बिहार कैबिनेट की बैठक में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की अध्यक्षता में शिक्षा क्षेत्र को लेकर बड़ा फैसला लिया गया है. “सात निश्चय-3” के तहत राज्य के 208 प्रखंडों में डिग्री महाविद्यालय खोलने की स्वीकृति दी गई है. इसके लिए प्रति कॉलेज 44 पदों के हिसाब से कुल 9,152 शिक्षक और शिक्षकेत्तर पदों को मंजूरी मिली है.
बिहार कैबिनेट की बैठक में बुधवार को कई अहम प्रस्तावों पर मुहर लगाई गई. मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में कुल 64 एजेंडों को स्वीकृति दी गई. कैबिनेट सचिव अरविंद कुमार चौधरे ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इन फैसलों की जानकारी दी. सम्राट सरकार ने “सात निश्चय-3” के तहत उच्च शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए बड़ा कदम उठाया है. राज्य के 208 प्रखंडों में डिग्री महाविद्यालय स्थापित किए जाएंगे. इसके लिए प्रति कॉलेज 44 पदों के हिसाब से कुल 9,152 शिक्षक और शिक्षकेत्तर पदों की स्वीकृति दी गई है.
1040 करोड़ की योजना को हरी झंडी
इन कॉलेजों के संचालन और बुनियादी ढांचे के विकास के लिए प्रति महाविद्यालय 50 लाख रुपये की दर से कुल 1040 करोड़ रुपये की योजना को मंजूरी दी गई है. यह निवेश राज्य में शिक्षा के ढांचे को मजबूत करने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है.
छात्रों को मिलेगा बड़ा फायदा
सरकार का कहना है कि इस फैसले से छात्रों को अपने ही प्रखंड में उच्च शिक्षा की सुविधा मिल सकेगी, जिससे उन्हें दूसरे शहरों में जाने की जरूरत कम होगी. साथ ही युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे. विशेषज्ञों का मानना है कि इस योजना से न सिर्फ शिक्षा का विस्तार होगा, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक और सामाजिक विकास को भी गति मिलेगी. बिहार सरकार इसे राज्य के भविष्य के लिए एक महत्वपूर्ण निवेश के रूप में देख रही है.
वित्त और स्वास्थ्य क्षेत्र में बड़े फैसले
सम्राट कैबिनेट कैबिनेट ने वित्त विभाग में साइबर ट्रेज़री की स्थापना को मंजूरी दी है, जिससे वित्तीय लेन-देन की प्रक्रिया और अधिक पारदर्शी और डिजिटल होगी. वहीं स्वास्थ्य विभाग के तहत नर्सिंग ट्रेनिंग को बेहतर बनाने के लिए नर्सिंग नियमों में संशोधन को भी स्वीकृति दी गई. इसके अलावा कैंसर की रोकथाम के लिए 6 संविदा कर्मियों की नियुक्ति को भी मंजूरी मिली है.
इन सड़क परियोजनाओं को मिली रफ्तार
इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में भी कई अहम फैसले लिए गए. सारण में नए नारायणी पथ को मंजूरी दी गई है. साथ ही कोईलवर से बक्सर तक गंगा पथ के निर्माण को स्वीकृति दी गई, जिसे “विश्वामित्र पथ” के नाम से जाना जाएगा. इसके अलावा विदुपुर से दिघवारा तक 56 किलोमीटर लंबी उत्तरी गंगा पथ परियोजना के डीपीआर के लिए सैद्धांतिक मंजूरी दी गई है. वहीं सारण के दरिहारा से गोपालगंज के डुमरिया घाट के बीच 73.51 किलोमीटर लंबी 4-लेन ग्रीनफील्ड सड़क परियोजना को भी स्वीकृति मिली है.
कानून और सुरक्षा व्यवस्था पर फोकस
कैबिनेट ने बिहार ज्यूडिशियल एकेडमी की नियमावली गठन को मंजूरी दी है, जिससे न्यायिक प्रशिक्षण व्यवस्था को मजबूती मिलेगी. वहीं गृह विभाग के तहत पटना शहरी क्षेत्र के लिए एक नए अपर पुलिस अधीक्षक (नगर) पद के सृजन को भी हरी झंडी दी गई है.
कला, संस्कृति और पर्यावरण से जुड़ी योजनाओं पर मुहर
बिहार कैबिनेट की बैठक में कला, संस्कृति और पर्यावरण से जुड़े कई अहम फैसलों को मंजूरी दी गई. कला, संस्कृति एवं युवा विभाग के तहत जननायक कर्पूरी ठाकुर स्मृति संग्रहालय में वाचनालय शुरू करने की स्वीकृति दी गई है. साथ ही संग्रहालय का नाम बदलकर “भारत रत्न जननायक कर्पूरी ठाकुर स्मृति संग्रहालय सह वाचनालय” करने का निर्णय लिया गया है, जिससे शोध और अध्ययन को बढ़ावा मिलेगा.
