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4 राज्य, 6 लेन और 7 घंटे का सफर… वाराणसी-रांची-कोलकाता एक्सप्रेसवे

UB India News by UB India News
January 9, 2026
in TAZA KHABR, परिवहन
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4 राज्य, 6 लेन और 7 घंटे का सफर… वाराणसी-रांची-कोलकाता एक्सप्रेसवे
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पूर्वी भारत लंबे समय से बेहतर सड़क कनेक्टिविटी की मांग करता रहा है. उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल जैसी घनी आबादी वाले और आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण राज्यों को जोड़ने के लिए अब एक ऐसा मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट आकार ले रहा है, जो आने वाले दशकों तक क्षेत्र की तस्वीर बदल देगा. वाराणसी-रांची-कोलकाता एक्सप्रेसवे, जिसे आमतौर पर वाराणसी-कोलकाता एक्सप्रेसवे भी कहा जा रहा है, सिर्फ एक सड़क परियोजना नहीं है, बल्कि यह पूर्वी भारत की आर्थिक, सामाजिक और औद्योगिक धड़कन को तेज करने की एक बड़ी पहल है.

इस एक्सप्रेसवे का उद्देश्य धार्मिक नगरी वाराणसी को औद्योगिक और बंदरगाह नगरी कोलकाता से तेज और सुरक्षित सड़क मार्ग से जोड़ना है. इसके रास्ते में रांची जैसे खनिज और औद्योगिक संभावनाओं वाले शहर को शामिल करना इस परियोजना को और भी खास बनाता है. यह पूरा प्रोजेक्ट ग्रीनफील्ड कॉरिडोर के रूप में विकसित किया जा रहा है, यानी इसके लिए बिल्कुल नई सड़क बनाई जा रही है जो आधुनिक एक्सप्रेसवे मानकों के अनुरूप होगी.

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भारतमाला परियोजना का अहम हिस्सा

वाराणसी-रांची-कोलकाता एक्सप्रेसवे को भारत सरकार की महत्वाकांक्षी भारत माला परियोजना के अंतर्गत विकसित किया जा रहा है. भारतमाला का उद्देश्य देश में लॉजिस्टिक्स लागत को कम करना, यात्रा समय घटाना और आर्थिक गतिविधियों को नई गति देना है. इस एक्सप्रेसवे के जरिए न केवल चार राज्यों को जोड़ा जाएगा, बल्कि यह राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के बीच बेहतर तालमेल बनाएगा.

इस परियोजना की कुल लंबाई लगभग 610 किलोमीटर प्रस्तावित है. शुरुआत में यह छह लेन का एक्सप्रेसवे होगा, जिसे भविष्य में आठ लेन तक बढ़ाया जा सकेगा. पूरी सड़क एक्सेस-कंट्रोल्ड होगी, यानी बीच में कहीं भी कट नहीं होगा और ट्रैफिक नॉन स्टॉप चलता रहेगा.

चार राज्यों से होकर गुजरेगा एक्सप्रेसवे

यह एक्सप्रेसवे उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल, चार प्रमुख राज्यों से होकर गुजरेगा. यही वजह है कि इसे पूर्वी भारत की लाइफलाइन कहा जा रहा है. यह मार्ग पुराने राष्ट्रीय राजमार्ग-2 (अब NH-19) और ग्रैंड ट्रंक रोड के समानांतर विकसित होगा, लेकिन उससे कहीं अधिक आधुनिक और तेज होगा.

उत्तर प्रदेश में यह वाराणसी रिंग रोड के पास बरहुली गांव से शुरू होगा और बिहार की सीमा में प्रवेश करेगा. बिहार में कैमूर, रोहतास, औरंगाबाद और गया जैसे जिलों से गुजरते हुए यह झारखंड में प्रवेश करेगा, जहां चतरा, हजारीबाग, रामगढ़, बोकारो और रांची के आसपास के क्षेत्रों को कवर करेगा. इसके बाद पश्चिम बंगाल में पुरुलिया, बांकुरा और आरामबाग होते हुए यह हावड़ा के पास उलुबेरिया में NH-19 से जुड़ेगा.

