नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव के लिए इस बार बिहार चुनाव आर या पार का चुनाव है। ये उनके और उनकी पार्टी के राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई का भी चुनाव है। जीते तो रहेंगे और हारे तो बचे रहना मुश्किल। आखिर क्यों?
नीतीश कुमार के लिए ये चुनाव आर या पार का है, ये सवाल क्यों उठ रहा है?
JDU की सबसे बड़ी ताकत नीतीश कुमार हैं। वो अभी 74 साल के हैं। इस बार JDU सत्ता बरकरार नहीं रख पाई, तो अगला चुनाव 2030 में होगा। तब नीतीश की उम्र 79 साल हो चुकी होगी। हाल के दिनों में उनकी सेहत को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। ऐसे में नीतीश कमजोर पड़े तो तो फिर JDU को रिवाइव करना मुश्किल हो सकता। इसकी 6 वजहें…
नीतीश के बाद JDU में कोई पॉपुलर लीडर नहीं
2003 में बनी JDU बीते 22 साल से नीतीश की छतरी के नीचे ही चल रही है। नीतीश कुमार ही चेहरा रहे हैं। पार्टी में कोई और नेता नहीं, जिसकी पकड़ पूरे बिहार में हो। दूसरे नंबर पर जरूर कुछ नेता पहुंचे हैं, लेकिन वे भी लंबे समय तक टिक नहीं पाए हैं।
इनमें सबसे बड़ा नाम RCP सिंह यानी रामचंद्र प्रसाद सिंह का है। UP कैडर के IAS अफसर रहे RCP 2010 में नौकरी छोड़कर JDU में आए। उन्हें नीतीश कुमार का आंख-कान-नाक कहा जाता था। 2020 में JDU के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने। हालांकि, 2 साल बाद ही दोनों के रिश्ते में दरार पड़ गई और RCP ने JDU छोड़ दिया। वे भाजपा में शामिल हुए और फिर जनसुराज का हिस्सा बन गए।
2015 में नीतीश के साथ मिलकर महागठबंधन की सरकार बनवाने में अहम भूमिका निभाने वाले PK भी नीतीश के काफी करीब रहे। अक्सर वे नीतीश के साथ दिखते थे। तब चर्चा थी कि नीतीश के बाद प्रशांत किशोर ही JDU का चेहरा हैं। हालांकि, बाद में प्रशांत किशोर भी अलग हो गए।
कोईरी समुदाय से आने वाले उपेंद्र कुशवाहा भी नीतीश के करीबी रह चुके हैं। हालांकि, बाद में उन्होंने अलग होकर खुद की पार्टी बना ली। बता दें, कोईरी समुदाय नीतीश का कोर वोटर माना जाता है।
पिछले साल पूर्व IAS अफसर मनीष वर्मा का नाम भी नीतीश के उत्तराधिकारी के तौर पर उभरा। नालंदा के रहने वाले मनीष वर्मा उसी कुर्मी समाज से आते हैं, जिससे नीतीश आते हैं। फिलहाल वे पार्टी में होते हुए भी अहम निर्णयों से दूर हैं।
बड़े लीडर हैं भी तो कोर वोटर कोईरी-कुर्मी समुदाय से नहीं
JDU में नीतीश के अलावा 4 बड़े नेता हैं। केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह, राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा, विजय कुमार चौधरी और अशोक चौधरी। इनमें ललन सिंह और विजय चौधरी भूमिहार हैं। संजय झा ब्राह्मण है और अशोक चौधरी दलित। जबकि, JDU का कोर वोटर कुर्मी-कोईरी और EBC हैं।
तीनों समुदायों को मिला लें तो बिहार की कुल आबादी का 43% हैं। इनमें अकेले EBC आबादी 36% है।
