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आखिर उन धमाकों का गुनहगार कौन था?

UB India News by UB India News
April 29, 2026
in अपराध, खास खबर, संपादकीय
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आखिर उन धमाकों का गुनहगार कौन था?
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महाराष्ट्र के मालेगांव में 29 सितंबर, 2008 को हमीदिया मस्जिद और बड़ा कब्रिस्तान परिसर में जुम्मे की नमाज के तुरंत बाद हुए बम धमाकों के मामले में सभी अभियुक्तों की दोषमुक्ति हो गई है। पिछले दिनों राष्ट्रीय अन्वेषण एजेंसी (एनआईए) द्वारा आरोपित चार और अभियुक्त बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा बरी कर दिए गए। ऐसा ही कुछ मुंबई लोकल ट्रेन बम धमाकों के मामले में भी हुआ। जयपुर, अजमेर समेत ऐसे और भी कई मामले हैं, जिनमें जांच प्रणाली और न्यायिक व्यवस्था की गलियों से गुजर कर भी यह तय नहीं किया जा सका कि मारे गए लोगों का दोषी आखिर कौन था?

मालेगांव बम विस्फोट और मुंबई लोकल ट्रेन बम धमाकों के मामलों में हाल ही में आए ये फैसले महज संयोग नहीं हैं, बल्कि न्याय प्रणाली की उस विफलता का संकेत हैं, जो बार-बार सामने आती है।

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मालेगांव में हुए बम विस्फोट में छह लोगों की मौत हुई और 101 लोग घायल हुए। अभियोजन पक्ष ने 300 से अधिक गवाहों को पेश किया। समय के साथ कई आरोपियों को अलग-अलग आरोपों से बरी कर दिया गया और कुछ आरोप बाद में हाईकोर्ट ने भी रद्द कर दिए। तीन बड़ी जांच एजेंसियां-स्थानीय क्राइम ब्रांच, आतंकवादी निरोधक दस्ता (एटीएस) और एनआईए इसमें शामिल थीं। मुकदमा 20 साल तक चला। अंत में, अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष दोष को ‘संदेह से परे’ साबित करने में असफल रहा, क्योंकि कोई भरोसेमंद और स्वीकार्य सबूत मौजूद नहीं था और न्यायालय लोकप्रिय धारणा पर नहीं, बल्कि सबूतों पर चलते हैं।

इससे भी अधिक गंभीर बात तो यह है कि अभियोजन पक्ष आवश्यक प्रशासनिक अनुमतियों की वैधता साबित नहीं कर पाया। ये अनुमतियां उच्च अधिकारियों द्वारा दी गई थीं। अदालत ने इसे चुनिंदा सबूत इकट्ठा करने और प्रक्रियागत चूकों का परिणाम बताया। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि जांच में नमूने इकट्ठा करने की अनावश्यक प्रक्रिया और कर्तव्य निभाने में विफलता जैसी बातें साफ दिखीं।

मुंबई लोकल ट्रेन बम धमाकों का मामला इससे अलग था। 11 जुलाई, 2006 को सात धमाकों में 187 लोग मारे गए और 800 से अधिक घायल हुए। एटीएस ने 13 लोगों को गिरफ्तार कर आरोप लगाए। मुकदमा छह साल में पूरा हुआ और सभी दोषी ठहराए गए, लेकिन बॉम्बे हाईकोर्ट ने अपील पर कहा कि दोषसिद्धि टिकाऊ सबूतों पर आधारित नहीं है। नतीजतन, सभी आरोपी बरी कर दिए गए। यह काफी हैरतअंगेज है कि अभियोजन एजेंसियों की नाकामी एक नहीं, बल्कि दोनों मामलों में उजागर हुई। यह केवल प्रशासनिक गलती नहीं है, बल्कि सांविधानिक जिम्मेदारी का उल्लंघन है, जिसने न सिर्फ पीड़ितों और उनके परिवारों, बल्कि आम जनता का भी भरोसा तोड़ दिया है।