पहाड़ी इलाकों में टनल और आधुनिक इंजीनियरिंग

इस एक्सप्रेसवे की सबसे बड़ी खासियत इसका इंजीनियरिंग डिजाइन है. बिहार के कैमूर जिले में लगभग 5 किलोमीटर लंबी टनल बनाई जाएगी. यह टनल न केवल पहाड़ी और वन क्षेत्रों में सड़क के निर्माण को आसान बनाएगी, बल्कि पर्यावरण को होने वाले नुकसान को भी कम करेगी. इसके अलावा पूरे कॉरिडोर के साथ 100 मीटर का राइट ऑफ वे रखा गया है, ताकि भविष्य में विस्तार और अन्य सुविधाएं विकसित की जा सकें.

सेक्शन और पैकेज में बंटा एक्सप्रेसवे का निर्माण

पूरे वाराणसी-रांची-कोलकाता एक्सप्रेसवे को पांच बड़े सेक्शन में बांटा गया है. हर सेक्शन को आगे कई पैकेजों में बांटा गया है, जिनके आधार पर निर्माण के लिए अलग-अलग टेंडर जारी किए गए हैं. यह मॉडल इसलिए अपनाया गया है ताकि काम एक साथ कई जगहों पर तेजी से हो सके.

  • पहला सेक्शन वाराणसी के पास बरहुली से बिहार के बक्सर जिले के रामपुर तक फैला है.
  • दूसरा सेक्शन रामपुर से तेतहर गांव तक जाता है.
  • तीसरा सेक्शन तेतहर से गया जिले के शाहपुर तक है.
  • चौथा सेक्शन शाहपुर से झारखंड के कमालपुर तक फैला है.
  • पांचवां और अंतिम सेक्शन कमालपुर से पश्चिम बंगाल के उलुबेरिया तक जाता है.

इस तरह पूरा कॉरिडोर पूर्वी भारत को एक साथ बांधता है.

यात्रा समय में ऐतिहासिक कमी

आज के समय में वाराणसी से कोलकाता की सड़क यात्रा लगभग 690 किलोमीटर लंबी है और इसमें 12 से 14 घंटे तक लग जाते हैं. इस नए एक्सप्रेसवे के चालू होने के बाद यही दूरी सिर्फ 6 से 7 घंटे में तय की जा सकेगी. यानी यात्रा समय लगभग आधा हो जाएगा. यह कमी सिर्फ निजी यात्रियों के लिए नहीं, बल्कि ट्रक, बस और मालवाहक वाहनों के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण होगी. तेज डिलीवरी से उद्योगों को फायदा मिलेगा, ईंधन की बचत होगी और लॉजिस्टिक्स लागत में उल्लेखनीय गिरावट आएगी.

पर्यटन, व्यापार और रियल एस्टेट को मिलेगा बढ़ावा

वाराणसी-रांची-कोलकाता एक्सप्रेसवे का असर केवल सड़क यात्रा तक सीमित नहीं रहेगा. इससे धार्मिक, सांस्कृतिक और प्राकृतिक पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा. वाराणसी, बोधगया, राजगीर, नेतरहाट, रांची और पश्चिम बंगाल के कई पर्यटन स्थल एक-दूसरे के और करीब आ जाएंगे. इसके साथ ही एक्सप्रेसवे के आसपास रियल एस्टेट गतिविधियों में तेजी आने की उम्मीद है. नए टाउनशिप, वेयरहाउस, लॉजिस्टिक पार्क, होटल और पेट्रोल पंप विकसित होंगे. स्थानीय दुकानों और छोटे व्यवसायों को भी इससे सीधा लाभ मिलेगा. निर्माण के दौरान और बाद में लाखों प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोज़गार के अवसर पैदा होंगे.

लागत और वित्तीय ढांचा

इस मेगा प्रोजेक्ट की कुल अनुमानित लागत 35,000 करोड़ रुपये से अधिक बताई जा रही है. इसमें से लगभग 25,000 करोड़ रुपये निर्माण पर और करीब 10,000 करोड़ रुपये भूमि अधिग्रहण पर खर्च होने का अनुमान है. परियोजना को EPC और हाइब्रिड एन्यूटी मॉडल जैसे आधुनिक कंस्ट्रक्शन मॉडल के तहत विकसित किया जा रहा है. निर्माण और निगरानी की जिम्मेदारी भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के पास है, जबकि नीति और स्वीकृति स्तर पर सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय इस परियोजना को दिशा दे रहा है.

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