समस्त पश्चिमी यूरोप में वसंत ऋतु होने के बावजूद प्रचंड लू जारी है। 22 अप्रैल, 2026 को एक नया अप्रिय कीर्तिमान स्थापित हुआ कि दुनिया के 50 सबसे अधिक तापमान वाले शहर भारत में हैं। मई में विभिन्न स्थानों पर 47 डिग्री से अधिक तापमान दर्ज हुआ। इनमें से उत्तर प्रदेश के बांदा में करीब 1,400 ट्रांसफर्मर को असहनीय तापमान में जलने से बचाने के लिए उन पर पानी डालना पड़ा। कई शहरों में विद्युत सब-स्टेशन पर पीएसी तैनात करनी पड़ी, मानो दंगे की आशंका हो। कई जगहों पर दिन में कर्फ्यू-सा सन्नाटा था। कुछ जगहों पर तो एलईडी रोशनी में रात्रि-खेती की जा रही। कभी-कभी लगता है, यह कोई भयावह स्वप्न है।
आज पर्यावरण दिवस है। करोड़ों की संख्या में पौधरोपण के नए कीर्तिमान बनेंगे। तमाम समारोहों में संसाधनों का अपव्यय होगा और अनगिनत प्लास्टिक का उपयोग होगा। बहुत से वक्ता कहेंगे, ‘हमें पर्यावरण भविष्य की पीढ़ी के लिए बचाना है।’ जी नहीं, अब वह समय निकल चुका है, अब तो आज की पीढ़ी के लिए इसे बचाना है। अच्छी बात है, ‘यूएनईपी’ द्वारा 5 जून को पर्यावरण दिवस मनाने की परंपरा प्रारंभ की गई है। इस वर्ष की थीम है ‘जलवायु कार्रवाई- प्रकृति से प्रेरित, हमारी जलवायु और भविष्य के लिए।’
भारतीय संस्कृति तो सदा से प्रकृति-प्रेरित रही है। यहां वृक्षों की पूजा, जैसे आंवला नवमी, पीपल पूर्णिमा, तुलसी विवाह जैसे त्योहार हैं। हमारे देवी-देवताओं के वाहन भी पशु-पक्षी ही हैं, यानी मनुष्य व अन्य जीवों का सह-अस्तित्व। नदियों को तो यहां मैया कहा ही जाता है। भागवत पुराण में उल्लेख है कि भगवान कृष्ण ने अपने अनुयायियों को इंद्रदेव के अतिरिक्त प्रकृति की भी पूजा करने को कहा। आज इस सोच और आचरण में जमीन-आसमान का अंतर है। ‘मानव-वन्यजीव संघर्ष’ आम बात हो गई है, क्योंकि अनियंत्रित विकास से जीव-जंतुओं के घर, यानी वन समाप्त होते जा रहे हैं। शरद और ग्रीष्म ऋतु के बीच की मनोहारी वसंत ऋतु तो अब लगभग समाप्त हो गई है। कम फूलों के कारण पराग न मिलने से मधुमक्खियों ने अनेक स्थानों पर आक्रमण करना शुरू कर दिया है।
पर्यावरण विशेषज्ञ रिचर्ड महापात्रा की मानें, तो जलवायु परिवर्तन इस शताब्दी का अस्तित्वगत खतरा है। इसके कारण वैश्विक गरीबी में साल 2030 तक तीन प्रतिशत कमी का लक्ष्य कई दशकों में भी पूरा नहीं हो सकेगा। विश्व की 60 प्रतिशत से अधिक आबादी जलवायु संबंधी चरम घटनाओं से प्रभावित है और उनमें भी सबसे अधिक निर्धन वर्ग असुरक्षित है।
संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के अनुसार, लू के बढ़ते दिनों के कारण आने वाले समय में भारत में धान का उत्पादन 40 प्रतिशत तक घट सकता है। हमारे देश में 70 प्रतिशत कैलोरी तो चावल से ही प्राप्त होती है, तो इसका परिणाम हम सब पर पड़ेगा। गेहूं का उत्पादन भी 34 प्रतिशत तक गिरने की आशंका है। जलवायु परिवर्तन से मनोवैज्ञानिक समस्याएं भी बढ़ रही हैं। सेहत की एक नई चुनौती ‘इको घबराहट’ है, जो उन लोगों में पाई जा रही है, जिनका जीवन-यापन, निवास स्थान बदलती हुई जलवायु से प्रभावित हो रहा है। युवा पीढ़ी में अपने भविष्य को लेकर असामान्य चिंता है कि उनके जीवन-काल में यह पृथ्वी रहने लायक रहेगी या नहीं?
