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क्या सेकुलर छवि नीतीश की जरूरत?

UB India News by UB India News
August 21, 2025
in पटना, मुख्यमंत्री
0
क्या सेकुलर छवि नीतीश की जरूरत?
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राजनीति के ‘चाणक्य’ कहे जाने वाले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिहार विधानसभा चुनाव के मद्देनजर एक नई बाजी खेल दी है। मदरसा बोर्ड की स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में शामिल हुए। इससे महागठबंधन की राजनीति को जोरदार झटका दिया है। पल-पल पैंतरा बदलने वाले राजनीतिज्ञ नीतीश कुमार का ये अंदाज पुराना है। सच है कि मुस्लिमों को वोट अधिकांशतः महागठबंधन की और जाता है, मगर वे अपने सेकुलर राजनीति को छोड़ने जैसी गलती भी नहीं करेंगे।

2014 लोकसभा चुनाव में नीतीश का टूटा भ्रम
जदयू के सूत्रों की मानें तो वर्ष 2014 का लोकसभा चुनाव नीतीश कुमार की सेकुलर राजनीति को लगभग हाशिए पर रखा। अपने शासन काल में मुस्लिमों के विकास के लिए मदरसों को हर तरह से समृद्ध करने में नीतीश कुमार ने कोई कमी नहीं छोड़ी। साथी दल भाजपा के भीतर इस बात को लेकर असहमति भी थी। बावजूद 2010 के विधासनसभा में 115 सीटें जीतने के कारण एक अपनी धमक भी थी। लेकिन बीजेपी से अलग होकर जनता दलयू अकेले लोकसभा चुनाव लड़ी तो नीतीश कुमार के मुस्लिम प्रेम को धक्का लगा था। सूत्र बताते हैं कि जदयू के रणनीतिकारों ने राज्य के कुछ उर्दू अखबार के संपादक से इस बाबत जानना चाहा तो जवाब मिला कि बीजेपी छोड़कर राजद के साथ आने पर मुस्लिमों के वोट मिलेंगे।

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ललन सिंह के बयान पर देनी पड़ी थी सफाई
वर्ष 2024 के नवंबर में केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन उर्फ ललन सिंह ने तो साफ कहा था कि मुसलमान लोग नीतीश कुमार को वोट नहीं देते हैं। ये लोग तो उनको वोट देते हैं, जिनके राज में मदरसे के शिक्षकों का वेतन तीन से चार हजार था। आज सातवां वेतन आयोग का वेतन मिल रहा है। केंद्रीय मंत्री ललन सिंह के इस बयान ने बिहार की सियासत गर्म कर दी बल्कि अपरोक्ष रूप से नीतीश कुमार की सेकुलर राजनीति की पोल खोल दी। यहां तक बात फैल गई कि ललन सिंह के बयान पर सफाई देने के लिए मंत्री अशोक चौधरी को मैदान में आने पड़ा। तब उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार ना मुसलमान हैं, न हिंदू, ना सिख और न ईसाई। नीतीश कुमार इंसान हैं। सबके लिए एक बराबर काम कर रहे हैं।

क्या सेकुलर छवि नीतीश की जरूरत?
बीजेपी से समझौता करके भी नीतीश कुमार ने अपनी सेकुलर छवि को बचाए रखा। बीजेपी को ऐसा माहौल बनाने से भी रोका जो सीधे-सीधे धर्म की तलवार के सहारे लड़े जाते। बीजेपी के साथ रहकर भी मुस्लिम कल्याण योजनाओं की बरसात कर दी। वजह साफ भी था कि उनके इस चरित्र को लेकर प्रगतिशील मुस्लिम और बैकवर्ड मुस्लिम की दूसरी पसंद बने रहे। ये केवल सेकुलर राजनीति के लिए ही नहीं बल्कि बीजेपी से अलग होकर राजनीति करने की ताकत देती रहे।

वक्फ बोर्ड संशोधन बिल ने भरोसा तोड़ा
वक्फ बोर्ड संशोधन बिल के समर्थन करने पर नीतीश कुमार की सेकुलर राजनीति को कठघरे में जरूर खड़ा किया जाने लगा। देश के तमाम लेफ्टिस्ट आइडियोलॉजी वाले लेखकों, पत्रकारों की आलोचना के शिकार भी हुए। अब बिहार विधानसभा चुनाव के मुहाने पर नीतीश कुमार जो रिकॉर्ड विक्ट्री का नारा दे रहे हैं, उसके लिए जरूरी है कि मुस्लिमों के बीच विश्वास की लकीर को और भी गहरी की जाए।

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