देश का सिस्टम किस तरह और किस हद तक सड़ चुका है, उसे बताने के लिए कुछ घटनाएं काफी हैं. यह मामले बताते हैं कि पूरे सिस्टम का जमीर इस कदर मर चुका है कि उसे इंसानी जज्बातों और भावनाओं से कुछ भी लेना-देना नहीं है. हाल के दिनों में कुछ ऐसी घटनाएं सामने आई हैं, जिनसे सिस्टम की संवेदनहीनता सबके सामने आ गई हैं. आपको याद हो कि कुछ दिनों पहले छत्तीसगढ़ की एक घटना काफी सुर्खियों में रही थी. हाउसिंग बोर्ड के ऑफिस में एक शख्स की फाइल पिछले एक साल से लंबित थी. वहां काम करने वाले कर्मचारियों का कहना था कि उनकी फाइल मिल ही नहीं रही है. इससे नाराज युवक ने हाउसिंग बोर्ड के कर्मचारी को टेबल पर ढेर सारा बादाम बिखेर दिया और कहा कि इसे खाकर अपनी यादाश्त मजबूत कीजिए और हमारी फाइल जल्द से जल्द ढूंढिए. सिस्टम की लापरवाही का यह कोई अकेला या आखिरी घटना नहीं है. इसके बाद
ओडिशा और बिहार से दो अलग-अलग घटनाएं सामने आईं, जिसने मानवता को झकझोर कर रख दिया है. साथ ही सिस्टम की लापरवाही और बेरुखी भी सामने आई. कोई सिस्टम इतना असंवेदनशील कैसे हो सकता है कि बीमार कर्मचारी को सबूत पेश करने के लिए ड्रिप लगाकर ही कार्यस्थल पर पहुंचना पड़े और एक बुजुर्ग भाई को कब्र से अपनी बहन का शव निकालना पड़ जाए. ये सब बस कहने की बातें नहीं हैं, बल्कि ऐसा हुआ है. और इसका जिम्मेदार है यह सिस्टम!
ओडिशा के क्योंझर जिले की घटना ने हर किसी को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि समाज किस तरफ जा रहा है. पूरा सिस्टम इस हद तक असंवेदनशील हो चुका है कि एक भाई को बैंक से महज कुछ हजार रुपये निकालने के लिए बहन का शव कब्र से निकालना पड़ा. यह मामला ओडिशा के क्योंझर जिले के पाटना ब्लॉक का है. दरअसल, जीतू मुंडा ओडिशा ग्रामीण बैंक के मालीपोसी ब्रांच से 20 हजार रुपये निकालने गए थे. जिस खाते से पैसे की निकासी की जानी थी, वह जीतू मुंडा के स्वर्गवासी बहन की थी. बैंक वालों ने जीतू से कहा कि वे अकाउंट होल्डर को लेकर आएं. अब खाताधारक तो इस दुनिया में रहीं नहीं, तो जीतू के लिए समस्या गहरा गई. जीतू को कुछ नहीं सूझा तो वे कब्र खोदकर बहन का कंकाल निकाला और उसे कंधे पर लादकर बैंक के दरवाजे पर पहुंच गए. इस घटना ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा और सिस्टम का क्रूर चेहरा भी सबके सामने ला दिया.
बैंकवालों को क्या करना चाहिए था?
अब सवाल उठता है कि इस परिस्थिति में बैंक के कर्मचारियों और अधिकारियों को क्या करना चाहिए था? अब सवाल यह है कि यदि किसी अकाउंट होल्डर का निधन हो गया तो उस सूरत में सगे-संबंधियों के बैंक खाते से पैसे कैसे निकाले जाएंगे? दरअसल, बैंक में खाता खुलवाते वक्त नॉमिनी के नाम का उल्लेख करने का भी प्रावधान होता है, खाताधारक के न रहने पर नॉमिनी उस खाते से पैसे निकाल सके. यहां एक और सवाल उठता है कि यदि जीतू मुंडा को बैंकिंग नियमों के बारे में जानकारी नहीं है तो उन्हें इसके बारे में सूचित करने की जिम्मेदारी किसकी है. स्वाभाविक है कि बैंक के कर्मचारियों को उनकी बात सुनकर उसका उचित तरीके से निदान करना चाहिए थी. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. तंग आकर जीतू मुंडा को अपनी बहन का कंकाल लाना पड़ा. यह पूरे सिस्टम के नकारेपन और निकम्मेपन को दिखाता है.
बिहार में अफसर का क्रूर चेहरा
दूसरी घटना बिहार की है. कटिहार जिले के एक आंगनबाड़ी केंद्र में काम करने वाली सेवका की तबीयत बेहद खराब थी. उनको ड्रिप चढ़ाया जा रहा था. इस वजह से वह छुट्टी पर चल ही थीं. यहां विभाग के अफसर का पहला कर्तव्य आंगनबाड़ी सेविका का हालचाल और कुशलक्षेम जानने का होना चाहिए था. पर हुआ इसके बिल्कुल उलट. जिले के मनिहारी थाना क्षेत्र के नारायणपुर पंचायत की है. पंचायत के सोहा मध्य भाग वार्ड संख्या-7 में आंगनबाड़ी सेविका के रूप में काम करने वाली प्रेमलता हेंब्रम बीमार होने की वजह से छुट्टी पर थीं. घर पर ही उनका इलाज चल रहा था. लेकिन शायद सिस्टम की फाइलों में बीमारी को तब तक सच नहीं माना जाता, जब तक कि अधिकारी अपनी आंखों से न देख लें. जानकारी के अनुसार, बाल विकास परियोजना अधिकारी (एलएस) वीणा भारती आंगनबाड़ी केंद्र का निरीक्षण करने पहुंचीं तो हेमलता को अनुपस्थित पाकर बेहद नाराज हो गई. उन्हें बताया गया कि प्रेमलता बीमार हैं और छुट्टी पर हैं. वीणा भारत को यकीन नहीं हुआ और उन्होंने कथित रूप से हेमलता को तुरंत हाजिर होने का फरमान सुना दिया. फिर क्या था, हेमलता को बीमार होने का सबूत देने के लिए ड्रिप लगाए हुए उपस्थित होना पड़ा. बीमार होने का सबूत देखने के लिए कई तरीके हो सकते थे, लेकिन सिस्टम ने यहां भी अपना क्रूर रूप दिखाना ही जरूरी समझा.