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वर्तमान दौर की वैश्विक सच्चाई युद्ध ही शांति है!……………….

UB India News by UB India News
May 28, 2026
in अन्तर्राष्ट्रीय, संपादकीय
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क्या ईरान पर आज होगा अब तक का सबसे घातक हमला ?
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जॉर्ज ऑरवेल ने 1984 में एक ऐसी दुनिया की कल्पना करते हुए लिखा था कि युद्ध ही शांति है, जहां शब्दों का कोई महत्व नहीं रह गया है, तर्क विकृत हो गया है और वर्चस्व बनाए रखने के लिए संघर्ष रचा जाता है। 1949 की यह रचना 2026 में भी वैश्विक परिदृश्य को परिभाषित कर रही है। महान राजनेताओं का युग इतिहास के पन्नों में सिमट गया है, उनकी जगह बौने बुद्धिजीवियों ने ले ली है, जो अब खेल के नियम बना रहे हैं।

दुनिया एक ऐसी अंतरराष्ट्रीय अव्यवस्था से गुजर रही है, जिससे ताकतवरों को फायदा होता है और कमजोर मिट जाते हैं। इसके केंद्र में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप हैं, जिन्होंने कहा था कि वह यूक्रेन युद्ध को एक ही दिन में खत्म कर देंगे। इसे पूरा होने में अब 487 दिन की देरी हो चुकी है।  ईरान में ट्रंप के युद्ध ने देशों और परिवारों के बजट को बिगाड़ दिया है। ईंधन की राशनिंग के कारण कई शहरों (ढाका, कोलंबो और मनीला) में दंगे भड़क उठे हैं।

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जिस युद्ध को उन्होंने पहले दो दिनों में ही जीत लेने का दावा किया था, वह अब आठ हफ्तों से भी ज्यादा समय से खिंचता चला आ रहा है। हफ्ते भर वह ऐसा दिखाते हैं कि शांति समझौता पूरा होने ही वाला है, जबकि सप्ताहांत पर वह आग उगलते हैं। इस सप्ताहांत उन्होंने अरब देशों के लिए अब्राहम समझौते पर हस्ताक्षर करना अनिवार्य कर दिया, जो इस्राइल को मान्यता देने पर जोर देता है। अरब देशों ने फलस्तीन को राष्ट्र का दर्जा दिए बिना ऐसा करने से इन्कार कर दिया है। इस बीच, युद्ध ने खेतों से लेकर कारखानों तक हर क्षेत्र को प्रभावित किया है।

ट्रंप की नीतियों ने भारत जैसे सहयोगियों और दोस्तों को नाराज कर दिया है, जबकि चीन और रूस जैसे विरोधियों को फायदा पहुंचाया है। टैरिफ ने कनाडा, मेक्सिको, भारत और यूरोपीय संघ को निशाना बनाया, वहीं चीन ने ट्रंप को टका-सा जवाब दिया। अब अमेरिका को टैरिफ के तौर पर जमा किए गए 166 अरब डॉलर वापस करने होंगे। इस बीच, अमेरिका का कुल कर्ज बढ़कर 37.16 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। फिर भी, ट्रंप टस से मस नहीं हुए हैं : 10 प्रतिशत का एक नया टैरिफ अभी कानूनी विवादों में फंसा है, जबकि उनकी टीम टैरिफ व्यवस्था को बदलने के लिए विभिन्न प्रावधानों का इस्तेमाल हथियार के तौर पर कर रही है।

यह वैश्विक अस्थिरता यों ही नहीं पनप रही है। पश्चिम एशिया जल रहा है और यूक्रेन में तनाव बना हुआ है, क्योंकि युद्ध की चालें घरेलू राजनीतिक हिसाब-किताब से तय होती हैं- चाहे वह वाशिंगटन हो, तेल अवीव, मॉस्को या बीजिंग। युद्ध छेड़ने या शांति की राह चुनने का फैसला अब अधिकांशतः आंतरिक राजनीतिक समीकरणों से ही तय होता है। इन उलझे हुए संघर्षों की मानवीय और आर्थिक कीमत ने दुनिया भर में चिंता पैदा कर दी है। ट्रंप को ‘पूरी तरह मिटा देना’ शब्द बहुत पसंद है। लेकिन बार-बार ट्रंप की इन धमकियों के बाद भी, ईरान डटा हुआ है। सत्ता परिवर्तन की तमाम बातों के बावजूद, ट्रंप की टीम बस इतना ही कर पाई कि एक बुजुर्ग अयातुल्ला की जगह एक युवा अयातुल्ला को ले आई।

