लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सोमवार को केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) की परीक्षा परिणामों के बाद लागू फीस व्यवस्था को लेकर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि स्कैन कॉपी, री-टोटलिंग और री-इवैल्यूएशन के लिए छात्रों से शुल्क लिया जा रहा है, जबकि कई मामलों में त्रुटियां खुद बोर्ड की प्रक्रिया में होती हैं।
भरोसे की परीक्षा: फौरी कदमों से नहीं बनेगी बात, व्यापक संस्थागत सुधारों की दरकार………
नीट-यूजी के प्रश्नपत्र लीक होने और केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) की डिजिटल मूल्यांकन प्रणाली में कथित गड़बड़ियों को लेकर उठा विवाद अभी पूरी तरह शांत भी नहीं हुआ था कि विश्वविद्यालयों के स्नातक पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए आयोजित होने वाली देश की दूसरी सबसे बड़ी परीक्षा, कॉमन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट (सीयूईटी) में आई तकनीकी समस्याओं के मद्देनजर देश का परीक्षा-तंत्र गंभीर चुनौतियों और विश्वसनीयता के संकट से जूझता दिखाई दे रहा है।
राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (एनटीए) ने बेशक बाद में खेद जताते हुए कहा है कि बायोमीट्रिक करा चुके छात्र, जो किन्हीं वजहों से नीट-यूजी परीक्षा में शामिल नहीं हो सके, उन्हें दोबारा मौका दिया जाएगा, लेकिन इससे छात्रों को जो दिक्कतें हुईं, उससे परीक्षा प्रणाली पर सवाल तो उठते ही हैं। किसी भी राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा की विश्वसनीयता उसकी पूरी प्रक्रिया की निष्पक्षता, पारदर्शिता और सुचारू संचालन से तय होती है। जब लाखों अभ्यर्थी वर्षों की मेहनत, समय और संसाधन लगाकर किसी परीक्षा में शामिल होते हैं, तब यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वे प्रशासनिक चूक, तकनीकी अव्यवस्था या संस्थागत लापरवाही की कीमत चुकाएं।
देश की इन बड़ी परीक्षाओं में बार-बार हो रही चूकें ये संकेत देती हैं कि राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी तकनीक पर तो तेजी से निर्भर हो रही है, लेकिन उस तकनीक को निर्बाध और भरोसेमंद बनाने के लिए आवश्यक तैयारी और बुनियादी ढांचे पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जा रहा। इन घटनाओं का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव छात्रों के मनोबल पर पड़ता है। एक ऐसा विद्यार्थी, जिसने कठिन प्रतिस्पर्धा के बीच सफलता पाने के लिए दिन-रात मेहनत की हो, उसके लिए यह स्वीकार करना आसान नहीं होता कि उसकी परीक्षा किसी ऐसी खामी से प्रभावित हो गई, जिस पर उसका कोई नियंत्रण नहीं था।
एनटीए की स्थापना ही इस उद्देश्य से की गई थी कि देश की प्रमुख प्रवेश परीक्षाओं को अधिक पेशेवर, पारदर्शी और त्रुटिरहित ढंग से आयोजित किया जा सके। लेकिन हाल के वर्षों में जिस तरह बार-बार विवाद सामने आए हैं, उन्होंने इस संस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने जवाबदेही तय करने और संघ लोक सेवा आयोग से सीख लेने की जो बात की है, वह बिल्कुल जायज है।
यह सवाल भी जवाब की मांग करता है कि जब राधाकृष्णन समिति ने अक्तूबर, 2024 में एनटीए की प्रक्रियाओं में सुधार सुझाए थे, तो अब तक उन पर पूरी तरह से अमल क्यों नहीं हो पाया। यह करोड़ों युवाओं की आकांक्षाओं और भविष्य से जुड़ा संवेदनशील विषय है। इसलिए, जरूरत केवल फौरी कदमों की नहीं, बल्कि व्यापक संस्थागत सुधारों की भी है। आखिर सरकार और परीक्षा एजेंसियां मिलकर ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं बनातीं, जिसमें छात्रों की मेहनत ही सफलता का एकमात्र आधार हो और किसी तकनीकी या प्रशासनिक विफलता की कोई गुंजाइश ही न बचे।







