शार्क टैंक के जज अमन गुप्ता , जो एक उद्यमी, बोट कंपनी के सह संस्थापक है और चीफ मार्केटिंग ऑफिसर हैं, चर्चा में हैं। अमन गुप्ता ने अपने ‘पर्सनैलिटी राइट्स’ की सुरक्षा के लिए दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया है। दरअसल यह मामला न केवल उनके व्यक्तिगत अधिकारों से जुड़ा है, बल्कि डिजिटल युग में हर आदमी खासकर सार्वजनिक हस्तियों की पहचान और प्रतिष्ठा की सुरक्षा के व्यापक सवाल भी उठाता है इस लीगल स्टोरी के जरिए जानेंगे ‘पर्सनैलिटी राइट्स’ क्या है और क्यूं अमन गुप्ता को इसकी इतनी फिक्र हैं। ‘पर्सनैलिटी राइट्स’ के जरिए कानून क्या अधिकार देता है?
क्या है पर्सनैलिटी राइट्स
सरल भाषा में ‘पर्सनैलिटी राइट्स’ किसी व्यक्ति विशेष की विशेष पहचान होती है। पर्सनैलिटी राइट्स जिन्हें ‘राइट ऑफ पब्लिसिटी’ भी कहा जाता है, किसी व्यक्ति के नाम, तस्वीर, आवाज, हस्ताक्षर, या अन्य विशिष्ट पहचान से जुड़े अधिकार होते हैं। कहा जाए तो , ये अधिकार किसी व्यक्ति को यह नियंत्रण देते हैं कि उसकी पहचान का उपयोग कौन, कैसे और किस उद्देश्य से कर सकता है। भारत में इसे अलग अलग कानूनी प्रावधानों—जैसे कि कॉपीराइट कानून, ट्रेडमार्क कानून, और निजता के अधिकार से जुड़े कानूनों के जरिए जोड़ा गया है।
पर्सनैलिटी राइट्स का कानूनी आधार
भारत में पर्सनैलिटी राइट्स सीधे-सीधे किसी एक अधिनियम में नहीं मिलते, लेकिन इनका आधार निम्नलिखित स्रोतों से निकलता है:
- संविधान का अनुच्छेद 21 से : यह अनुच्छेद व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है, जिसमें निजता का अधिकार भी शामिल है।
- टॉर्ट लॉ (Law of Torts) से : यदि किसी व्यक्ति की पहचान का बिना अनुमति उपयोग किया जाता है और इससे उसकी प्रतिष्ठा या आर्थिक हित प्रभावित होते हैं, तो वह ‘Misappropriation’ के आधार पर मुकदमा कर सकता है।
- ट्रेडमार्क और कॉपीराइट कानून से : कई सेलिब्रिटी अपने नाम या ब्रांड को ट्रेडमार्क के रूप में रजिस्टर कराते हैं ताकि उसका व्यावसायिक दुरुपयोग रोका जा सके।
पर्सनैलिटी राइट्स की प्रमुख बातें और अधिकार
पर्सनैलिटी राइट्स को कहा जाए तो कई महत्वपूर्ण अधिकारों का समूह हैं। इसके जरिए कोई भी नागरिक अपने नाम और पहचान पर नियंत्रण कर सकता है। साथ ही कोई भी व्यक्ति अपने नाम, फोटो या पहचान के व्यावसायिक उपयोग को नियंत्रित कर सकता है। यदि किसी की पहचान का उपयोग कर पैसा कमाया जा रहा है, तो उस व्यक्ति को इसका अधिकार है कि वह इसकी अनुमति दे या इसके बदले भुगतान ले। और यदि नहीं मिलता तो यह उसका अधिकार है कि ऐसे उपयोगों को रोक दे या कानून का सहारा ले। किसी व्यक्ति की छवि को नुकसान पहुँचाने वाले उपयोग जैसे उसके नाम का उपयोग कर फर्जी विज्ञापन या गलत प्रचारों को रोकने का अधिकार हर नागरिक को है। आज के समय में डीपफेक, AI कंटेंट और फेक प्रमोशन के खिलाफ यह अधिकार बेहद महत्वपूर्ण हो गया है।
टेक्नोलॉजिकल बदलाव हैं बड़ी वजह