मतलब यह है कि नीतीश के बाद पार्टी के चारों बड़े नेता JDU के कोर वोट बैंक से नहीं आते। यानी चारों कुर्मी-कोईरी और अति पिछड़ा समीकरण में फिट नहीं।
सीनियर जर्नलिस्ट संजय सिंह बताते हैं, ‘फिलहाल बिहार की राजनीति में पिछड़ा तबका हावी है। नीतीश पिछड़े तबके के बड़े नेता हैं। ऐसे में वे किसी फॉरवर्ड को टॉप लीडरशिप नहीं सौंपना चाहेंगे। इससे अति पिछड़ा तबका लालू की तरफ शिफ्ट हो सकता है। अगर दलित नेता के नाते अशोक चौधरी को विरासत सौंपी जाती है, तो अति पिछड़ी जातियां उन्हें अपना नेता नहीं मानेगी।
10 साल में JDU की 62% सीटें कम हुईं, वोट शेयर भी गिरा
2010 में JDU को 115 सीट मिली। 2015 में 71 सीट और 2020 में 43 सीटें मिली। यानी 10 साल में 72 कम। मतलब 62 प्रतिशत सीटें घट गईं। सीटों के साथ ही JDU का वोट शेयर भी लगातार गिर रहा है। आकंड़े इसकी गवाही भी दे रहे हैं।
2010 में जदयू को 22.6 प्रतिशत वोट मिले थे। 2015 में 17.3 प्रतिशत और 2020 में 15.7 प्रतिशत। यानी 10 साल में करीब 5 प्रतिशत वोट शेयर घट गया।
अब सवाल है कि नीतीश का ग्राफ गिरा तो शिफ्ट किधर हुआ… 2010 में RJD को 22 सीटें और 18.84% वोट मिले। लेकिन 2020 में 75 सीट और 23% पहुंच गया। यानी RJD की 52 सीटें और 3% से ज्यादा वोट शेयर बढ़ गया। एक्सपर्ट मानते हैं कि नीतीश के वोटर्स का एक बड़ा हिस्सा RJD की तरफ शिफ्ट हो गया।
चुनाव हारे तो पार्टी के अस्तित्व का खतरा
एक्सपर्ट्स मानते हैं कि अगर नीतीश सत्ता बरकरार नहीं रखते हैं, तो पार्टी के अस्तित्व पर भी खतरा हो सकता है। क्योंकि JDU में ऐसे कई नेता हैं जिनकी सियासी महत्वकांक्षा है। नीतीश के कमजोर पड़ने पर वे दूसरे चेहरे के साथ जा सकते हैं। यानी पार्टी के भीतर टूट-फूट भी हो सकती है।
इसी साल जुलाई में ‘बिहार बदलाव यात्रा’ के दौरान जनसुराज के प्रशांत किशोर ने दावा किया था, ‘नवंबर बाद न तो नीतीश मुख्यमंत्री रहेंगे और न ही JDU नाम की कोई पार्टी बचेगी। जब कोई कमजोर पड़ता है तो ताकतवर उस पर कब्जा कर लेता है। ठीक वैसे ही JDU का दफ्तर भी BJP का हो जाएगा।’
कमजोर हुए नीतीश तो भाजपा बना सकती है अपना CM
बिहार हिंदी पट्टी का इकलौता राज्य है, जहां BJP का कोई CM नहीं रहा। सियासी गलियारे में जब-तब चुनाव बाद भाजपा का मुख्यमंत्री बनाने की चर्चा होती रही है। इस बात को बल गृहमंत्री अमित शाह के उस बयान से मिला, जिसमें इसी साल जून में उन्होंने एक अंग्रेजी अखबार को दिए इंटरव्यू में कहा था- चुनाव बाद बिहार के CM का नाम तय होगा। हालांकि, बाद में BJP ने सफाई दी कि नीतीश ही बिहार में NDA का चेहरा हैं। ‘नीतीश कुमार पिछली बार ही जब कम सीटें जीते थे तो वह मुख्यमंत्री नहीं बनना चाहते थे। लेकिन भाजपा ने उनको जबरन बनाया। इस बार वह बराबर सीटें भी जीतेंगे तो पद छोड़ देंगे। पूरी संभावना है जीतने पर भाजपा का CM होगा।’
नीतीश के बेटे निशांत भी फिलहाल विकल्प नहीं
