नालंदा के शीतला माता मंदिर में मंगलवार (31 मार्च) को भगदड़ हुई। इसमें 9 लोगों की मौत हो गई। सुबह 9.30 बजे हादसा हुआ और शाम होते-होते प्रशासन की तरफ से सबकुछ सामान्य दिखाने की कोशिश की गई। मृतकों के परिजन को मुआवजा राशि दी गई। मंदिर में संध्या आरती भी की गई।
नालंदा जिला मुख्यालय से सटे दीपनगर थाना क्षेत्र स्थित प्रसिद्ध शीतला माता मंदिर परिसर के मघड़ा मेले में मंगलवार की सुबह आस्था का माहौल मातम में बदल गया। पूजा के दौरान उमड़ी भारी भीड़ में मची भगदड़ में आठ महिला श्रद्धालुओं की मौत हो गयी, जबकि नौ घायल हो गये। मृतकों में सात महिलाएं नालंदा और एक नवादा की थीं।
नालंदा विधानसभा क्षेत्र में हुई इस घटना के बाद प्रशासन ने मंदिर को अस्थायी रूप से बंद कर श्रद्धालुओं की आवाजाही रोक दी। घायलों में तीन की स्थिति गंभीर है। चैत्र महीने के अंतिम मंगलवार को पूजा करने के लिए करीब 25 हजार श्रद्धालुओं की भीड़ जुटी थी।
न तो पुलिस की तैनाती, न ही भीड़ प्रबंधन का इंतजाम : भारी भीड़ के बावजूद न तो पुलिस की तैनाती थी और न ही प्रबंधन का कोई इंतजाम था। प्रत्यक्षदर्शियों की मानें तो पूजा के लिए आपाधापी मची थी। इसी दौरान सुबह करीब नौ बजे मंदिर के सिंह द्वार के पास अचानक एक महिला बेहोश होकर गिर गई। इसके बाद लोग इधर-उधर भागने लगे। कई महिलाएं जमीन पर गिर गयीं और भीड़ उन्हें रौंदते हुए भागने लगी। इस दौरान आठ महिलाओं की मौत नीचे दबने से हो गई। छह घायलों का इलाज बिहारशरीफ सदर अस्पताल में चल रहा है। गंभीर रूप से घायल तीन को पावापुरी मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया है। घटना के बाद डीजीपी विनय कुमार, डीजी (अभियान) कुंदन कृष्णन, आईजी जितेन्द्र राणा, कमिश्नर अनिमेष कुमार पराशर मौके पर पहुंचे। लापरवाही के आरोप में दीपनगर थानाध्यक्ष राजमणि समेत चार पुलिसकर्मियों को सस्पेंड कर दिया गया है। इस मामले में पहला बड़ा एक्शन हुआ है। पुलिस ने मंदिर के 4 पुजारियों को गिरफ्तार किया है। इसके साथ ही दीपनगर थानाध्यक्ष को भी सस्पेंड किया गया है। मंदिर के प्रबंधन समिति के अध्यक्ष, सचिव और कोषाध्यक्ष समेत 20 लोगों के खिलाफ नामजद प्राथमिकी दर्ज कराई गई है। गिरफ्तार पुजारियों की पहचान अनुज कुमार पांडे, अवधेश कुमार मिश्रा, विवेकानंद पांडे, निरंजन कुमार पांडे के रूप में हुई है।
मुख्यमंत्री के गृह जिले नालंदा में राष्ट्रपति के दौरे के चलते जब पूरा इलाका हाई अलर्ट पर था, उस वक्त हुए इस हादसे के बाद प्रशासन की बड़ी लापरवाही सामने आई है। इस भीड़ को संभालने की कोई तैयारी नहीं थी। यहां लोगों की जान से ज्यादा दक्षिणा पर फोकस किया जा रहा था। पुलिस को भीड़ की जानकारी तक नहीं थी। मंदिर के चढ़ावे में पुलिस हिस्सा ले लेगी, इसलिए मंदिर वालों ने उन्हें सूचना तक नहीं दी। जबकि प्रशासन को ये अच्छी तरह से पता था कि हर मंगलवार को यहां हजारों की भीड़ इकट्ठा होती है।
मंदिर में हुई भगदड़ में किसकी लापरवाही है, इसके जिम्मेदार चेहरे कौन हैं, प्रशासन, पुलिस, मंदिर प्रबंधन की क्या जिम्मेदारी थी और उन्हों क्या किया।
जिम्मेदारी- किसी भी जिले में शांति व्यवस्था बनाए रखना, पुलिस प्रशासन पर नियंत्रण (निर्देशित करना), और जरूरत पड़े पर धारा-144 लगाना। इन सब की जिम्मेदारी जिलाधिकारी की होती है। पुलिस और प्रशासन दोनों इन्हीं को रिपोर्ट करते हैं। ऐसे में अगर किसी मंदिर में 25 हजार लोग जुटने वाले हैं इसकी जानकारी जिलाधिकारी (DM) को होनी चाहिए थी।