संजय गांधी जैविक उद्यान का नाम बदलेगा
इसके अलावा, राज्य के प्रमुख पर्यटन स्थलों में शामिल संजय गांधी जैविक उद्यान का नाम बदलकर “पटना जू” करने की मंजूरी दी गई है. इसके साथ ही इसके संचालन के लिए गठित “संजय गांधी जैविक उद्यान प्रबंधन एवं विकास सोसाइटी” का नाम भी बदलकर “पटना जू प्रबंधन एवं विकास सोसाइटी” कर दिया गया है. पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी सरकार ने बड़ा कदम उठाया है. राज्य में पर्यावरणीय और जलवायु अनुकूल गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए “बिहार हरित जलवायु कोष” के गठन को स्वीकृति दी गई है. सरकार का मानना है कि इस कोष से राज्य में सतत विकास और पर्यावरण संरक्षण को नई गति मिलेगी.
कांग्रेस के जमाने में बने दो संस्थानों से हटा ‘संजय गांधी’ का नाम, पटना जू और डेयरी संस्थान को नई पहचान
बिहार की सम्राट चौधरी सरकार ने राज्य के दो संस्थानों से ‘संजय गांधी’ नाम को हटा दिया। पटना जू अब ‘संजय गांधी जैविक उद्यान’ नहीं रहा। राज्य के दो महत्वपूर्ण गौरवशाली संस्थानों का नाम बदल दिया गया। कांग्रेस नेता संजय गांधी का नाम अब पटना के मशहूर चिड़ियाघर और डेयरी टेक्नोलॉजी संस्थान की पट्टिकाओं से हटा दिया गया। सरकार का तर्क है कि इन संस्थानों की पहचान अब उनके स्थान और राज्य के नाम से होगी। ये कदम न केवल प्रशासनिक बदलाव है, बल्कि इसे राज्य की राजनीतिक दिशा बदलने के संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है।
पटना जू का अब आधिकारिक तौर पर बदला नाम
पटना का सबसे पसंदीदा पर्यटन स्थल, जिसे अब तक ‘संजय गांधी जैविक उद्यान’ कहा जाता था, अब आधिकारिक रूप से ‘पटना जू’ कहलाएगा। हालांकि, आम बोलचाल में लोग इसे पहले भी इसी नाम से पुकारते थे, लेकिन अब सरकारी दस्तावेजों में भी इसकी पहचान बदल गई है। इसके साथ ही संस्थान का संचालन करने वाली समिति का नाम भी बदलकर ‘पटना जू प्रबंधन एवं विकास सोसाइटी’ कर दिया गया है।
इन संस्थानों का इतिहास दशकों पुराना है। चिड़ियाघर की नींव 1969 में पड़ी थी जब तत्कालीन राज्यपाल नित्यानंद कानूनगो ने राजभवन की जमीन दान दी थी, जो 1973 में आम जनता के लिए खुला। राजभवन ने 34 एकड़ जमीन दान में दी। 1972 में इसमें बिहार सरकार ने लगभग 120 एकड़ जमीन और जोड़कर इसे जैविक उद्यान और बोटैनिकल पार्क का रूप दे दिया। वर्तमान में ये देश का चौथा सबसे बड़ा चिड़ियाघर है, जहां 110 प्रजातियों के करीब 800 जीव रहते हैं। बाघ, शेर, राइनो, हिरण, सांप वगैरह शामिल हैं। इस उद्यान में लगभग 300 तरह के पेड़-पौधे हैं।
कांग्रेस के जमाने के संस्थानों का बदला नाम
डेयरी संस्थान को नाम के साथ मिली नई पहचान
बिहार पशु चिकित्सा विश्वविद्यालय के अंतर्गत आने वाले संजय गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ डेयरी टेक्नोलॉजी का नाम अब ‘बिहार स्टेट इंस्टीट्यूट ऑफ डेयरी टेक्नोलॉजी, पटना’ होगा। ये संस्थान राज्य में डेयरी शिक्षा का प्रमुख केंद्र है। यहां छात्रों को डेयरी से जुड़े पेशेवर शिक्षा दी जाती है। इसमें डेयरी टेक्नोलॉजी और इंजीनियरिंग, दूध प्रसंस्करण की आधुनिक तकनीक, डेयरी केमिस्ट्री और माइक्रोबायलॉजी, गुणवत्ता और सुरक्षा की जांच, डेयरी बिजनेस मैनेजमेंट, व्यवसाय और प्रबंधन के गुर, डेयरी एक्सटेंशन एजुकेशन और किसानों और समाज तक तकनीक पहुंचाने के गुर सिखाएजाते हैं।
बिहार में जब कांग्रेस पार्टी की सरकार थी, तब संजय गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ डेयरी टेक्नोलॉजी की स्थापना 1980 में हुई थी। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद से मान्यता प्राप्त है। इस डेयरी संस्थान का पहला बैच पूसा के राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय में 1982 में आया था। इसके बाद 1986 में डेयरी संस्थान को पटना लाया गया। अभी जहां है, वहां 1999 में अपने मौजूदा कैंपस में गया। हालांकि, कुछ समय के लिए संस्थान को बिहार कृषि विश्वविद्यालय (सबौर) से भी जोड़ा गया था। कई चरणों में विकसित कर इस संस्थान को 2016 में बिहार पशु विज्ञान विश्वविद्यालय से जोड़ा गया था।