देखा जाए तो पर्सनैलिटी राइट्स के मुकदमों में पिछले कुछ सालों से काफी बढ़ोत्तरी है। इसकी वजह है कि हाल के सालों में टेक्नोलॉजिकल तरक्की काफी तेजी से बढ़ी है। AI से बने डीपफेक, आवाज़ की नकल, बदली हुई फ़ोटो, वायरल मीम और सिंथेटिक एंडोर्समेंट ने किसी सेलिब्रिटी की पहचान को दोबारा बनाने और रीमिक्स करने में काफ़ी मदद की है। इन टेक्नोलॉजी में बड़े खतरे होते हैं, जिनमें नकल करना, लोगों को धोखा देना, बदनामी और गलत तरीके से पेश करना शामिल है।
पर्सनैलिटी राइट्स के दावों में बढ़ोतरी
हालांकि, भारतीय कानून में पहले से ही ऐसी चोटों के लिए उपाय मौजूद हैं। बदनामी पर सिविल और क्रिमिनल दोनों तरह के कानून में कार्रवाई हो सकती है। नकल करना और साइबर धोखाधड़ी इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट, 2000 और भारतीय न्याय संहिता, BNS 2023 के तहत आते हैं; अश्लील या सेक्सुअली मार्फ सामग्री पर क्रिमिनल सज़ा हो सकती है। ऐसे मामलों में जज और केस करने वाले लोग अक्सर बने-बनाए कानूनी तरीकों का प्रयोग करते हुए, पर्सनैलिटी राइट्स की दलीलों पर भी ध्यान देते हैं। हाल के दिनों में अभिषेक बच्चन का अपनी तस्वीर वाली टी-शर्ट पर एतराज़, अनिल कपूर का “झकास” शब्द पर एतराज़, करण जौहर का एक फ़िल्म के टाइटल में उनके नाम के इस्तेमाल को चुनौती देना, और पवन कल्याण का अपनी तस्वीर के कमर्शियल इस्तेमाल को चुनौती देना इसके अच्छे उदाहरण हैं। इनसे पता चलता है कि कैसे बिना इजाज़त के किसी व्यक्ति से जुड़ी छवि या अन्य प्रतीकों का इस्तेमाल कानूनी कार्रवाई को बढ़ावा दे सकता हैं।
अमन गुप्ता ने हाईकोर्ट का रुख क्यों किया?
शार्क टैंक के होस्ट और बड़े उद्यमी अमन गुप्ता ने अदालत का दरवाजा इसलिए खटखटाया क्योंकि उनकी पहचान—जैसे नाम, तस्वीर और व्यक्तित्व—का कथित तौर पर बिना अनुमति व्यावसायिक उपयोग किया जा रहा था। उनका कहना है कि उनके नाम और फोटो का इस्तेमाल कर फर्जी विज्ञापन चलाए जा रहे थे, कुछ प्लेटफॉर्म्स पर उन्हें ऐसे उत्पादों से जोड़ा जा रहा था, जिनसे उनका कोई संबंध नहीं था। इससे उनकी ब्रांड वैल्यू और विश्वसनीयता को नुकसान होने का खतरा था। दिल्ली हाइ कोर्ट में दायर याचिका में अमन गुप्ता ने कोर्ट से मांग की है कि कोई भी व्यक्ति या कंपनी उनकी अनुमति के बिना उनकी पहचान का उपयोग न करे। साथ ही ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स को निर्देश दिया जाए कि वे ऐसे सभी विज्ञापन और कंटेंट हटाएं।
डिजिटल युग में, जहां पहचान ही ब्रांड है
भारत में पर्सनैलिटी राइट्स अब सिर्फ एक सैद्धांतिक अवधारणा नहीं रह गए हैं, बल्कि यह एक व्यावहारिक और जरूरी कानूनी सुरक्षा बन चुके हैं। डिजिटल युग में, जहां पहचान ही ब्रांड बन जाती है, वहां उसका संरक्षण उतना ही महत्वपूर्ण है जितना किसी संपत्ति का। यह मामला आने वाले समय में भारत के कानूनी ढांचे को दिशा दे सकता है और यह तय करेगा कि किसी व्यक्ति की पहचान पर उसका नियंत्रण कितना मजबूत है।