सियासी गलियारों में एक चर्चा चली कि नीतीश के बेटे निशांत राजनीति में आ सकते हैं। कुछ लोगों ने यह भी कहा कि अगर JDU को टूटने से बचाना है तो निशांत को पार्टी में आना चाहिए। फिलहाल ये दोनों बातें दूर की कड़ी मालूम पड़ती है। क्योंकि निशांत पॉलिटिक्स में एक्टिव नहीं हैं और नीतीश उन्हें पब्लिक कार्यक्रमों में साथ नहीं रखते।
इसी महीने 3 सितंबर को एक इंटरव्यू में JDU के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने भी साफ कर दिया कि फिलहाल निशांत कुमार राजनीति में नहीं आएंगे।
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेटे निशांत का अध्यात्म में मन लगता है। वह राजनीति से अब तक दूरी बनाकर रखे हुए हैं। हालांकि, इसी साल जनवरी से वह मीडिया में बयान देकर पिता को जिताने की अपील करते रहे हैं। फोटो इस साल निशांत कुमार के जन्मदिन की है।‘नीतीश कुमार के करीबी लोगों ने पार्टी को बचाने के लिए निशांत कुमार को आगे करने की योजना बनाई थी, लेकिन निशांत ने खुद राजनीति में आने से मना कर दिया। नीतीश कुमार भी उनके नाम पर राजी नहीं है।’
तेजस्वी यादव के लिए ये चुनाव इतना अहम क्यों है?
पूर्व सीएम लालू यादव अपनी पार्टी RJD को पूरी तरह से बेटे तेजस्वी को सौंप चुके हैं। तेजस्वी ही पार्टी का चेहरा हैं और हर बड़े फैसले लेने वाले हैं। 2020 के चुनाव में तेजस्वी भले ही सरकार नहीं बना पाए थे, लेकिन RJD 75 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी थी। पर एक्सपर्ट कहते हैं कि इस बार ऐसा नहीं होने वाला.. क्यों आइए जानते हैं…
पिछले साल की तरह चिराग फैक्टर काम नहीं आएगा
पॉलिटिकल एक्सपर्ट कहते हैं, ‘2020 चुनाव में सियासी समीकरण अलग था। चिराग पासवान एनडीए से अलग होकर चुनाव लड़ रहे थे। नीतीश को कमजोर करने के लिए बीजेपी के वोटर्स भी चिराग का साथ दे रहे थे। कम से कम 30 सीटों पर नीतीश को सीधा नुकसान पहुंचाया था। इसका फायदा तेजस्वी को मिला था। इस बार लग रहा है कि चिराग NDA के साथ ही चुनाव लड़ेंगे। ऐसे में असली परीक्षा अब होनी है।’
तेजस्वी की लीडरशिप पर सवाल उठेगा
यह चुनाव तेजस्वी की लीडरशिप का भी फैसला करेगा। अगर महागठबंधन की सरकार नहीं बनता है तो हार का ठीकरा तेजस्वी के ही सिर फुटेगा। उनकी सहयोगी पार्टियों को नेतृत्व पर सवाल करने का मौका मिल जाएगा। लेफ्ट की पार्टियां (माले, CPI, CPIM) चुनाव के रिजल्ट के बाद नए सिरे से अपने गठबंधन पर विचार कर सकती हैं। चूंकि, ये पार्टियां अभी बीजेपी को रोकने के लिए ही तेजस्वी के साथ है। अगर आगे उनको लगेगा कि भाजपा को कोई दूसरी पार्टी रोक सकती है, तो वह उसके साथ हो सकती है।’
मुख्य विपक्ष के तौर पर RJD के बजाय PK जैसे दूसरे ऑप्शन तलाशे जाएंगे
प्रशांत किशोर की जोर आजमाइश के बाद कई एक्सपर्ट यह मानते हैं कि बिहार की जनता एक तीसरा ऑप्शन तलाश रही है। बीते 4 विधानसभा चुनावों को देखें तो आंकड़े भी इसकी गवाही देते हैं। करीब 25% से ज्यादा लोगों ने हर चुनाव में दोनों NDA और महागठबंधन से अलग वोट किया है। यानी लोग एक अलग विकल्प की तलाश कर रहे हैं।
