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बिना शोर-शराबे नीतीश कुमार ने पलट दिया चुनावी खेल!

UB India News by UB India News
July 30, 2025
in पटना, बिहार
0
बिहार में नीतीश कुमार ने BJP के कई मंत्रियों के विभागों में किया फेरबदल

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बिहार सरकार ने ग्रामीण स्वास्थ्य को मजबूत करने के लिए आशा और ममता कार्यकर्ताओं के मानदेय में बढ़ोतरी की है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने आशा कार्यकर्ताओं के लिए प्रोत्साहन राशि 1000 रुपये से बढ़ाकर 3000 रुपये करने की घोषणा की है, जबकि ममता कार्यकर्ताओं को प्रति प्रसव 300 रुपये की जगह 600 रुपये मिलेंगे. यह कदम ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने की दिशा में है जहां ये कार्यकर्ता मातृ-शिशु स्वास्थ्य की रीढ़ हैं. लेकिन नीतीश कुमार की यह राजनीतिक रणनीति भी है जिससे वह लगतार तेजस्वी यादव की चुनावी रणनीति पर चोट करते जा रहे हैं. दरअसल, 2025 के विधानसभा चुनाव से पहले नीतीश कुमार की ये घोषणाएं तेजस्वी यादव के लिए बड़ी चुनौती बन गई हैं.

बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव भले ही युवाओं और बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर जोर दे रहे हों, लेकिन नीतीश की महिलाओं और ग्रामीणों पर फोकस वाली नीति उन्हें कड़ी टक्कर दे रही है. जानकार कहते हैं कि अगर नीतीश कुमार इस दांव को सही खेलते हैं तो तेजस्वी की रणनीति कमजोर पड़ सकती है और एनडीए की चुनावी जीत की राह आसान हो सकती है. ऐसे में आइये जानते हैं कि नीतीश कुमार ने हाल में जो घोषणाएं की हैं वह कैसे बिहार के सियासी समीकरण को सेट करने में नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए को सफलता दिला सकता है.

लाखों को फायदा, नीतीश का बड़ा दांव

नीतीश कुमार ने हाल के दिनों में कई घोषणाएं की हैं जो बिहार के अलग-अलग वर्गों को सीधा फायदा पहुंचा रही हैं. सबसे पहले, सामाजिक सुरक्षा पेंशन में बढ़ोतरी से 60 लाख परिवारों को लाभ हुआ है. जहां वृद्ध, विधवा और दिव्यांगों को अब 1,100 रुपये प्रति माह मिल रहे हैं. आशा कार्यकर्ताओं को 3,000 रुपये प्रोत्साहन राशि देने की घोषणा की गई है जिससे लगभग 80,000 कार्यकर्ताओं को सीधी मदद मिली. इन दोनों को जोड़ें तो 60.08 लाख लोगों के लिए यह फायदेमंद साबित हो रहा है.
इसके साथ ङई बिहार में टीचर्स की बहाली में 1.51 लाख पदों पर नियुक्तियां चल रही हैं जिसमें 35% आरक्षण महिलाओं के लिए है. अगर आधे पदों (75,500) पर भी बहाली हुई तो 26,425 महिलाओं को नौकरी मिल सकती है. इसके अतिरिक्त संविदा और आउटसोर्सिंग नौकरियों में भी 35% आरक्षण से 1.5 लाख बहालियों में से 52,500 महिलाओं को फायदा होगा. कुल मिलाकर शिक्षकों और महिलाओं के लिए की गई घोषणाओं से लगभग 79,000 लोगों को फायदा मिल सकता है. पत्रकारों का भी ख्याल रखने की घोषणा की गई है और पत्रकारों के लिए पेंशन 6,000 से बढ़ाकर 15,000 रुपये की गई है. इससे लगभग 2,000 पात्र पत्रकारों को फायदा होगा. मृत्यु के बाद उनके जीवनसाथी को 10,000 रुपये मिलने की व्यवस्था भी है जो इन परिवारों को अतिरिक्त राहत देगी.

नीतीश कुमार का यह है सबसे बड़ा दांव!

