सदगुरु पटना आए तो कहा कि इस शहर को पटना नहीं ‘पाटलिपुत्र’ कहिए। ‘पाटली’ एक फूल का नाम है और पाटलिपुत्र का मतलब होता है ‘पाटली फूल की संतान’। यह नाम सुनकर मन में सुंदर तस्वीर उभरती है। हमें ऐसे नामों का इस्तेमाल करना चाहिए जो गर्व महसूस कराएं और हमारी जड़ों से जोड़ें। 5 महीने पहले सांसद उपेंद्र कुशवाहा ने राज्यसभा में पटना का नाम बदलकर पाटलिपुत्र करने की मांग रखी थी। सिर्फ पटना नहीं, बिहार के पांच शहरों के नाम बदले जाने की चर्चा तेज है। बख्तियारपुर को व्यासपुर और औरंगाबाद को आदित्य नगर नाम दिए जाने की मांग है। इसी तरह जहानाबाद और सुल्तानगंज के भी नाम बदलने की डिमांड है।
क्यों उठ रही शहरों के नाम बदलने की मांग?
भाजपा नेता सम्राट चौधरी के सीएम बनने के बाद शहरों के नाम बदलने की मांग तेज हुई है। उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज और फैजाबाद का नाम बदलकर अयोध्या रखा गया। अब इसी तरह की पहल की उम्मीद सीएम सम्राट से लगाई जा रही है। नाम बदलने की मांग की बड़ी वजह सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान के मुद्दे को प्रमुखता देना है। बीजेपी अपने राष्ट्रवाद के एजेंडे को ताकतवर बनाने के लिए कई राज्यों में यह प्रयोग पहले कर चुकी है। बिहार में भी ऐसे राष्ट्रवाद की नजीर रखी जा सकती है।
बिहार के किन 5 शहरों के नाम बदलने की हो रही मांग?
1. पटना: अखंडित भारत की राजधानी था पाटलिपुत्र
पटना इतिहास में पाटलिपुत्र के नाम से प्रसिद्ध था। गंगा किनारे बसे इस शहर का नाम पटना क्यों पड़ा? इसके अलग-अलग कारण बताए जाते हैं। कहा जाता है कि राजा पत्रक ने अपनी रानी पाटलि के लिए यह शहर बसाया था। 3 हजार साल पहले इस इलाके में पाटलि के बहुत से पेड़ थे।
- मुगल शासक औरंगजेब ने अपने पोते मोहम्मद अजीम के कहने पर 1704 में इसका नाम बदल कर अजीमाबाद कर दिया था। अजीम पटना का सूबेदार था।
- चंद्रगुप्त मौर्य, सम्राट अशोक जैसे राजाओं के शासनकाल में पाटलिपुत्र मौर्य सत्ता का प्रमुख केन्द्र था। सम्राट अशोक के समय पाटलिपुत्र विश्व के सबसे समृद्ध नगरों में से एक था। ब्रिटिश काल में इसका नाम पटना हो गया।
- अब पाटलिपुत्र को उसकी पुरानी पहचान के अनुसार नाम देने का मांग है। हाल में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने पटना के पास पुनपुन में सैटेलाइट टाउनशिप का नाम ‘पाटलिपुत्र’ रखने की बात की है।
- पटना का नाम पाटलिपुत्र करने की मांग से जुड़े बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष अनिल सुलभ से भास्कर ने बात की। उन्होंने कहा, ‘एक वक्त था जब पटना अखंडित भारत की राजधानी था।’
- ‘पटना की जगह पाटलिपुत्र नाम रखने के लिए विधान परिषद में संकल्प लाया गया। प्रेम कुमार, नंदकिशोर यादव, जनार्दन सिंह सिग्रीवाल जैसे नेताओं ने इसका समर्थन किया था। सरकार ने जवाब दिया कि सैटेलाइट टाउनशिप बनाने जा रहे हैं, उसका नाम पाटलिपुत्र नाम रखा जाएगा।’
- वे कहते हैं कि पटना का नाम पाटलिपुत्र तो नहीं किया गया पर पटना लोकसभा की एक सीट का नाम पाटलिपुत्र किया गया। दीघा इलाके में पाटलिपुत्र रेलवे स्टेशन का निर्माण हुआ। एक बार फिर से इस मांग को दमदार तरीके से उठाने की जरूरत है।
2. बख्तियारपुर नहीं व्यासपुर रखा जाए नाम
नालंदा जिले के बख्तियारपुर का नाम बदलकर ‘व्यासपुर’ या ‘मगध द्वार’ रखने की मांग हो रही है। दावा है कि यह क्षेत्र प्राचीन काल में महर्षि वेदव्यास से जुड़ा था। इसका पुराना नाम व्यासपुर था। बख्तियार खिलजी ने नालंदा विश्वविद्यालय नष्ट किया। उसके नाम पर बख्तियारपुर का नाम रखा गया था। 2025 के चुनाव में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह यहां आए थे। उन्होंने बख्तियार खिलजी को याद करते हुए कहा था कि उसने नालंदा महाविहार नष्ट किया था। छह माह तक यहां किताबें जलती रहीं थीं। बख्तियारपुर में 2018 से कला संस्कृति मंच नाम बदलने के लिए आंदोलन चला रही है। मंच के अजय कुमार सिंह ने कहा, ‘बख्तियार खिलजी ने प्राचीन संस्कृति और शिक्षा के बड़े केन्द्र नालंदा को खंडहर में बदल दिया था। उसने बिहार को भारी नुकसान पहुंचाया था।’
