देश में वायु प्रदूषण को लेकर चिंता तो लंबे समय से जताई जाती रही है, लेकिन हाल ही में प्रकाशित एक अध्ययन जिन संकेतों की तरफ इशारा करता है, उसे सिर्फ चिंता नहीं, बल्कि गंभीर चेतावनी के रूप में देखा जाना चाहिए। कोलकाता स्थित बोस इंस्टीट्यूट के शोधकर्ताओं का यह अध्ययन, जो एटमॉस्फेरिक एन्वॉयरन्मेंट पत्रिका में प्रकाशित हुआ है, बताता है कि गंगा के मैदान, हिमालयी क्षेत्र और पूर्वोत्तर भारत में 2010-19 के दौरान पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) का स्तर 2000-2009 की तुलना में 20 फीसदी से अधिक बढ़ गया है।
वैसे तो, दिल्ली व राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश व बिहार जैसे राज्यों में सर्दी के दौरान जहरीली हवा का संकट हर वर्ष चर्चा का विषय बनता है। लेकिन यह नया अध्ययन इस धारणा को तोड़ता है कि प्रदूषण केवल महानगरों या औद्योगिक क्षेत्रों तक सीमित है। रिपोर्ट का चिंताजनक तथ्य है कि हिमालय व पूर्वोत्तर के संवेदनशील क्षेत्र जो अपेक्षाकृत कम प्रदूषित माने जाते थे, वे भी अब मैदानी इलाकों के प्रदूषण की चपेट में आ रहे हैं।
भारत पहले ही दुनिया के सबसे प्रदूषित देशों में गिना जाता है। ऐसे में प्रदूषण का भौगोलिक विस्तार स्थिति को और गंभीर बना रहा है। इस अध्ययन का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह भी है कि प्रदूषण के प्रमुख स्रोत केवल उद्योग या वाहन नहीं हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में जीवाश्म ईंधन का उपयोग, फसल अवशेषों का जलना, लकड़ी और अन्य कार्बनिक पदार्थों का दहन तथा शहरी ठोस कचरे को जलाने जैसी गतिविधियां भी प्रदूषण बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभा रही हैं। पार्टिकुलेट मैटर या सूक्ष्म कण ऐसे प्रदूषक होते हैं, जो सांस के साथ शरीर में प्रवेश कर फेफड़ों, हृदय और रक्त संचार प्रणाली को प्रभावित करते हैं।
राहत की बात है कि 2019 में शुरू किए गए भारत के राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (एनसीएपी) के बाद की अवधि में बिहार, पश्चिम बंगाल और असम सहित कई राज्यों में सूक्ष्म कणों के स्तर में उल्लेखनीय सुधार देखा गया है। ऐसे में, इस कार्यक्रम का विस्तार करते हुए पारिस्थितिकी रूप से संवेदनशील क्षेत्रों को भी इसके दायरे में लाने की बात जो रिपोर्ट में उठाई गई है, उस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। कचरा प्रबंधन की समस्या पर सर्वोच्च न्यायालय की सक्रियता प्रशंसनीय है। सरकारों को भी बहुस्तरीय रणनीति अपनाते हुए जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने, स्वच्छ ऊर्जा को ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंचाने और प्रदूषण निगरानी नेटवर्क को मजबूत करने की जरूरत है। हालांकि नागरिकों की जागरूक भागीदारी के बगैर ये प्रयास शायद ही अपने उद्देश्यों में सफल हो सकेंगे।






