मानसून भारत के लिए ताकत है, आधार है, इंतजार है और केरल में यह इंतजार पूरा हो गया है। तीन दिन की देरी से सही, गुरुवार 4 जून को मानसून ने भारत भूमि का स्पर्श कर लिया। आम तौर पर 1 जून को मानसून का पदार्पण हो जाता है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग का अनुमान है, 15 जून तक मानसून आधे से ज्यादा भारत को नहला देगा और 30 जून से पहले ही राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली पहुंच जाएगा। बहरहाल, 23 मई से ही मानसून अरब सागर में ठिठका हुआ था और यहां कयास लगाए जा रहे थे कि इस साल बारिश कम होगी। सुपर अल नीनो का खतरा रहेगा। ऐसे में, मानसून के आने पर वैज्ञानिकों के लिए यह अध्ययन महत्वपूर्ण हो गया है कि इस बार बारिश कहां-कितनी होगी। जहां भारत में बारिश का इतिहास राज्य-दर-राज्य अलग रहा है, वहीं, कई बार सुपर अल नीनो का अनुमान भी गलत साबित हुआ है। भारत में लोग यही उम्मीद करेंगे कि इस बार भी सुपर अल नीनो जैसी कोई त्रासदी न घटित हो, खतरा किसी तरह से टल जाए। वैसे, मोटे तौर पर यही माना जा रहा है कि समग्रता में इस बार बारिश सामान्य से कम होगी, पर लोग भरपूर बारिश के लिए प्रार्थना, दुआ जरूर करेंगे।
अभी उन इलाकों में खुशी का माहौल है, जहां मानसून पहुंच गया है। संपूर्ण लक्षद्वीप, केरल, माहे, कर्नाटक और तमिलनाडु में बादल बरस रहे हैं। मंगलुरु, उदगमंडलम, कोडाइकनाल और थूथुकुडी को भी मानसून की खुशी नसीब हो चुकी है। अगले दो दिनों में मानसून पूरे गोवा, कर्नाटक, तमिलनाडु के अलावा महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश के इलाकों में भी बरसने लगेगा। झारखंड, बिहार में 10 जून के बाद कभी भी मानसून प्रवेश कर सकता है, जबकि 20 जून से पहले मानसून उत्तर प्रदेश में प्रवेश कर जाएगा। अनुमान यही है कि 8 जुलाई से पहले ही पूरे भारत में मानसून की वर्षा होने लगेगी। ध्यान रहे, विशाल भारत भूमि को पूरी तरह से कवर करने में दक्षिणी-पश्चिमी मानसून को एक महीने का समय लग जाता है। वैसे, पिछले वर्ष मानसून 24 मई को ही केरल पहुंच गया था, अत: इस बार लगभग 8 दिन की देरी वैज्ञानिकों के लिए अध्ययन का विषय होनी चाहिए। बीती 15 मई को मौसम वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया था कि मानसून 26 मई को केरल पहुंच जाएगा। ऐसे अनुमान जब लगाए जाते हैं, तब आगे या पीछे चार दिन के उलटफेर को सामान्य माना जाता है। इस हिसाब से देखें, तो मानसून को 30 मई को केरल पहुंच जाना चाहिए था, लेकिन वैज्ञानिक अनुमान एक बार फिर गलत साबित हुआ है। यह भी अपने आप में अध्ययन का विषय है कि मौसम का मिजाज वैज्ञानिकों की पकड़ में क्यों नहीं आ रहा है? क्या इसके लिए अल नीनो या सुपर अल नीनो जैसी स्थितियां जिम्मेदार है? वैज्ञानिकों को सचेत रहना होगा, ताकि उनका ज्ञान-अनुमान देश और उसके लोगों के काम आए।
फिलहाल, मानसून के आगमन पर लोगों को भी सामूहिक रूप से संवेदना और सजगता का परिचय देना चाहिए। यह बड़े पैमाने पर जल संरक्षण के उपाय करने के साथ ही, पेड़-पौधे लगाने का भी श्रेष्ठ समय है। जिन शहरों में जल भराव या जल निकासी की समस्या है, वहां बचाव और सफाई के लिए काम तेज हो जाने चाहिए। कहीं जल निकासी के मार्ग अवरुद्ध तो नहीं हैं? ध्यान रहे, मानसून हमें हमारी जरूरत का 82 प्रतिशत पानी दे जाता है, पर उसके 60 प्रतिशत से भी ज्यादा जल को हम सहेज नहीं पाते हैं। आइए, हम अपने जलाशयों को ज्यादा से ज्यादा जल संजोने के लिए तैयार कर मानसून का मान रखें।







