‘नितिन की जिम्मेदारी सिर्फ पार्टी नहीं, बल्कि NDA के सहयोगियों को भी साथ लेकर चलना है।’
बीजेपी हेडक्वार्टर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नितिन नवीन की ताजपोशी के दौरान ये बातें कहीं। बीजेपी के सबसे बड़े नेता नितिन नवीन के लिए ये केवल एक सलाह नहीं, सबसे बड़ी चुनौती भी है।
पहली बार बिहार का कोई बेटा बीजेपी में इस पद तक पहुंचा है। 2005 से लगातार नीतीश कुमार के चेहरे पर बिहार में सरकार चला रही बीजेपी 2025 के चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनी। इसके पास अपना सीएम बनाने का मौका है।
अब जब बांकीपुर के विधायक बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गए हैं तो तात्कालिक तौर पर उनके सामने बंगाल चुनाव एक बड़ी चुनौती तो है ही, लेकिन बिहार की राह भी आसान नहीं है।
ये 3 बड़ी चुनौती सीधे तौर पर दिखाई दे रही है…
- राज्य में अपना CM बनाना
- अलग-अलग गुटों में बंटी बीजेपी को एकजुट करना
- पूरे बिहार में बीजेपी की स्वीकार्यता बनाना
आइए अब विस्तार से इन पॉइंट्स को समझते हैं।
1- क्या नितिन बिहार में अपना सीएम बना पाएंगे?
आधिकारिक तौर पर बीजेपी के सभी नेता इस बात पर कुछ भी बोलने से बचते रहे हैं। NDA के सभी घटक दल एकजुट होकर नीतीश कुमार को अपना नेता बता रहे हैं। हालांकि, नीतीश कुमार की बढ़ती उम्र और गिरती सेहत के कारण लगातार इस बात की चर्चा बनी हुई है कि बंगाल चुनाव के बाद बिहार में मुख्यमंत्री पद को लेकर बड़ा उलटफेर हो सकता है।
मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो इसकी तैयारी केवल बीजेपी के तरफ से नहीं हो रही है। जदयू भी इसकी तैयारी में जुटी है। यही कारण है कि नीतीश के बेटे निशांत की पॉलिटिकल डेब्यू किस रूप में कराई जाए, इसकी प्लानिंग भीतरखाने तैयार हो रही है। ये तय है कि अंतिम फैसला नीतीश कुमार ही लेंगे।
सीएम पद पर दावा बरकरार रहे, इसके लिए छोटी पार्टियों को तोड़ने का विकल्प भी खुला है। इस पर सत्ता पक्ष की दोनों पार्टियों का ऑपरेशन जारी है।
सीनियर जर्नलिस्ट अरुण कुमार पांडेय बताते हैं, ’बीजेपी मौजूदा समय में विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी है, लेकिन अभी तक उनका अपना सीएम नहीं हुआ है। कभी अकेले बहुमत में पार्टी नहीं आई है। लालू के विरोध में नीतीश की अगुआई में बीजेपी उनके साथ आई और अभी तक उनके साथ ही है। देर-सबेर बीजेपी अपनी ताकत से सत्ता में आने की कोशिश करेगी।’
अगर आंकड़ों की बात करें तो भाजपा के भरोसेमंद सहयोगी चिराग पासवान की पार्टी LJP(R) 19, जीतन राम मांझी की पार्टी HAM 5 और उपेंद्र कुशवाहा के RLM को 4 सीटों पर जीत मिली है। चारों पार्टियों (BJP, LJP R, HAM, RLM) के विधायकों को जोड़ दें तो (89+19+5+4) आंकड़ा 117 तक पहुंचता है। बहुमत के लिए जरूरी 122 से सिर्फ 5 कम।
2- धड़ों में बंटती बीजेपी को एकजुट कैसे करेंगे नितिन नवीन?
