अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो भारत-अमेरिका संबंधों के एक नाजुक मोड़ पर भारत पहुंचे हैं। यों तो इस दौरे को हिंद-प्रशांत और क्वाड के प्रति वॉशिंगटन की निरंतर प्रतिबद्धता के तौर पर पेश किया गया, लेकिन इसका मकसद साफ था: उस रणनीतिक भरोसे को फिर से मजबूत करना, जो हाल के कुछ महीनों में कमजोर पड़ता दिख रहा था। भारतीय निर्यात के खिलाफ ट्रंप की आक्रामक टैरिफ नीति, पाकिस्तान के साथ वॉशिंगटन की नई कूटनीतिक सक्रियता, अमेरिका की चीन रणनीति को लेकर अनिश्चितता और ईरान संकट से निपटने के अलग-अलग दृष्टिकोणों ने नई दिल्ली में बेचैनी बढ़ा दी थी। इसलिए रूबियो की चार-दिवसीय भारत यात्रा एक औपचारिक राजनयिक मुलाकात कम और ‘आश्वस्त करने वाली कूटनीति’ का अभ्यास ज्यादा बनती दिख रही है। प्रधानमंत्री मोदी से रूबियो की मुलाकात में व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा, आपूर्ति शृंखलाओं व उभरती प्रौद्योगिकियों पर विशेष जोर दिया गया है।
मगर इनके पीछे एक बड़ा भू-राजनीतिक उद्देश्य है: भारत को इस निष्कर्ष पर पहुंचने से रोकना कि वॉशिंगटन की रणनीतिक प्राथमिकताएं कहीं और खिसक रही हैं। रूबियो भारत को यह भरोसा दिलाने आए हैं कि अमेरिका अब भी नई दिल्ली को अपनी हिंद-प्रशांत रणनीति के लिए बेहद जरूरी मानता है। रूबियो ने प्रधानमंत्री मोदी को व्हाइट हाउस आने का ट्रंप का निमंत्रण भी दिया।
इस दौरे का मकसद टैरिफ विवादों की वजह से खराब हुए आर्थिक संबंधों को स्थिर करना भी है। हालांकि, अंतरिम व्यवस्था ने टैरिफ को कम कर दिया है, लेकिन एक व्यापक व्यापार समझौता अब भी दूर की कौड़ी बना हुआ है। इसलिए, ऊर्जा व्यापार के विस्तार पर रूबियो का जोर केवल वाणिज्य तक ही सीमित नहीं, बल्कि इसका उद्देश्य व्यापक संबंधों में तनाव को कम करना भी है। पश्चिम एशिया में पैदा हुई बाधाओं और होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास की अस्थिरता के चलते भारत को ऊर्जा के मामले में गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। रूबियो ने इस मौके का फायदा उठाते हुए तर्क दिया कि अमेरिका की ऊर्जा आपूर्ति भारत के आयात में विविधता लाने और अस्थिर क्षेत्रों पर निर्भरता को कम करने में मदद कर सकती है। वॉशिंगटन ऊर्जा निर्यात को भारत के साथ अपने बड़े व्यापार घाटे को कम करने के एक तरीके के रूप में भी देखता है।
नई दिल्ली पारंपरिक रूप से ईरान के साथ संतुलित संबंध बनाए हुए है, जिसका मुख्य कारण ऊर्जा जरूरतें और कनेक्टिविटी से जुड़े हित (चाबहार परियोजना) हैं। भारत के सामने कठिन चुनौती है कि वह वॉशिंगटन के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी को संतुलित रखते हुए, तेहरान के साथ स्वतंत्र जुड़ाव के लिए भी गुंजाइश बनाए रखे। मौजूदा ऊर्जा संकट अमेरिका और इस्राइल के ईरान के साथ बढ़ते टकराव के कारण ही ज्यादा गहरा गया है। जहां एक तरफ वॉशिंगटन ऊर्जा के विकल्प पेश कर रहा है, वहीं अमेरिकी नीतियों ने ही उस अस्थिरता को बढ़ाने में भी योगदान दिया है, जिससे एशियाई ऊर्जा प्रवाह बाधित हो रहा है।