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जीविका दीदियों के लिए दो बड़ी घोषणाएं की हैं.उन्होंने जीविका स्वयं सहायता समूहों के लिए 3 लाख रुपये से अधिक के ऋण पर ब्याज दर को 10% से घटाकर 7% करने का फैसला लिया जिसका बोझ राज्य सरकार उठाएगी. साथ ही 1.4 लाख जीविका कर्मियों के मानदेय को दोगुना किया गया है. बता दें कि जीविका कर्मियों को उनके पदों के हिसाब से 6,000 से लेकर 10,000 रुपये तक मानदेय मिलता था. अब इसे दोगुना कर दिया गया है. 2006 से चल रही इस योजना से लगभग 70-80 लाख परिवारों और 3-3.5 करोड़ जनसंख्या को अप्रत्यक्ष लाभ होगा.

कुल संख्या और दांव का सियासी असर

इन सभी घोषणाओं को जोड़ें तो 60.08 लाख पेंशनधारी, 80,000 आशा कार्यकर्ताएं, 78,925 शिक्षक और 2,000 पत्रकार मिलाकर लगभग 61.16 लाख लोग सीधे तौर पर लाभान्वित हुए हैं. इसके साथ ही करीब 1.4 लाख जीविका दीदियों के परिवारों के 3 करोड़ से अधिक लोगों को लाभ मिलेगा. नीतीश कुमार के इन कदमों से ग्रामीण, महिलाओं, शिक्षकों और पत्रकारों जैसे बड़े वोट बैंक को अपने पाले में करने की कोशिश की है जो बिहार की आबादी का करीब 6-7% है. अब सवाल यह है कि क्या ये लाभान्वित होने वाली आबादी वोट में तब्दील होगी या नहीं?

नीतीश की रणनीति वोट में बदलेगे या नहीं?

जानकार कहते हैं कि महिलाओं और ग्रामीणों का वोट बिहार चुनाव में निर्णायक होता है. नीतीश कुमार की शराबबंदी और साइकिल योजना पहले भी वोट दिला चुकी है. इसी रणनीति को आगे बढ़ाते हुए नीतीश कुमार ने हाल के दिनों में महिलाओं के लिए कई बड़े फैसले लिए हैं. इनमें सरकारी नौकरियों में 35% आरक्षण सबसे बड़ी घोषणा है जो बिहार की महिलाओं को नई पहचान देगी. इसके अलावा साइकिल योजना, कन्या विवाह योजना और शराबबंदी जैसे कदमों ने महिलाओं के जीवन को बेहतर किया है. ये कदम न सिर्फ विकास की बात करते हैं, बल्कि चुनावी वोट बैंक को साधने की रणनीति भी हैं.

तेजस्वी का रणनीति और नीतीश का ‘खामोश दांव’!

हालांकि, विपक्ष की ओर से तेजस्वी यादव ऐसी घोषणाओं को चुनावी स्टंट और उनकी नकल बता रहे हैं. हाल के दिनों में तेजस्वी यादव ने सीएम नीतीश कुमार की चुप्पी या खोमोशी को लेकर भी कई हमले किये हैं. लेकिन, जानकारों की नजर में हकीकत यही है कि नीतीश कुमार की चुप्पी और लगातार घोषणाएं एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा लगती हैं. वह बिना शोर-शराबे के काम कर रहे हैं जो उनकी मजबूत छवि को और मजबूत कर रही है. आशा-ममता मानदेय बढ़ोतरी और महिलाओं के लिए आरक्षण जैसे फैसले जनता के बीच सीधा संदेश पहुंचा रहे हैं. यह ‘खामोश रणनीति’ चुनावी माहौल में उनकी पकड़ को बरकरार रख सकती है.
कितना कारगर होगा नीतीश कुमार का दांव?
जानकार कहते हैं कि अगर ये घोषणाएं जमीन पर उतरीं तो 2025 में नीतीश की जीत की राह आसान हो सकती है, वरना विपक्ष इसे पलट सकता है.नीतीश कुमार ने 61.16 लाख लोगों को फायदा पहुंचाकर सियासी जमीन मजबूत करने की कोशिश की है. यह संख्या बिहार के वोटर बेस में बड़ा बदलाव ला सकती है, लेकिन जनता की प्रतिक्रिया और विपक्ष की रणनीति ही तय करेगी कि यह दांव कितना कारगर होगा. बहरहाल, जानकार तो यही कह रहे हैं कि फिलहाल भले ही तेजस्वी यादव, मुख्यमंत्री नीतीश की चुप्पी पर निशाना साध रहे हैं, लेकिन नीतीश की ‘खामोश रणनीति’ चुनावी दांव में भारी पड़ रही है!
बिहार सरकार ने ग्रामीण स्वास्थ्य को मजबूत करने के लिए आशा और ममता कार्यकर्ताओं के मानदेय में बढ़ोतरी की है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने आशा कार्यकर्ताओं के लिए प्रोत्साहन राशि 1000 रुपये से बढ़ाकर 3000 रुपये करने की घोषणा की है, जबकि ममता कार्यकर्ताओं को प्रति प्रसव 300 रुपये की जगह 600 रुपये मिलेंगे. यह कदम ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने की दिशा में है जहां ये कार्यकर्ता मातृ-शिशु स्वास्थ्य की रीढ़ हैं. लेकिन नीतीश कुमार की यह राजनीतिक रणनीति भी है जिससे वह लगतार तेजस्वी यादव की चुनावी रणनीति पर चोट करते जा रहे हैं. दरअसल, 2025 के विधानसभा चुनाव से पहले नीतीश कुमार की ये घोषणाएं तेजस्वी यादव के लिए बड़ी चुनौती बन गई हैं.

बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव भले ही युवाओं और बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर जोर दे रहे हों, लेकिन नीतीश की महिलाओं और ग्रामीणों पर फोकस वाली नीति उन्हें कड़ी टक्कर दे रही है. जानकार कहते हैं कि अगर नीतीश कुमार इस दांव को सही खेलते हैं तो तेजस्वी की रणनीति कमजोर पड़ सकती है और एनडीए की चुनावी जीत की राह आसान हो सकती है. ऐसे में आइये जानते हैं कि नीतीश कुमार ने हाल में जो घोषणाएं की हैं वह कैसे बिहार के सियासी समीकरण को सेट करने में नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए को सफलता दिला सकता है.

लाखों को फायदा, नीतीश का बड़ा दांव

नीतीश कुमार ने हाल के दिनों में कई घोषणाएं की हैं जो बिहार के अलग-अलग वर्गों को सीधा फायदा पहुंचा रही हैं. सबसे पहले, सामाजिक सुरक्षा पेंशन में बढ़ोतरी से 60 लाख परिवारों को लाभ हुआ है. जहां वृद्ध, विधवा और दिव्यांगों को अब 1,100 रुपये प्रति माह मिल रहे हैं. आशा कार्यकर्ताओं को 3,000 रुपये प्रोत्साहन राशि देने की घोषणा की गई है जिससे लगभग 80,000 कार्यकर्ताओं को सीधी मदद मिली. इन दोनों को जोड़ें तो 60.08 लाख लोगों के लिए यह फायदेमंद साबित हो रहा है.
इसके साथ ङई बिहार में टीचर्स की बहाली में 1.51 लाख पदों पर नियुक्तियां चल रही हैं जिसमें 35% आरक्षण महिलाओं के लिए है. अगर आधे पदों (75,500) पर भी बहाली हुई तो 26,425 महिलाओं को नौकरी मिल सकती है. इसके अतिरिक्त संविदा और आउटसोर्सिंग नौकरियों में भी 35% आरक्षण से 1.5 लाख बहालियों में से 52,500 महिलाओं को फायदा होगा. कुल मिलाकर शिक्षकों और महिलाओं के लिए की गई घोषणाओं से लगभग 79,000 लोगों को फायदा मिल सकता है. पत्रकारों का भी ख्याल रखने की घोषणा की गई है और पत्रकारों के लिए पेंशन 6,000 से बढ़ाकर 15,000 रुपये की गई है. इससे लगभग 2,000 पात्र पत्रकारों को फायदा होगा. मृत्यु के बाद उनके जीवनसाथी को 10,000 रुपये मिलने की व्यवस्था भी है जो इन परिवारों को अतिरिक्त राहत देगी.