लापरवाही- राष्ट्रपति के नालंदा इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह कार्यक्रम को लेकर लगातार ये सभी अधिकारी से अपडेट ले रहे थे। इनके निर्देश पर ही अलग-अलग इलाकों में मजिस्ट्रेट की तैनाती भी हुई थी। इनसे मशविरे के बाद ही नालंदा के पड़ोसी जिले से पुलिस बल को बुलाया गया। इसके बाद भी इन्हें इस बात की सूचना तक नहीं मिल पाई कि जिला मुख्यालय से मात्र 5 किमी दूर इतनी भीड़ जुटने वाली है।
घटना के बाद बयान- यहां बहुत ही दुखद घटना घटी है। जैसे ही सूचना मिली, प्रशासन के लोग यहां पहुंचे। राहत-बचाव कार्य किए जा रहे हैं। सीएम राहत कोष से दो लाख रुपए मुआवजे की घोषणा की गई है। हमारा फोकस राहत बचाव कार्य पर है।
जिम्मेदारी- जनता की सुरक्षा और जिले में शांति व्यवस्था बनाए रखना एसपी की जिम्मेदारी होती है। पूरे जिले के थानेदार इन्हें रिपोर्ट करते हैं। नालंदा के किस जिले में किस तरह की हलचल हो रही है, कहां कितनी भीड़ जुटने वाली है, थाने के अलावा लोकल इंटेलिजेंस से इसकी सूचना इनके पास आती रहती है।
राष्ट्रपति की सुरक्षा में इन्होंने 2500 जवानों की ड्यूटी भी लगाई थी। आसपास के सभी थानों को हाई अलर्ट रहने का मैसेज जारी किया था। हर गतिविधि की सीधे रिपोर्ट मांग रहे थे।
लापरवाही- मंदिर का इलाका दीपनगर थाने से मात्र 3 किमी दूर है, जो जिला मुख्यालय बिहार शरीफ का ही हिस्सा है। इसके बाद भी इन्हें ये सूचना नहीं मिल पाई कि मंदिर परिसर में कितने लोग जमा होने वाले हैं।
अभी 20 दिन पहले मंदिर में तीन दिवसीय शीतला अष्टमी मेला के आयोजन किया गया था। हजारों की संख्या में लोग यहां पहुंचे थे। पुलिस बल भी तैनात था। इसके बाद भी प्रशासन इस बात का अंदाजा नहीं लगा पाया कि मंदिर के भीतर किस चीज की कमी है या मंदिर परिसर में भीड़ को कंट्रोल करने के लिए जवान की तैनाती की जरूरत है। गश्त लगाने के लिए गाड़ी तक की तैनाती नहीं की गई थी।
घटना के बाद क्या कहा- हर मंगलवार को चौकीदार और गश्ती गाड़ी की व्यवस्था की जाती है। पूजा समिति की तरफ से इस बात की जानकारी नहीं दी गई थी कि इतनी भीड़ हो सकती है। जांच में जो भी दोषी पाए जाएंगे, उन पर कार्रवाई करेंगे।
जिम्मेदारी – अपने क्षेत्र में शांति बनाए रखने के लिए वे कार्यकारी मजिस्ट्रेट (Executive Magistrate) के रूप में काम करते हैं। स्थिति बिगड़ने की आशंका पर शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए धारा- 144 लगाने का अधिकार भी इनके पास होता है। किसी भी मेला, धरना, प्रदर्शन या कार्यक्रम आयोजित करने का आदेश देने का अधिकार भी इन्हीं के पास होता है।
लापरवाही- शीतला मंदिर में किस तरह की भीड़ जमा होती है, इसकी जानकारी इनके पास होनी चाहिए, जो नहीं थी। स्थानीय थाना प्रभारी से सूचना मिलने के बाद ये तय करते हैं कि भीड़ को नियंत्रित करने के लिए वहां किस स्तर के मजिस्ट्रेट और कितने पुलिस बल के तैनाती की जरूरत है। लेकिन इन्होंने वहां भीड़ को नियंत्रित करने के लिए कोई आदेश नहीं दिया और न ही किसी मजिस्ट्रेट की नियुक्ति की।
घटना के बाद बयान- अभी तक इस पूरे घटनाक्रम पर कोई बयान नहीं आया है।