पॉलिटिकल एक्सपर्ट कहते हैं, ‘तेजस्वी के युवा होने और जुझारू छवि के कारण कई नए वोटर उनके साथ जुुड़े हैं, लेकिन अगर इन वोटर्स को लगा कि तेजस्वी यादव जीत नहीं सकते तो वह प्रशांत किशोर जैसे विकल्प तलाश सकते हैं।’ नवंबर 2024 में हुए 4 विधानसभा सीट के उपचुनाव में प्रशांत किशोर की पार्टी जनसुराज को करीब 10% वोट मिले थे।
मुस्लिम वोटबैंक दूसरी ओर शिफ्ट हो सकता
तेजस्वी यादव को विरासत में MY यानी मुस्लिम-यादव वोट बैंक मिला है। जातिगत सर्वे-2022 के मुताबिक, दोनों की आबादी 31.96% (मुस्लिम 17.7% + यादव 14.26%) है। तेजस्वी और कांग्रेस के एक साथ होने के कारण मुस्लिम वोटों का बंटवारा नहीं होता है। हालांकि, कुछ मुस्लिम नीतीश कुमार को भी वोट करते रहे हैं।
मुस्लिम बीजेपी को रोकने के लिए तेजस्वी के साथ हैं, लेकिन अगर तेजस्वी यह चुनाव हार गए तो मुस्लिमों को नए सिरे से सोचने पर मजबूर होना पड़़ सकता है।
पॉलिटिकल एक्सपर्ट ओमप्रकाश अश्क बताते हैं, ‘ओवैसी ने चुनाव से पहले महागठबंधन में शामिल होने की इच्छा जताकर अपनी कौम को संदेश दिया है कि हम बीजेपी को रोकने के लिए एक हैं। ओवैसी जानते हैं कि लालू-तेजस्वी साथ नहीं रखेंगे। तभी तो AIMIM अब कहने लगी है कि लालू-तेजस्वी को अपनी चिंता है, मुस्लिमों की नहीं। ऐसे में तेजस्वी के पक्ष में नतीजे नहीं आए तो आगे मुस्लिम वोटर छिटक सकते हैं।’
चुनाव बाद बीजेपी मजबूत हुई तो आगे राजनीतिक लड़ाई कठिन होगी
तेजस्वी के हारने का मतलब है कि बीजेपी मजबूत होगी। ऐसी स्थिति में बिहार की राजनीतिक जमीन पर तेजस्वी को वापसी करने में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा। बीजेपी अपनी सोशल इंजीनियरिंग के दम पर आगे निकल सकती है। ‘तेजस्वी यादव मुस्लिम-यादवों के नेता बनकर रह गए हैं। अभी भी उनके पीछे लालू-राबड़ी का शासनकाल चल रहा है, जो लोगों के दिलो-दिमाग में चस्पा है। वहीं अब पूरी पॉलिटिक्स EBC पर शिफ्ट हो गई है, जिस पर NDA काबिज है। बीजेपी भी बढ़ रही है, जो आगे RJD के लिए मुश्किलें पैदा कर रही है।‘
20 साल पहले RJD को जितना वोट मिलता था उतना ही वोट अब भी उसके पास है। जबकि, भाजपा अपना करीब 4% वोट बैंक बढ़ा चुकी है।
परिवार से भी चुनौती मिल सकती है
पिछले कुछ महीने से लालू परिवार में रार की खबरें आ रही हैं। एक वीडियो वायरल होने के बाद लालू ने बड़े बेटे तेज प्रताप को पार्टी और परिवार से निकाल दिया। अब तेज प्रताप ने नई पार्टी बना ली है और चुनाव प्रचार भी कर रहे हैं। कई मौकों पर तो वे राजद और अपने परिवार पर ही सवाल उठा देते हैं। इशारों-इशारों में 30 अगस्त को जहानाबाद में तेज प्रताप ने कहा था, ‘जो अपने लोगों का नहीं हुआ, वो जनता का क्या होगा?’ इसी रैली में एक युवक ने मुख्यमंत्री के लिए तेजस्वी का नारा लगा दिया तब भी तेज प्रताप नाराज हो गए थे।