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बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जीविका दीदियों के लिए दो बड़ी घोषणाएं की हैं.उन्होंने जीविका स्वयं सहायता समूहों के लिए 3 लाख रुपये से अधिक के ऋण पर ब्याज दर को 10% से घटाकर 7% करने का फैसला लिया जिसका बोझ राज्य सरकार उठाएगी. साथ ही 1.4 लाख जीविका कर्मियों के मानदेय को दोगुना किया गया है. बता दें कि जीविका कर्मियों को उनके पदों के हिसाब से 6,000 से लेकर 10,000 रुपये तक मानदेय मिलता था. अब इसे दोगुना कर दिया गया है. 2006 से चल रही इस योजना से लगभग 70-80 लाख परिवारों और 3-3.5 करोड़ जनसंख्या को अप्रत्यक्ष लाभ होगा.

कुल संख्या और दांव का सियासी असर

इन सभी घोषणाओं को जोड़ें तो 60.08 लाख पेंशनधारी, 80,000 आशा कार्यकर्ताएं, 78,925 शिक्षक और 2,000 पत्रकार मिलाकर लगभग 61.16 लाख लोग सीधे तौर पर लाभान्वित हुए हैं. इसके साथ ही करीब 1.4 लाख जीविका दीदियों के परिवारों के 3 करोड़ से अधिक लोगों को लाभ मिलेगा. नीतीश कुमार के इन कदमों से ग्रामीण, महिलाओं, शिक्षकों और पत्रकारों जैसे बड़े वोट बैंक को अपने पाले में करने की कोशिश की है जो बिहार की आबादी का करीब 6-7% है. अब सवाल यह है कि क्या ये लाभान्वित होने वाली आबादी वोट में तब्दील होगी या नहीं?

नीतीश की रणनीति वोट में बदलेगे या नहीं?

जानकार कहते हैं कि महिलाओं और ग्रामीणों का वोट बिहार चुनाव में निर्णायक होता है. नीतीश कुमार की शराबबंदी और साइकिल योजना पहले भी वोट दिला चुकी है. इसी रणनीति को आगे बढ़ाते हुए नीतीश कुमार ने हाल के दिनों में महिलाओं के लिए कई बड़े फैसले लिए हैं. इनमें सरकारी नौकरियों में 35% आरक्षण सबसे बड़ी घोषणा है जो बिहार की महिलाओं को नई पहचान देगी. इसके अलावा साइकिल योजना, कन्या विवाह योजना और शराबबंदी जैसे कदमों ने महिलाओं के जीवन को बेहतर किया है. ये कदम न सिर्फ विकास की बात करते हैं, बल्कि चुनावी वोट बैंक को साधने की रणनीति भी हैं.

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हालांकि, विपक्ष की ओर से तेजस्वी यादव ऐसी घोषणाओं को चुनावी स्टंट और उनकी नकल बता रहे हैं. हाल के दिनों में तेजस्वी यादव ने सीएम नीतीश कुमार की चुप्पी या खोमोशी को लेकर भी कई हमले किये हैं. लेकिन, जानकारों की नजर में हकीकत यही है कि नीतीश कुमार की चुप्पी और लगातार घोषणाएं एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा लगती हैं. वह बिना शोर-शराबे के काम कर रहे हैं जो उनकी मजबूत छवि को और मजबूत कर रही है. आशा-ममता मानदेय बढ़ोतरी और महिलाओं के लिए आरक्षण जैसे फैसले जनता के बीच सीधा संदेश पहुंचा रहे हैं. यह ‘खामोश रणनीति’ चुनावी माहौल में उनकी पकड़ को बरकरार रख सकती है.
कितना कारगर होगा नीतीश कुमार का दांव?
जानकार कहते हैं कि अगर ये घोषणाएं जमीन पर उतरीं तो 2025 में नीतीश की जीत की राह आसान हो सकती है, वरना विपक्ष इसे पलट सकता है.नीतीश कुमार ने 61.16 लाख लोगों को फायदा पहुंचाकर सियासी जमीन मजबूत करने की कोशिश की है. यह संख्या बिहार के वोटर बेस में बड़ा बदलाव ला सकती है, लेकिन जनता की प्रतिक्रिया और विपक्ष की रणनीति ही तय करेगी कि यह दांव कितना कारगर होगा. बहरहाल, जानकार तो यही कह रहे हैं कि फिलहाल भले ही तेजस्वी यादव, मुख्यमंत्री नीतीश की चुप्पी पर निशाना साध रहे हैं, लेकिन नीतीश की ‘खामोश रणनीति’ चुनावी दांव में भारी पड़ रही है!
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