पटना का 1 अणे मार्ग सिर्फ एक पता नहीं, बल्कि बिहार की सत्ता का प्रतीक माना जाता है. यही वह जगह है जहां से मुख्यमंत्री सरकार चलाते हैं और जहां रहना सत्ता के शीर्ष पद की पहचान है. लेकिन 2014 में इस सरकारी पते ने राजनीति की बड़ी कहानी लिखी- तब, जब मुख्यमंत्री बदल गया, लेकिन बंगला बदलने की प्रक्रिया उतनी आसान नहीं रही.
राबड़ी देवी का मामला ही नहीं, बिहार में ‘टर्निंग पॉइंट’ की कहानी भी अनोखी है!
पटना. बिहार की राजनीति में सत्ता बदलने का मतलब सिर्फ चेहरों का बदलना नहीं होता, कई बार पते भी बदलते हैं. इन दिनों पूर्व मुख्यमंत्री और विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष राबड़ी देवी को 10 सर्कुलर रोड वाला बंगला खाली करने का नोटिस मिलना उसी राजनीतिक परंपरा की नई कड़ी है. उन्हें कभी मुख्यमंत्री रहते यह आवास मिला था, आज उन्हें सरकार की तरफ से नया पता-39 हार्डिंग रोड सौंपा जा रहा है. यह विवाद सिर्फ आवास परिवर्तन का प्रशासनिक आदेश नहीं, बल्कि बिहार की उस पुरानी राजनीतिक याद को भी फिर उभार रहा है जब 2014–15 में सीएम आवास 1 अणे मार्ग को लेकर नीतीश कुमार और जीतन राम मांझी के बीच तनाव चरम पर पहुंच गया था.
जब नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ी
बिहार की राजधानी पटना का 1, अणे मार्ग- बिहार के मुख्यमंत्री का आधिकारिक पता… उस समय सुर्खियों का केंद्र बन गया था. 2014 में लोकसभा चुनाव में मिली हार के बाद नीतीश कुमार को नैतिक जिम्मेदारी महसूस हुई और 17 मई 2014 को उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया. इसके बाद उन्होंने यह भी निर्णय लिया कि वे मुख्यमंत्री आवास 1 अणे मार्ग खाली कर देंगे, क्योंकि उनका मानना था- जिस पद पर नहीं हूं, उस पद की सुविधा क्यों लूं? ये राजनीतिक संदेश और छवि दोनों के लिहाज से महत्वपूर्ण कदम था. 20 मई को मांझी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और इसके बाद नीतीश कुमार ने बंगला भी छोड़ दिया. लेकिन, जब कुछ समय बाद राजनीतिक समीकरण बदलकर नीतीश कुमार फिर से सत्ता में लौटे तो बंगला खाली कराने का मुद्दा गरमा गया. जीतन राम मांझी ने तुरंत बंगला छोड़ने को तैयार नहीं हुए और मामला सम्मान बनाम अधिकार की लड़ाई में बदल गया.
पटना का 1 अणे मार्ग, राबड़ी देवी, नीतीश कुमार और जीतन राम मांझी के बंगले विवाद की राजनीति और सत्ता के प्रतीक की कहानी
जीतन राम मांझी बने मुख्यमंत्री, फिर सत्ता-संग्राम
जीतन राम मांझी वहां रहने लगे, लेकिन इसके बाद हालात बदलने लगे. रिश्तों में दरार और सत्ता की दो कमान एक ही दल में हो गई. धीरे-धीरे दोनों नेताओं के बीच रिश्ते बिगड़ने लगे. मांझी खुद को सिर्फ नाममात्र का मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि पूरी तरह से स्वतंत्र सत्ता प्रमुख साबित करना चाहते थे. वहीं, जेडीयू के अंदर माना जाता था कि सरकार की असली बागडोर अब भी नीतीश के हाथ में थी. यहीं से तनाव शुरू हुआ.जेडीयू विधायकों और गठबंधन की गुटबंदी के बीच, नीतीश कुमार ने फिर से मुख्यमंत्री बनने की तैयारी शुरू की. मांझी को विश्वास-मत साबित करने का न्योता मिला, लेकिन मतदान से पहले ही 20 फरवरी 2015 को उन्होंने इस्तीफा दे दिया. वर्ष 2015 में नीतीश ने वापसी का ऐलान किया और 9 फरवरी को जीतन राम मांझी को जेडीयू से निकाल दिया गया.