हमारी व्यवस्था में अक्सर मुकदमे न्याय दिलाने के बजाय प्रचार का साधन बन जाते हैं। मीडिया रिपोर्टें तथ्यात्मक जांच के बजाय आरोपियों की पहचान या राजनीतिक संवेदनशीलता पर केंद्रित रहती हैं। इससे जांचकर्ताओं और अभियोजकों के लिए एक सुविधाजनक माहौल बनता है, जो लापरवाही और टालमटोल को बढ़ावा देता है। इस लापरवाही और टालमटोल का अंदाजा मालेगांव बम विस्फोट के मामले के उस जबर्दस्त नाटकीय मोड़ से लगाया जा सकता है, जो एटीएस की तफ्तीश खत्म होने के वर्षों बाद आया था। 2011 में इसकी जांच राष्ट्रीय अन्वेषण एजेंसी यानी एनआईए को सौंपी गई थी। दो साल बाद 2013 में एजेंसी ने एक और आरोप पत्र दाखिल किया, जिसमें नए अभियुक्त कटघरे में खड़े कर दिए गए। इस बार धमाकों के तार एक दक्षिणपंथी उग्रवादी समूह से जोड़े गए थे। कहना न होगा कि इस प्रकरण के अदालत में औंधे मुंह गिरने में इस तथ्य का भी अच्छा खासा योगदान था। मजेदार बात यह है कि दोनों हादसों के दौरान केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी। मालेगांव के आरोपी सात से नौ साल जेल में रहे, फिर जमानत पर बाहर आए। बाहर आने के बाद एक ने चुनाव लड़ा और सांसद बना, दूसरा फिर से भारतीय सेना में शामिल हुआ, और बाकी सब अपनी जिंदगी सामान्य रूप से जीने लगे। इसके विपरीत, मुंबई मामले के आरोपी 2006 से लेकर बरी होने तक लगभग बीस साल जेल में रहे। यह असमानता हमारी न्याय व्यवस्था की निष्पक्षता और जवाबदेही को संदेह और अविश्वसनीयता के कटघरे में खड़ा करती है।

राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी इन मामलों में विरोधाभास दिखाती हैं। मुंबई मामले में राज्य सरकार ने हाईकोर्ट के फैसले के दिन ही सुप्रीम कोर्ट में अपील की और राहत भी मिली। लेकिन मालेगांव मामले में मुख्यमंत्री ने उसी दिन बयान देकर आरोपियों को निर्दोष घोषित कर दिया। उन्होंने कहा कि पिछली सरकार ने उन्हें झूठे आरोपों में फंसाया था, क्योंकि वे एक विशेष समूह से जुड़े थे। इस दौरान उन्होंने मुंबई लोकल ट्रेन बम धमाकों के तथ्यों को नजरअंदाज कर दिया। मुंबई मामले में अपील करने और असली अपराधियों को पकड़ने की प्रतिबद्धता दिखाई गई थी, लेकिन मालेगांव मामले में सरकार ने कुछ ही घंटों में आरोपियों को पूरी तरह माफ कर दिया। ये साफ असमानताएं हमारी न्याय व्यवस्था की निष्पक्षता, स्थिरता और जवाबदेही पर गंभीर सवाल उठाती हैं।

न्याय चुनिंदा नहीं हो सकता। आरोपियों को बिना जवाबदेही के लंबे समय तक जेल में रखना उचित नहीं है। न्याय इस पर निर्भर नहीं कर सकता कि पीड़ित कौन है या आरोपी किस धार्मिक या राजनीतिक समूह से जुड़ा है। जब तक हमारी जांच एजेंसियों को जवाबदेह नहीं बनाया जाएगा, तब तक ऐसी विफलताएं होती रहेंगी और पीड़ितों को समय पर उचित न्याय नहीं मिलेगा।

जांचकर्ताओं को समझना होगा कि दोष केवल ठोस और कानूनी रूप से स्वीकार्य सबूतों से ही साबित किया जा सकता है। अदालतें जांच की गलतियों के प्रति सहानुभूति नहीं दिखा सकतीं। वे सांविधानिक आदेशों और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तय मानकों से बंधी हैं। अदालतें सबूतों का स्तर गिराकर कमजोर मामलों को स्वीकार नहीं कर सकतीं और न ही करना चाहिए।

 

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