से बढ़ना होगा। गाय के गोबर और गोमूत्र आधारित जैव-इनपुट्स, कंपोस्टिंग और बायोगैस स्लरी के विकेंद्रीकृत उपयोग से रासायनिक यूरिया पर निर्भरता काफी घटाई जा सकती है। यह केवल मिट्टी की सेहत सुधारने का पारंपरिक उपाय नहीं, बल्कि विदेशी मुद्रा भंडार बचाने वाला एक क्रांतिकारी ‘कृषि-संयम’ है, जो देश को खाद्य सुरक्षा में आत्मनिर्भर बनाता है।
भारत ने अतीत में भी बड़े संकटों का सामना सामूहिक त्याग से किया है। जैसे 1962 के युद्ध में माताओं का स्वर्ण दान और 1965 के अन्न संकट में लाल बहादुर शास्त्री की अपील पर पूरे देश द्वारा सप्ताह में एक दिन का उपवास। आज का संकट उतना कठिन नहीं है। वर्तमान प्रधानमंत्री का ऊर्जा संरक्षण और मितव्ययिता का आह्वान हमारे पूर्वजों के त्याग की तुलना में सरल और व्यावहारिक है। हमें बस अपनी रोजमर्रा की आदतों में थोड़ा अनुशासन और संयम लाना है।
संयमित जीवन हमारी सांस्कृतिक चेतना का मूल है। महात्मा गांधी ने कहा था कि पृथ्वी के पास हर मनुष्य की आवश्यकता पूरी करने के लिए पर्याप्त संसाधन हैं, लेकिन किसी एक के लालच को शांत करने के लिए नहीं। यही भाव आज भारत के ‘लाइफ मिशन का आधार है। इसी संदर्भ में कबीर की सीख भी उतनी ही प्रासंगिक है कि ‘साईं इतना दीजिए, जामे कुटुंब समाय। मैं भी भूखा ना रहूं, साधु न भूखा जाय॥’ तात्पर्य यही है कि आवश्यकता और लालच का अंतर समझने पर मितव्ययिता केवल आर्थिक नहीं, बल्कि एक नैतिक और सामाजिक कर्तव्य एक ‘राष्ट्रीय संयम यज्ञ’ बन जाती है।
एक आम नागरिक के रूप में हम इस संयम यज्ञ में छोटी-छोटी लेकिन प्रभावी आदतों के माध्यम से महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं। इसके लिए बड़े आर्थिक त्याग की आवश्यकता नहीं है, बल्कि दैनिक जीवन में अनुशासन और जागरूकता अपनाने की जरूरत है। हमें ऊर्जा और जल संरक्षण को अपनी आदत बनाना चाहिए। एलईडी बल्ब और ऊर्जा-दक्ष उपकरणों का उपयोग को बढ़ावा दें। कमरे से निकलते ही लाइट और पंखे तुरंत बंद करें। पानी का विवेकपूर्ण उपयोग भी उतना ही आवश्यक है। साझा सवारी, साइकिल और पैदल चलने को प्राथमिकता देना भी आवश्यक है।
हमने 2047 तक देश को विकसित राष्ट्र बनाने का संकल्प लिया है, लेकिन विकसित राष्ट्र का वास्तविक अर्थ केवल जीडीपी में बढ़ोतरी या बड़ी औद्योगिक इमारतों की संख्या से नहीं मापा जा सकता। सच्चा विकास वही है, जहां ऊर्जा सुरक्षा सुदृढ़ हो और संसाधनों का वितरण न्यायसंगत हो। यदि हम अपनी उपभोगवादी जीवनशैली में बदलाव नहीं लाते हैं, तो वैश्विक बाजार के झटके हमारे सपनों को बाधित करते रहेंगे। काउंसिल आन एनर्जी, एनवायरमेंट एंड वाटर-सीईईडब्ल्यू के अनुसार यदि भारत अभी से संसाधन-कुशल मार्ग पर आगे बढ़ता है, तो वर्ष 2047 तक यह हरित अर्थव्यवस्था देश में 1.1 ट्रिलियन डालर (लगभग ₹97.7 लाख करोड़) का नया बाजार मूल्य सृजित कर सकती है, जिससे लगभग 4.8 करोड़ नए रोजगार के अवसर तैयार हो सकते हैं।
मितव्ययिता और ऊर्जा-संयम कोई नकारात्मक विचार नहीं हैं, बल्कि ये राष्ट्र निर्माण के वे संक्रमणकालीन अनुशासन हैं जो हमें दीर्घकालिक सुरक्षा और आत्मनिर्भरता की ओर ले जाते हैं। हम यह साझा संकल्प लें कि हम अपने घरों में संयम और जैविक खेती की नई चेतना का संचार करेंगे । आज हमारे द्वारा सहेजा गया पानी का प्रत्येक कतरा, बचाई गई बिजली की प्रत्येक इकाई और रासायनिक खाद के स्थान पर उपयोग किया गया प्राकृतिक इनपुट हमारे भविष्य की सुरक्षा का बीज बनेगा। यही छोटे-छोटे प्रयास विकसित राष्ट्र के विराट लक्ष्य की पूर्ति का माध्यम बनेंगे।