बख्तियारपुर शहर का नाम किसके नाम पर रखा गया इसको लेकर एक राय नहीं है। जेडीयू एमएलसी नीरज कुमार ने कहा कि बख्तियार नाम से महान सूफी संत बख्तियार काकी थे। बख्तियारपुर का संबंध एक अफगानी सूबेदार से है जो मुगलों से लोहा लेने वाले और उन्हें हराने वाले शेरशाह सूरी के राज्य का आला अधिकारी था। उस सूबेदार का पूरा नाम बख्तियार तुबेख था। वह पटना से लेकर भागलपुर क्षेत्र का सूबेदार था।
3. औरंगाबाद नहीं, देव धाम या आदित्य नगर कहिए औरंगाबाद शहर का नाम औरंगजेब से जुड़ा माना जाता है। यहां की बड़ी सांस्कृतिक पहचान देव सूर्य मंदिर से है। यही वजह है कि इसका नाम बदलकर ‘देव धाम’ या ‘आदित्य नगर’ करने की मांग की जा रही है। आदित्य, भगवान सूर्य का एक नाम है। जलेश्वर विकास केन्द्र नाम की संस्था 1992 से औरंगाबाद का नाम बदलकर देव धाम करने की मांग कर रही है। इसके महासचिव सिद्धेश्वर विद्यार्थी ने कहा कि बिहार के आधे से अधिक स्थानों के नाम उनकी ऐतिहासिकता और धार्मिक पहचान की वजह से है। जैसे- रोहतास, कैमूर, भोजपुर, वैशाली, नालंदा, सारण।
4. त्रेता युग में मांडवी नगर था जहानाबाद
कहा जाता है कि जहानाबाद नाम मुगल शासक शाहजहां की बेटी जहांआरा के नाम से जुड़ा है। जहांआरा के जहानाबाद आने के बाद यहां मंडियों का विकास किया गया।
कहा जाता है कि त्रेता और द्वापर युग में इसे ‘मांडवी नगर’ के नाम से जाना जाता था। इसका संबंध भगवान श्रीराम के भाई भरत की पत्नी मांडवी से था।
किंवदंती है कि महाभारत काल में यहां स्थित संगम घाट पर पांडवों ने माता मांडवेश्वरी की पूजा की थी।
5. सुल्तानगंज नहीं अजगैबीनाथ कहिए
भागलपुर शहर के सुल्तानगंज शहर का नाम बदलकर अजगैबीनाथ करने की मांग हो रही है। पहले इस शहर का नाम हिरणीपुर और जहांगिरी था। मुगल काल में इसका नाम सुल्तानगंज रखा गया।
जहांगिरी नाम के पीछे की पौराणिक कथा है कि जब गंगा के वेग से जह्नु मुनि की तपस्या भंग हुई तो उन्होंने गंगा को पी लिया। बाद में राजा भगीरथ की प्रार्थना पर उन्होंने अपनी जांघ चीरकर गंगा को फिर से बाहर निकाला , इससे गंगा का नाम जाह्नवी पड़ा।
यहां बहने वाली उत्तरवाहिनी गंगा से जल भरकर देवघर स्थित बैद्यनाथ धाम मंदिर में चढ़ाने की परंपरा रही है।
सावन के समय सुल्तानगंज से लेकर देवघर तक मेला लगता है। लोग कांवर के साथ लगभग 120 किमी की यात्रा पैदल करते हैं। सुल्तानगंज में गंगा नदी के बीच एक चट्टान पर बाबा अजगैबीनाथ मंदिर है। यह यहां की मुख्य पहचान है। इसी कारण सुल्तानगंज का नाम बदल कर अजगैबीनाथ करने की मांग है। दो वर्ष पहले सुल्तानगंज स्टेशन का नाम अजगैबीनाथ धाम रखा गया था।
क्या है नाम बदलने का नियम?
किसी शहर का नाम बदलने के लिए सबसे पहले जन प्रतिनिधियों या राज्य सरकार की पहल पर प्रस्ताव तैयार होता है। इसे विधानसभा में बहुमत से पारित कराना होता है। विधानसभा से पारित होने के बाद केन्द्र सरकार की मंजूरी के लिए प्रस्ताव को गृह मंत्रालय भेजा जाता है।
गृह मंत्रालय से अनापत्ति प्रमाण पत्र मिलने के बाद रेल मंत्रालय, डाक विभाग, इंटेलिजेंस ब्यूरो और सर्वे ऑफ इंडिया से हरी झंडी मिलने के बाद केन्द्र सरकार नाम बदलने की अधिसूचना जारी करती है। अंत में राज्य सरकार की ओर से आधिकारिक अधिसूचना यानी गजट में प्रकाशन किया जाता है।
एक शहर का नाम बदलने में कितना खर्च
शहर का नाम बदलने में कितना खर्च आएगा? इसका अनुमान इससे लगा सकते हैं कि इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज करने पर लगभग 300 करोड़ रुपए का खर्च आया था।
2018 में इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज किया गया था। इस लिहाज से पटना या बिहार के अन्य किसी शहर का नाम बदले में अब के समय में 300 करोड़ के लगभग खर्च आएगा।