बिहार बीजेपी बाहर से भले एकजुट दिखाई दे, लेकिन पार्टी भीतर से कई धड़ों में बंटी हुई है। इसकी बानगी कई बार खुलकर सामने आई है। नाराजगी का ही नतीजा है कि एक प्रदेश अध्यक्ष का जितना कार्यकाल होना चाहिए उतने समय में बिहार में बीजेपी तीन प्रदेश अध्यक्ष बदल चुकी है।
पार्टी की तरफ से पूर्व प्रदेश अध्यक्ष संजय जायसवाल का कार्यकाल पूरा होने के बाद मार्च 2023 में सम्राट चौधरी को प्रदेश की कमान दी गई थी, लेकिन मात्र 15 महीने के भीतर ही इन्हें बदलना पड़ा गया। इसके बाद जुलाई 2024 में दिलीप जायसवाल को पार्टी की कमान दी गई। ये भी मात्र 17 महीने तक ही चले। अब इन्हें भी बदल दिया गया।
पार्टी के प्रदेश स्तर के एक बड़े नेता ने भास्कर को बताया कि स्थिति यह है कि नेता एक-दूसरे से सार्वजनिक तौर पर मिलने से भी परहेज करते हैं ताकि उनपर किसी धड़े का ठप्पा न लग जाए।
पार्टी के सीनियर लीडर अश्विनी चौबे ने तो खुलेआम ऐलान कर दिया था कि आयातित माल पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष नहीं बनेगा।
डैमेज कंट्रोल के लिए दिलीप जायसवाल प्रदेश अध्यक्ष जरूर बने लेकिन संगठन में सम्राट चौधरी का दबदबा बरकरार रहा। दिलीप जायसवाल ने 35 लोगों की अपनी स्टेट लेवल की टीम बनाई थी। इसमें करीब 60 फीसदी यानी 20 लोग सम्राट चौधरी के रिपीट किए गए। मतलब जायसवाल सिर्फ 15 नए लोगों को कार्यसमिति में शामिल कर सके थे।
इसके अलावा पार्टी में नित्यानंद राय की अपनी पकड़ बनी हुई है। कभी बीजेपी की तरफ से सीएम पद के दावेदार रहे नित्यानंद प्रदेश की सियासत में अपनी पकड़ ढीली नहीं होने दे रहे हैं।
पॉलिटिकल एनालिस्ट भोलानाथ बताते हैं, ’संगठन में बीजेपी का ये एक रिवाज सा रहा है कि मजबूत लोग अपने लोगों को विभिन्न पदों पर सेट करने में जुट जाते हैं। ऐसे में नितिन नवीन की ये कोशिश होगी कि वे प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी के साथ मिलकर बिहार में एक ऐसा संगठन खड़ा करें, जिसकी लोग मिसाल दें।’
वहीं, सीनियर जर्नलिस्ट अरुण कुमार पांडेय बताते हैं, ’पिछले 2 दशक से बीजेपी में बहुत गुटबाजी है। नित्यानंद राय, सम्राट चौधरी हर नेता का अपना-अपना गुट बन गया है। इसे कम करना उनकी बड़ी चुनौती बन गई है।’

3- क्या बिहार में पार्टी को गठबंधन से मुक्त करा पाएंगे नितिन नवीन?
बिहार में 2005 से NDA की सरकार है। तब से लगातार नीतीश कुमार बिहार के सीएम हैं। 2005 के बाद से 2026 तक बीजेपी दो बार सबसे बड़ी पार्टी बनी। आलम ये रहा कि 2020 में संख्या के आधार पर जदयू बीजेपी के आधे नंबर पर थी, लेकिन इसके बाद भी सीएम नीतीश कुमार ही बने। इसके दो कारण हैं।
- बिहार में नीतीश कुमार बीजेपी की मजबूरी
- पूरे बिहार में बीजेपी की स्वीकार्यता नहीं
सीनियर जर्नलिस्ट अरुण पांडेय ने कहा, ‘मौजूदा समय में बीजेपी विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी है, लेकिन अभी सेकंड सीट पर है। इसका कारण लालू के विरोध की राजनीति है। इसी के कारण नीतीश की अगुआई में बीजेपी उनके साथ आई और अभी तक उनके साथ ही है।
अब इसका खामियाजा समझिए। 2025 के विधानसभा चुनाव के नतीजों में 8 ऐसे जिले हैं, जहां बीजेपी के एक भी विधायक नहीं हैं। 8 ऐसे जिले हैं, जहां बीजेपी के मात्र 1 विधायक हैं। चुनाव से पहले सभी पार्टियों की कोशिश थी कि हर जिले में कम से कम उनके एक विधायक हों।
पॉलिटिकल एक्सपर्ट की मानें तो गठबंधन की सियासत के कारण बीजेपी अभी तक पूरे बिहार की पार्टी नहीं बन पाई है। कई ऐसे जिले हैं, जहां बीजेपी संगठन के तौर पर बहुत मजबूत है, लेकिन सीटें गठबंधन के लिए छोड़नी पड़ जाती हैं, जबकि कई जिले ऐसे हैं जहां चुनाव नहीं लड़ने के कारण पार्टी संगठन नहीं खड़ा कर पा रही है।
हालात ये हैं कि विश्व की सबसे बड़ी पार्टी का दावा करने वाली बीजेपी राज्य की सभी विधानसभा सीटों पर अपने दम पर कैंडिडेट उतारने की स्थिति में नहीं है। अब नितिन नवीन के सामने चुनौती ये होगी कि सभी जिलों में अपना संगठन इतना मजबूत करें कि अपने दम पर चुनाव लड़ सकें।