जिम्मेदारी- थाना क्षेत्र में शांति, लॉ एंड ऑर्डर और क्राइम के रोकथाम की जिम्मेदारी थाना प्रभारी की होती है। इन्हें हर मंगलवार को मंदिर परिसर में पुलिस बल की तैनाती करनी होती है। गश्ती गाड़ी को नियमित तौर पर वहां भेजना होता है। पिछले दिनों मंदिर में हुए आयोजनों पर ये पुलिस बल भेजते भी रहे हैं।
लापरवाही- मंगलवार से पहले इन्होंने मंदिर प्रबंधन कमेटी के साथ किसी तरह की कोई बैठक ही नहीं की। इन्हें पूरी जानकारी थी कि यहां हर मंगलवार को भारी भीड़ लगती है।
इस बार भी यहां 25000 से ज्यादा लोगों की भीड़ जुट गई, लेकिन ये एक बार भी देखने तक नहीं गए। यहां तक कि मंदिर परिसर में न तो इन्होंने पुलिसकर्मी की तैनाती की और न ही एसडीएम या अपने से बड़े अधिकारी को इसकी कोई जानकारी दी।
घटना के बाद बयान- अभी तक इनकाि कोई बयान नहीं आया है।
जिम्मेदारी- मंदिर में पूजा की व्यवस्था से लेकर भीड़ नियंत्रण और साफ-सफाई तक सारी जिम्मेदारी मंदिर प्रबंधन कमेटी की होती है। मंदिर में मिलने वाले दान-दक्षिणा और मंदिर के विकास कार्यों की जिम्मेदारी भी इन्हीं के कंधे पर होती है।
मंदिर में कितनी भीड़ जुटने वाली है या मेले का आयोजन किया जाना है, इसकी सूचना सबसे पहले इन्हें स्थानीय थाने को देनी होती है। मेले के आयोजन की अनुमति जिला प्रशासन से लेनी होती है।
लापरवाही- मंदिर कमेटी की तरफ से पूजा के आयोजन के लिए बोली लगाई गई। कितनी भीड़ जुट सकती है, इसकी कोई जानकारी इन्होंने थाना या जिला प्रशासन को नहीं दी। मंदिर में भीड़ को नियंत्रित करने के बजाय मंदिर में मौजूद पंडितों ने भीड़ को भड़काया।
स्पेशल पूजा के नाम पर पैसे लेकर लाइन के बाहर लगे लोगों को पहले दर्शन-पूजन कराने लगे। घंटों लाइन में लगे लोगों पर कोई ध्यान नहीं दिया।
मंदिर कमेटी का बयान- घटना के बाद मंदिर परिसर से कमेटी के लोग फरार ही चल रहे हैं। हमने फोन पर कमेटी के कोषाध्यक्ष रविरंजन पांडेय से बात की। उन्होंने बताया-
’आखिरी मंगलवार होने के कारण उम्मीद से ज्यादा भीड़ आ गई थी। आपाधापी के कारण भगदड़ की स्थिति बन गई, लोग एक-दूसरे को दबाने लगे, इसके कारण ये स्थिति बनी। पुलिस वालों को पता होता है कि मंगलवार को भीड़ होती है, इसके बाद भी वे नहीं आए।’
हर मंगलवार को मंदिर की लगती है बोली
नालंदा के जिस शीतला माता मंदिर में हादसा हुआ और 9 लोगों की जान गई, उसकी बोली लगाई जाती है। ये बोली हर मंगलवार को पूजा और मंदिर के प्रबंधन के लिए लगाई जाती है। जो पंडित बोली को जीतते हैं उस दिन की पूरी दक्षिणा और मंदिर से होने वाली आमदनी उनकी होती है। मंदिर कमेटी के अधिकारियों की मानें तो ये वर्षों से चलता आ रहा है।
100 पंडित, बारी-बारी से आता है नंबर
शीतला माता मंदिर पूजा कमेटी के कोषाध्यक्ष रविरंजन पांडेय ने भास्कर को बताया, ’मघड़ा में तकरीबन 100 पंडित हैं। इनमें कौन, कितने दिन यहां पूजा करेगा, ये सब पहले से फिक्स है। कोई भी पंडित एक-दूसरे को डिस्टर्ब नहीं करता। मंदिर के प्रबंधन के लिए उन्हें अलग से टैक्स देना होता है। इस राशि का इस्तेमाल मंदिर के डेवलपमेंट के लिए किया जाता है।
अब इसी फिक्स दिन को पंडित बेच देते हैं। कभी 50 हजार में तो कभी 90 हजार में तो कभी लाखों में इसकी बोली लगती है। ये पैसा उनका होता है, जो अपनी बारी को बेचते हैं। जो इसकी बोली को जीतते हैं, उनका दक्षिणा और चढ़ावे के जरिए होने वाली कमाई पर हक होता है।