रूबियो की यात्रा इसलिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह नई दिल्ली में होने वाली ‘क्वाड’ विदेश मंत्रियों की बैठक से ठीक पहले हुई है। क्वाड चीन के विरुद्ध हिंद-प्रशांत क्षेत्र में संतुलन बनाए रखने का एक केंद्रीय मंच है। हालांकि हाल में इस समूह की गति धीमी होने के संकेत मिले हैं। शीर्ष-स्तरीय शिखर सम्मेलन न होने और ट्रंप की भारत यात्रा टल जाने से यह धारणा बनी कि ‘क्वाड’ का अनौपचारिक रूप से दर्जा घटा दिया गया है। इसलिए, नई दिल्ली में रूबियो की मौजूदगी का एक मकसद अंशतः ऐसी धारणाओं को मजबूत होने से रोकना है। भारत के लिए, ‘क्वाड’ उपयोगी तो है, लेकिन पर्याप्त नहीं। नई दिल्ली क्षेत्रीय स्थिरता, तकनीकी साझेदारी और रक्षा सहयोग के लिए अमेरिका से एक स्थायी प्रतिबद्धता चाहती है। लेकिन ट्रंप की ‘लेन-देन वाली’ विदेश नीति अक्सर अनिश्चितता पैदा करती है। भारत को इस बात की चिंता है कि वॉशिंगटन का रणनीतिक ध्यान, घरेलू राजनीतिक समीकरणों या चीन के साथ बदलते संबंधों के आधार पर अचानक बदल सकता है। रूबियो ने हिंद-प्रशांत नीति में निरंतरता पर जोर देकर इन शंकाओं को दूर करने की कोशिश की। लेकिन सिर्फ प्रतीकात्मकता से भारत को आश्वस्त नहीं किया जा सकता, जब तक कि ठोस आर्थिक और रणनीतिक प्रतिबद्धताएं न हों।
विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ बातचीत के बाद, रूबियो ने कहा कि भारत-अमेरिका संबंधों की ‘रफ्तार कम नहीं हुई है’ और वे ‘आने वाले वर्षों में और भी ज्यादा मजबूत होंगे।’ उन्होंने उम्मीद जताई कि लंबे समय से लंबित द्विपक्षीय व्यापार समझौता जल्द ही पूरा हो जाएगा, और ज्यादातर बड़े वैश्विक मुद्दों पर दोनों देश ‘रणनीतिक रूप से एकमत’ हैं।
गर्मजोशी के बावजूद, कई ढांचागत चुनौतियां भारत-अमेरिका संबंधों को जटिल बनाती जा रही हैं। पहला मुद्दा व्यापार है। ट्रंप की संरक्षणवादी नीति एक बड़ी अड़चन है। भारत को बाजार तक ज्यादा पहुंच, स्थिर टैरिफ नीतियां और अचानक लगने वाले व्यापारिक दंडों से सुरक्षा चाहिए। वहीं अमेरिका अपने कृषि, प्रौद्योगिकी और विनिर्माण उत्पादों के निर्यात के लिए व्यापक पहुंच चाहता है। दूसरी चुनौती रूस है। भारत द्वारा रूसी तेल की खरीद वॉशिंगटन में संवेदनशील मुद्दा बना हुआ है। हालांकि, अमेरिका ने अस्थायी रूप से अपना रुख नरम किया है, लेकिन दबाव फिर से बढ़ सकता है। भारत ऊर्जा सुरक्षा और रक्षा आपूर्ति के लिए रूस को अनिवार्य मानता है। तीसरा, आप्रवासन और वीजा नीतियां भारतीय पेशेवरों और छात्रों के लिए लगातार परेशानी का सबब बनी हुई हैं। अमेरिका के ग्रीन कार्ड और एच1बी से जुड़े सख्त नियम भारतीयों में नाराजगी पैदा करते हैं, जो इन दोनों देशों के बीच सबसे मजबूत कड़ियों में से एक रहे हैं।
चौथी चुनौती रणनीतिक स्वायत्तता है। भारत किसी भी कठोर चीन-विरोधी सैन्य गुट का हिस्सा नहीं बनना चाहता। वह बिना किसी गठबंधन की बाध्यता के साझेदारी चाहता है। रूबियो की भारत यात्रा में चीन और पाकिस्तान, दोनों के लिए स्पष्ट भू-राजनीतिक संदेश भी निहित है। कुल मिलाकर, रूबियो की यात्रा भारत-अमेरिका संबंधों में दिख रही दूरी को कम करने में सफल होती दिख रही है, लेकिन इससे उन संबंधों में मौजूद बुनियादी विरोधाभास खत्म नहीं हुए। आज इन संबंधों का आधार भावनात्मक रणनीतिक तालमेल कम और आपसी जरूरत ज्यादा है। एशिया में चीन को संतुलित करने के लिए अमेरिका को भारत की जरूरत है, जबकि भारत को अमेरिकी तकनीक, निवेश और भू-राजनीतिक समर्थन की जरूरत है।