फिर हम किसे झुठला रहे हैं? अपने आप को? प्रगति के आकलन के लिए आंकड़े आवश्यक हैं, पर क्या फर्जी आंकड़ों व रैंकिंग का कोई दीर्घकालीन परिणाम है? हर वर्ष पर्यावरण दिवस पर पौधरोपण के नए कीर्तिमान स्थापित होते हैं। यदि अधिकांश रोपित पौधे जीवित रहते, तो जलवायु में सुधार कुछ वर्षों में ही परिलक्षित हो जानी चाहिए थी।
बीते 27 वर्षों से यह लेखिका पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी रही है और लगभग सात लाख विद्यार्थियों व शिक्षकों के साथ सतत जीवन शैली पर ‘इंटरेक्टिव सेशन’ ले चुकी है। इसी क्रम में एक विद्यार्थी की सुंदर पर्यावरण परियोजना को देखकर जब उससे पूछा गया कि परियोजना में दर्शायी गई किस बात को उसने अपने जीवन में अपना रखा है? तो उसने बेलाग कहा, ‘मैम, कोई नहीं। यह तो केवल एक परियोजना है अच्छे नंबर पाने के लिए।’ जब तक बड़े लोग, समाज के प्रतिष्ठित, विख्यात व्यक्ति अपने आचरण में पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता नहीं दर्शाएंगे, तब तक बच्चों का ज्ञान तो कागजी ही रहेगा।
पर्यावरण संरक्षण के लिए सरकार द्वारा कई कदम उठाए गए हैं। इलेक्ट्रिक वाहनों पर दिए जा रहे अनुदान के फलस्वरूप अब ईवी वाहन समस्त वाहनों का सात प्रतिशत हो गया है। वर्ष 2030 तक 30 प्रतिशत ईवी निजी वाहनों का लक्ष्य है। गौर करने की बात यह है कि इनमें से कितने इलेक्ट्रिक वाहन ‘क्लीन एनर्जी’ से संचालित हैं, वरना केवल प्रदूषण का स्थान बदलेगा। प्रकृति हमें संतुलन सिखाती है। महात्मा गांधी ने कहा था, ‘पृथ्वी के पास मनुष्य की आवश्यकताओं के लिए पर्याप्त संसाधन है, परंतु उसकी लोलुपता के लिए नहीं।’ आज के भौतिकवादी युग में खरीदारी एक मनोवैज्ञानिक बीमारी सी हो गई है। प्रकृति दूसरों को देना सिखाती है, जो हमारी संस्कृति की मूल विचारधारा रही है, पर आज पूरा ध्यान ‘मैं’ पर केंद्रित है।
धरती बहस या समझौते नहीं करती। वह सिर्फ संकेत भेजती है- पिघलते ग्लेशियर, बढ़ते समुद्री जल-स्तर, भयावह वनाग्नि, असहनीय तापमान और चरम जलवायु घटनाओं के रूप में। ये संदेश अब सशक्त हो गए हैं। दशकों से दुनिया जलवायु परिवर्तन की बात सुनती आ रही है- चेतावनी, लक्ष्य, दूर की समय-सीमा। यह प्रतिक्रिया प्राय: शोरगुल से घिरी रही है- निर्णय व कार्यान्वयन में देरी करना, ध्यान भटकाना और कुछ लोगों द्वारा तो खारिज कर देना।
अब विनाश सामने है, तो क्या हम जागेंगे? क्या हम व्यक्तिगत और सामुदायिक रूप से वृक्ष लगाएंगे और उनका ध्यान रखेंगे? क्या हम जीवन शैली के चार जादुई मंत्रों- ‘रिफ्यूज-रिड्यूस-रीयूज और रिसाइकिल’ को अपने दैनिक आचरण का हिस्सा बनाकर पर्यावरण संरक्षण की दिशा में कदम बढ़ाएंगे? क्या बड़े अपने आचरण से बच्चों को प्रेरित करेंगे? क्या हम समाधान का हिस्सा हैं या ‘अपनी पृथ्वी अपना घर’ के विनाश के मूकदर्शक? निर्णय तो हमें ही करना होगा।