रिश्तों में दरार और सत्ता की दो कमान.
मांझी का इस्तीफा, नीतीश की वापसी और बंगला खाली
फरवरी 2015 में स्थितियां ऐसी बन गईं कि 22 फरवरी 2015 को नीतीश कुमार ने फिर से शपथ ली और उनकी सरकार बनी. ऐसे में जीतन राम मांझी को पद तो छोड़ना पड़ा, लेकिन उन्होंने बंगला खाली करने के आदेश का तुरंत पालन नहीं किया. मांझी का कहना था- मैं मुख्यमंत्री था और मुझे सम्मान के साथ समय दिया जाना चाहिए. यह विवाद इतना बढ़ा कि यह सिर्फ सरकारी आदेश नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रतिष्ठा का सवाल बन गया था. जीतन राम मांझी ने बंगला नहीं छोड़ा. सरकार और उनके बीच खींचतान चली, पुलिस तैनात हुई, अधिकारियों ने चेतावनी दी. आखिरकार कई दौर की बातचीत और सरकारी दबाव के बाद मांझी ने बंगला छोड़ने पर सहमति दी. अंततः 22 जून 2015 को करीब चार महीने बाद जीतन राम मांझी ने 1, अणे मार्ग खाली कर दिया.
पटना का 1 अणे मार्ग, राबड़ी देवी, नीतीश कुमार और जीतन राम मांझी के बंगले विवाद की राजनीति और सत्ता के प्रतीक की कहानी
सत्ता, सम्मान और राजनीतिक नियंत्रण की लड़ाई
कुछ सप्ताह बाद 1 अणे मार्ग फिर से नीतीश कुमार के अधिकार में आ गया. लेकिन, आज जब राबड़ी देवी के बंगले पर विवाद बढ़ रहा है और RJD इसे राजनीतिक प्रतिशोध बता रही है, तब यह सवाल फिर उभर कर सामने आ रहा है- क्या बिहार में सत्ता सिर्फ मेंडेट से चलती है या पते से भी? दिलचस्प बात यह है कि जिस न्यायिक फैसले ने आज राबड़ी के बंगले को अस्थिर बना दिया है, उसकी पहल उनके बेटे तेजस्वी यादव ने ही की थी. उस समय वे सिस्टम सुधार की बात कर रहे थे, लेकिन आज वही सिस्टम उनके परिवार के द्वार पर नोटिस बनकर खड़ा है.
सिर्फ ईंट-पत्थर की दीवार नहीं, सत्ता की पहचान
जानकार कहते हैं कि बिहार की राजनीति में बंगले सिर्फ सरकारी संपत्ति नहीं रहे- वे सत्ता, प्रतिष्ठा और राजनीतिक पहचान के प्रतीक बन चुके हैं. पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी से लेकर पूर्व सीएम राबड़ी देवी तक का पूरा किस्सा यह दिखाता है कि बंगला सिर्फ ईंट-पत्थर या सरकारी संपत्ति नहीं होता; यह सत्ता, पहचान और राजनीतिक अधिकार का प्रतीक बन जाता है. इसलिए हर बार जब सत्ता बदलती है तो दीवारों के भीतर सिर्फ फर्नीचर नहीं, इतिहास और राजनीति भी स्थानांतरित होती हुई प्रतीत होती है और संबंधित माननीयों को दिल से तकलीफ होती है!
समाज के किसी भी तबके में कोई उपेक्षा या नाराजगी का भाव लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं………
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