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देश विरोधी मामलों पर अदालत की दो टूक, किसी भी तरह की रियायत नहीं बरती जाएगी……………….

UB India News by UB India News
January 7, 2026
in कानून, ब्लॉग
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अरावली केस: क्यों पलटना पड़ा सुप्रीम कोर्ट को अपना फैसला……………..
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फरवरी, 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में दंगों की साजिश रचने से जुड़े मामले में शीर्ष अदालत ने पांच आरोपियों के निरंतर कारावास को जरूरी नहीं मानते हुए उन्हें सशर्त जमानत दी, जबकि दो आरोपियों-उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इन्कार कर दिया, जिससे स्पष्ट है कि इन दोनों की भूमिका को अदालत ने सबूतों के आधार पर बेहद गंभीर माना है। न्यायालय ने स्पष्ट कहा है कि अभियोजन और सबूतों, दोनों के लिहाज से उमर खालिद और शरजील इमाम की भूमिका अन्य आरोपियों की तुलना में ‘अलग और गंभीर’ है।

चूंकि, इन दोनों को दोबारा जमानत की अर्जी दायर करने के मामले में अदालत ने गवाहों की जांच पूरी हो जाने या फिर अधिकतम एक साल की शर्त रखी है, इससे साफ है कि दोनों को जल्दी राहत नहीं मिलने वाली है। पांच आरोपियों को बेशक सशर्त जमानत दी गई है, लेकिन उन पर लगाए गए आरोपों में कोई नरमी नहीं दिखाई गई, बल्कि कहा गया है कि अगर इन शर्तों का उल्लंघन होता है, तो ट्रायल कोर्ट जमानत रद्द करने के लिए स्वतंत्र होगा। गौरतलब है कि इन सातों आरोपियों के खिलाफ दिल्ली पुलिस ने दिल्ली दंगों के संदर्भ में यूएपीए के तहत मामला दर्ज किया था, जिसमें बड़े पैमाने पर फैली हिंसा में 53 लोग मारे गए थे और 700 से अधिक लोग घायल हुए थे।

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हालांकि, बचाव पक्ष ने दलील दी कि आरोपियों को लंबे समय से जेल में कैद रखा गया है, पर अदालत ने स्पष्ट किया कि यह जमानत का आधार नहीं हो सकता, क्योंकि ‘कथित अपराधों में इन दोनों की भूमिका केंद्रीय रही है। इन दोनों की हिरासत की अवधि भले ही लंबी रही हो, पर यह न तो सांविधानिक प्रावधानों का उल्लंघन करती है और न ही संबंधित कानूनों के तहत लगे वैधानिक प्रतिबंधों को निष्प्रभावी करती है।’ अभियोजन पक्ष ने अदालत में जो सबूत पेश किए हैं, उससे प्रथमदृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि दिल्ली दंगा स्वतःस्फूर्त नहीं भड़का था, बल्कि यह ऐसे समय में देश की संप्रभुता पर सुनियोजित हमला था, जब दूसरे देश के एक विशिष्ट अतिथि भारत दौरे पर थे।

जाहिर है, यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश को बदनाम करने तथा देश में सांप्रदायिक विभाजन पैदा करने की भी सोची-समझी कोशिश थी, जिसके लिए न सिर्फ भड़काऊ भाषण दिए गए, बल्कि व्हाट्सएप से संदेश भी प्रसारित किए गए। बेशक यह हिंसा सीएए और एनआरसी के खिलाफ चल रहे आंदोलनों के समय भड़की, लेकिन क्या इसका उद्देश्य विरोध से कहीं ज्यादा देश भर में आंतरिक अस्थिरता पैदा करना नहीं था? जाहिर है, शीर्ष अदालत ने मामले की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए अपने सुविचारित फैसले के जरिये कड़ा संदेश दिया है कि देश विरोधी मामलों में किसी भी तरह की रियायत नहीं बरती जाएगी और उससे सख्ती से निपटा जाएगा।

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