ऐसे में बोली जीतने वाले पंडित परिसर में अपनी मनमानी चलाते हैं। न तो वे प्रशासन को और न ही पुलिस को इसकी जानकारी देते हैं। अपने वॉलिंटियर्स और चेलों की मदद से वे भीड़ को कंट्रोल करते हैं। अपने हिसाब से पैसे लेकर लोगों को दर्शन और विशेष पूजा कराते हैं।
मंदिर में व्यवस्थाओं की 5 बड़ी खामियां
1-VIP एंट्री के नाम पर पैसे लेकर पीछे से दर्शन
श्रद्धालुओं का सबसे बड़ा आरोप है कि मंदिर में पैसे लेकर पीछे के गेट से सीधे दर्शन कराए जा रहे थे। जो लोग सुबह 6 बजे से लाइन में लगे थे, वे घंटों इंतजार कर रहे थे, जबकि पैसे देने वाले लोग आसानी से अंदर जा रहे थे। इससे भीड़ में गुस्सा बढ़ा और विरोध शुरू हुआ। कई लोगों ने बताया कि इसी वजह से धक्का-मुक्की की शुरुआत हुई, जो बाद में भगदड़ में बदल गई।
2- मंदिर में कोई बैरिकेडिंग या लाइन सिस्टम नहीं था
लोगों का आरोप है कि इतनी बड़ी भीड़ के बावजूद मंदिर में कोई व्यवस्थित लाइन या बैरिकेडिंग नहीं थी। लाइन सिर्फ नाम की थी, लोग साइड से घुस रहे थे, आगे बढ़ रहे थे और कोई रोकने वाला नहीं था। गर्भगृह छोटा था, लेकिन प्रवेश और निकास का रास्ता भी एक ही था। इससे भीड़ एक जगह जमा हो गई और दबाव बढ़ता गया।
3- इतनी भीड़ के बावजूद एक भी पुलिसकर्मी नहीं था
प्रत्यक्षदर्शियों ने साफ कहा कि मंदिर परिसर में कोई पुलिसकर्मी तैनात नहीं था। न भीड़ को कंट्रोल करने वाला कोई था,न मंदिर से बाहर निकालने वाला। जब हादसा हुआ, तब भी शुरुआती समय में कोई पुलिस मदद के लिए नहीं पहुंची। लोग खुद ही घायलों को संभालते रहे।
4- एंबुलेंस और राहत में 40 मिनट की देरी
हादसे के बाद सबसे बड़ा दर्द यह रहा कि मदद समय पर नहीं पहुंची। कई श्रद्धालुओं ने बताया कि बार-बार कॉल करने के बावजूद एंबुलेंस करीब 40 मिनट बाद पहुंची। इस बीच घायल महिलाएं जमीन पर पड़ी रहीं, लोग ई-रिक्शा से उन्हें अस्पताल ले जाने को मजबूर हुए।
5-मंदिर प्रबंधन और पंडा कमेटी की मनमानी
स्थानीय लोगों ने आरोप लगाया कि मंदिर प्रबंधन और पंडा कमेटी पूरी तरह मनमानी कर रही थी। न प्रशासन को सही जानकारी दी गई, न भीड़ के हिसाब से कोई तैयारी की गई। आरोप है कि चढ़ावे और पैसे के चक्कर में व्यवस्था को नजरअंदाज किया गया।
आपदा के नियम कैसे तोड़े गए जानिए…
- राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) ने मंदिर, पिकनिक स्पॉट, रेलवे स्टेशनों जैसे जगहों पर भगदड़ को रोकने के लिए अफसरों को दिशा-निर्देश जारी किया है।
- आयोजन से पहले भीड़ का सटीक अनुमान लगाएं, कार्यक्रम से पहले निरीक्षण और बैरिकेड्स लगाएं ताकि भीड़ को नियंत्रित किया जा सके।
- भीड़ को ट्रैक करने के लिए एआई-आधारित कैमरे, ड्रोन, और आरएफआईडी (RFID) तकनीक का इस्तेमाल करें।
- पुलिस बल को पर्याप्त संख्या में तैनात करें। एग्जिट मतलब निकास गेट हमेशा खुला रखें। त्वरित प्रतिक्रिया टीम (QRT) स्टैंडबाय पर रखें।
- जिला प्रशासन, पुलिस और आयोजकों के बीच कम्युनिकेशन स्पष्ट रहे।
- भीड़ को संयमित रखने के लिए लाउड स्पीकर से लगातार सूचना देते रहें।
- मंदिर की क्षमता के अनुसार ही लोगों को एंट्री दें।
- नालंदा प्रशासन और शीतला माता मंदिर प्रबंधन ने NDMA के किसी भी नियम का पालन नहीं किया।