यह एक मानी हुई बात है कि ईरान पर हमले की नींव 23 फरवरी को ट्रंप और इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बीच हुई एक फोन कॉल के दौरान रखी गई थी। 28 फरवरी को ईरान पर हुआ हमला, इस्राइली लॉबी की चाहत के प्रति ट्रंप की सहमति का संकेत था। आरोप-प्रत्यारोप का खेल, अधिकारियों के बयान, और जो केंट तथा तुलसी गबार्ड के इस्तीफे- ये सब इस पूरी कहानी को बयां करते हैं।
पश्चिम एशिया का संघर्ष डॉलर के वर्चस्व से भी जुड़ा हुआ है। 1974 के अमेरिका-सऊदी समझौते के बाद से, वाशिंगटन ने तेल व्यापार की संरचना को आकार देकर डॉलर के प्रभुत्व को बनाए रखने की कोशिश की है। दुनिया के सबसे बड़े हाइड्रोकार्बन उत्पादकों में से एक, ईरान लंबे समय से इस रणनीति के केंद्र में रहा है। वेनेजुएला में अमेरिकी दखल का सफर (नशीले पदार्थों पर रोक से लेकर तेल की राजनीति तक) काफी कुछ सिखाने वाला है। हाल ही में, अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने भारत के साथ तेल सौदे की बात की थी।

ट्रंप या उनके ‘मागा’ समर्थकों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि एक तरफ सब कुछ ‘सबसे बढ़कर’ दिखाया जाता है, जबकि असल नतीजे वैसे नहीं होते। ट्रंप ने रूस और चीन पर भले ही कड़े शब्दों से हमला बोला हो, लेकिन असल में ये दोनों ही देश ट्रंप के छेड़े गए युद्धों से फायदा उठा रहे हैं। ईरान में चल रहे युद्ध की वजह से अमेरिकी हथियारों का जखीरा तेजी से खत्म हो रहा है, जिससे यूक्रेन और ताइवान में चिंताएं बढ़ गई हैं। इससे रूस पर दबाव कम हुआ है और चीन को ताइवान को हथियारों की आपूर्ति के मामले में अमेरिका को चेतावनी देने का और अधिक साहस मिला है। युद्ध की वजह से कच्चे तेल की कीमतें बढ़ गई हैं, जिसका असर अमेरिका में ईंधन की कीमतों पर पड़ता है। इसे कम करने के लिए ट्रंप प्रशासन ने ईरानी तेल पर लगे प्रतिबंध हटा दिए और रूसी तेल पर दी गई छूट को और 30 दिनों के लिए बढ़ा दिया।

रूसी तेल, जिस पर पहले भारी छूट मिलती थी, अब 100 डॉलर प्रति बैरल की कीमत पर मिल रहा है; वहीं, ईरानी तेल की कीमत हल्के और भारी कच्चे तेल के लिए क्रमशः 100 और 103 डॉलर है। कहने की जरूरत नहीं कि चीन इसका सबसे बड़ा लाभार्थी है। भले ही पार्टी के भीतर ट्रंप को अब भी 80 प्रतिशत लोगों का समर्थन हासिल है, लेकिन वह अब धीरे-धीरे कम हो रहा है। गाजा, लेबनान और ईरान में बच्चों की हत्याओं की वजह से ट्रंप को युवाओं का समर्थन 48 प्रतिशत से गिरकर 30 प्रतिशत के आसपास पहुंच गया है। यही नहीं, हाल ही में हुए चार सर्वे में यह बात सामने आई है कि ट्रंप की लोकप्रियता गिर रही है, जिसकी मुख्य वजह पेट्रोल की बढ़ती कीमतें और रोजगार के घटते अवसर हैं। रिपब्लिकन पार्टी के नाराज सदस्य ट्रंप के बिलों को रोक रहे हैं, क्योंकि उन्हें सत्ता से बेदखल होने का डर है।

युद्धों में कोई विजेता नहीं होता। युद्धविराम मृतकों का उपहास करते हैं। इसकी कोई गारंटी नहीं है कि ईरान युद्ध कब समाप्त होगा। भले ही वह इसी सप्ताह समाप्त हो जाए, लेकिन इसकी कीमत वर्षों तक चुकानी पड़ेगी। घरेलू राजनीति को भू-राजनीति के रूप में पेश करने और युद्धों के माध्यम से राजनीतिक वर्चस्व स्थापित करने की सनक ने दुनिया को एक राजनीतिक और आर्थिक प्रलय के कगार पर धकेल दिया है।

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