अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मई 2026 के आखिर में एक प्रस्ताव रखा कि ईरान समेत सभी अरब और इस्लामी देश अनिवार्य रूप से अब्राहम समझौते में शामिल हों। यह शर्त पश्चिम एशिया में स्थिरता लाने के बजाय वाशिंगटन की राजनीति को बेनकाब करती है। अब्राहम समझौता 2020 में अमेरिका की मध्यस्थता से हुआ ऐतिहासिक कूटनीतिक समझौता है, जिसके तहत इजरायल और कई अरब- मुस्लिम देशों के बीच दशकों पुरानी दुश्मनी को खत्म करके औपचारिक राजनयिक, आर्थिक और सुरक्षा संबंध स्थापित किए गए हैं।
तथ्य यह है कि ट्रंप जिन देशों को इसमें शामिल करना चाहते हैं, उनमें से आधे दशकों से इजरायल के साथ कूटनीतिक रूप से जुड़े हुए हैं। ये देश हैं, मिस्र, जॉर्डन और तुर्किये। वहीं सऊदी अरब, कतर और पाकिस्तान जैसे देशों ने साफ कर दिया है कि मौजूदा परिस्थितियों में ऐसा करने का उनका कोई इरादा नहीं है। यूएई, बहरीन, मोरक्को व सूडान तो अमेरिकी सुरक्षा और आर्थिक प्रलोभनों के कारण पहले से ही इजरायल के साथ हैं। इसलिए ट्रंप का यह दांव भले वाशिंगटन के मुफीद हो, पर पश्चिम एशिया में इसका असर उल्टा होगा।
इस प्रकरण में सऊदी अरब का रुख सबसे अहम व सुसंगत रहा है। रियाद पिछले चार सालों से लगातार दोहराता आ रहा है कि संबंध सुधारने के लिए फलस्तीनी राष्ट्र-निर्माण की दिशा में पहल जरूरी है। क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान का यह रुख अडिग है। हालांकि, दक्षिणपंथी इजरायल सरकार फलस्तीनी राष्ट्र की कट्टर विरोधी है। 28 मई को जब ट्रंप अरब नेताओं पर इजरायल के साथ रिश्ते सामान्य करने का दबाव डाल रहे थे, तभी इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने खुलासा किया कि उन्होंने अपनी फौज को गाजा पट्टी का 70 प्रतिशत हिस्सा कब्जे में लेने का निर्देश दिया है। यह हमास के साथ अक्तूबर 2025 में हुए संघर्ष-विराम समझौते का उल्लंघन था, जिसके तहत इजरायल को गाजा की सिर्फ 53 प्रतिशत जमीन आवंटित की गई थी। जब उनसे पूछा गया कि क्या इजरायल को पूरा गाजा ले लेना चाहिए, तो उनका जवाब था- पहले 70 प्रतिशत। पाकिस्तान ने इस समझौते में शामिल होने से इनकार कर दिया। कतर ने इसे खारिज कर दिया, तो तुर्किये ने अव्यावहारिक बता दिया।
सऊदी अरब में 81 प्रतिशत लोग इजरायल से रिश्ते सामान्य करने को खराब मानते हैं। अब्राहम समझौते में शामिल मोरक्को की स्थिति यह है कि 2022 में वहां की 31 प्रतिशत जनता ने इसे समर्थन दिया था, जो गाजा संघर्ष के बाद 13 प्रतिशत पर आ गया है। ट्रंप का फॉर्मूला नेताओं से यह उम्मीद करता है कि वे पहले रिश्ते सामान्य करें और फिर फलस्तीनी राष्ट्र की बात करें। जब ट्रंप ने कहा कि तेहरान शायद किसी दिन इन समझौतों में शामिल हो सकता है, तो ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने इसे ‘कोरी कल्पना’ कहकर तुरंत खारिज कर दिया और कहा कि ईरान कभी भी ‘किसी ऐसे कब्जे वाले शासन को मान्यता नहीं देगा, जिसने नरसंहार किया हो और बच्चों की हत्या की हो।’ उल्टे तेहरान ने संघर्ष-विराम के किसी भी समझौते को सभी मोर्चों पर लड़ाई रोकने की शर्त से जोड़ दिया है।
यहां बड़ी परीक्षा नई दिल्ली की है। भारत ने इजरायल, यूएई समेत खाड़ी क्षेत्र के साथ बेहद सावधानी से संबंध विकसित किए हैं। इसकी यह रणनीति भारत-इजरायल-यूएई-अमेरिका साझेदारी और प्रस्तावित भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे का आधार है। भारत के ईरान से भी पुराने संबंध हैं। भारत की नीति द्वि-राष्ट्र समाधान की है। ऐसे में, फलस्तीनी अधिकारों को हाशिये पर धकेलने वाला जबर्दस्ती का प्रस्ताव उसके हित में नहीं है। इस पूरे प्रकरण का सबक साफ है कि ट्रंप संबंध सामान्य बनाने को लेकर जितनी जोर-जबरदस्ती करेंगे, उतनी ही अपनी विदेश-नीति को बदनाम करेंगे। अमेरिकी सूत्रों ने पुष्टि की है कि ईरान के साथ अस्थायी ढांचा समझौता 31 मई तक राष्ट्रपति के पास लंबित था, जिसमें अब्राहम समझौते का कहीं कोई जिक्र नहीं था।
साफ है, संबंधों को स्थायी बनाना है, तो उसे थोपा नहीं जा सकता व फलस्तीन को अनदेखा नहीं किया जा सकता। क्षेत्रीय आम सहमति के बिना बनी शांति, बस दिखावा होगी और दिखावे ज्यादा दिन नहीं टिकते।






