बीती 23 जुलाई को अमेरिका-जापान के बीच हुआ व्यापार समझौता बेहद असंतुलित है और यह अमेरिका को असंगत लाभ प्रदान करता है। इस व्यापार समझौते का प्रावधान अमेरिका को 25 फीसदी के बजाय 15 फीसदी का पारस्परिक शुल्क लगाने की अनुमति देता है। कम पारस्परिक शुल्क का मतलब केवल यही है कि अमेरिका को वह मिल गया, जो वह चाहता था। किसी व्यापार समझौते के आधार पर पारस्परिक टैरिफ किस दर से लगाया जाएगा, यह इतना महत्वपूर्ण नहीं है।
इसके बावजूद, जहां तक अमेरिका का सवाल है, तथ्य यह है कि पहले प्रस्तावित टैरिफ की तुलना में कम टैरिफ लगाने से अमेरिका को जापानी निर्यात की लागत कम होने की उम्मीद है। यह समझौता दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंधों में स्थिरता का भाव भी लाता है और सेमीकंडक्टर, फार्मास्यूटिकल्स और ऑटोमोबाइल जैसे क्षेत्रों में अमेरिका में 500 अरब डॉलर के जापानी निवेश की भी अनुमति देता है। संक्षेप में, यह समझौता अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए अधिक व्यापार संरक्षण और जापानी एफडीआई के जरिये अमेरिका में अधिक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति देता है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप सत्ता संभालने के बाद से ही अमेरिकी सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी बढ़ाने की बात कर रहे हैं। बगैर किसी तामझाम के उनकी चिंता जायज है। चीन से आने वाले सस्ते आयात के कारण अमेरिका में विनिर्माण क्षेत्र लगभग न के बराबर बचा है। अमेरिका में जापानी निवेश की अनुमति विनिर्माण गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए है। इस दृष्टि से, यह व्यापार समझौता अमेरिका में विनिर्माण क्षेत्र को पुनर्जीवित करने की दिशा में उठाया गया कदम भी है। अब सवाल उठता है कि इस व्यापार समझौते से बदले में जापान को क्या मिलेगा। इसका जवाब है-कुछ खास नहीं।
मोटे तौर पर कहें, तो अमेरिकी बाजार में जापानी कारों के लिए शायद एक स्थिर बाजार पहुंच मिले। यह अमेरिका के लिए भले ही बड़ी बात हो, लेकिन जापान के लिए बिल्कुल भी नहीं है। बड़ा सवाल यह है कि जापान इस समझौते के लिए क्यों राजी हुआ। इसका मुख्य कारण संभवतः जापानी जीडीपी में ऑटोमोबाइल का सापेक्षिक महत्व हो सकता है। जापानी जीडीपी में ऑटोमोबाइल क्षेत्र का हिस्सा 2.9 फीसदी है और यह जापान के विनिर्माण जीडीपी का लगभग 14 फीसदी है।
ऑब्जर्वेटरी ऑफ इकनॉमिक कम्प्लेक्सिटी द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के अनुसार, 2023 में, वैश्विक कार निर्यात में जापान की हिस्सेदारी 12.2 फीसदी थी और 36 फीसदी जापानी कारें अमेरिका को निर्यात की गईं। यह भी ध्यान देने योग्य है कि चूंकि कनाडा और मेक्सिको के लिए पारस्परिक टैरिफ 25 फीसदी लगाए जाने की उम्मीद है, इसलिए अमेरिका के बाजार में पहुंच के मामले में जापान को इन देशों की तुलना में बढ़त मिलती है। इससे जापानी कार निर्माताओं को मदद मिल सकती है।
अगर हम कृषि की बात करें, तो यह समझौता अमेरिकी कृषि उत्पादों को जापानी बाजार तक आसान पहुंच प्रदान करता है। वर्ष 2022 में, अमेरिका के कुल वैश्विक कृषि निर्यात का लगभग 7.7 फीसदी जापान को भेजा गया था। अमेरिकी वाणिज्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार, यह 14.9 अरब डॉलर मूल्य के कृषि उत्पादों के बराबर था। अमेरिकी वाणिज्य विभाग के अनुसार, जापान अमेरिकी कृषि निर्यात के लिए एक महत्वपूर्ण बाजार है, और लगातार इन उत्पादों के लिए शीर्ष गंतव्यों में शुमार है। भले ही यह समझौता अमेरिका और जापान के बीच हुआ हो, लेकिन भारत के लिए भी इसके कुछ महत्वपूर्ण निहितार्थ हैं, खासकर तब, जब भारत अमेरिका के साथ व्यापार समझौते पर बातचीत कर रहा है। फिलहाल, अमेरिका ने जापान के लिए 15 फीसदी पारस्परिक शुल्क लगाया है, जो भारत सहित अमेरिका द्वारा घोषित अधिकांश अन्य पारस्परिक शुल्कों से कम है। इस तरह से देखें, तो अमेरिकी बाजार में पहुंच के मामले में भारत जापान के मुकाबले नुकसान में है।
ऐसे में, अमेरिका-जापान व्यापार समझौते का हवाला देते हुए भारत अमेरिकी कृषि बाजार में पहुंच के लिए बड़ी रियायत की मांग कर सकता है। जापान के विपरीत, कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार बनी हुई है। कृषि क्षेत्र को खोलना मुश्किल हो सकता है और शायद अभी ऐसा करने का समय नहीं आया है। चूंकि, भारत पहले ही ब्रिटेन के साथ एक मुक्त व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर कर चुका है, इसलिए उस समझौते के विभिन्न प्रावधान भी एक मानक के रूप में काम करेंगे। किसी भी कठिन वार्ता को इस बात पर आधारित होना होगा कि क्या संभव है और क्या व्यवहार्य है, यह ब्रिटेन-भारत व्यापार समझौते के तहत भारत द्वारा पहले ही सहमत बातों से अलग होगा।
अमेरिका-भारत व्यापार समझौते का नतीजा चाहे जो भी हो, बड़ा सवाल यह है कि अमेरिका टैरिफ की धमकी को हथियार बनाकर आक्रामक रुख अपना रहा है, ताकि विभिन्न देशों को अमेरिका के लिए फायदेमंद व्यापार समझौते करने के लिए मजबूर किया जा सके। यह व्यापक वैश्वीकरण के सिद्धांतों के बिल्कुल खिलाफ है। उल्लेखनीय है कि उसने जापान के बाद यूरोपीय संघ (ईयू) के साथ भी पारस्परिक टैरिफ समझौते को अंतिम रूप दे दिया है। अमेरिका और ईयू के बीच हुए समझौते के तहत ईयू पर 15 फीसदी टैरिफ लगाया जाएगा, इस समझौते के तहत ईयू अमेरिका में 600 अरब डॉलर का निवेश करेगा।
ये रणनीतिक स्तर विभिन्न देशों से संबंधित सौदे हर देश को उतना फायदा नहीं पहुंचाएंगे, जितना वैश्वीकरण से उम्मीद की जा रही थी। इस तरह के सौदे वैश्विक बाजार को खंडित कर देंगे और वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में तनाव ही बढ़ाएंगे। दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था द्वारा बढ़ता संरक्षणवाद वैश्विक व्यापार व्यवस्था के खेल में छोटे खिलाड़ियों द्वारा अपनाए गए संरक्षणवाद से अलग है। अब समय आ गया है कि बाजार के विखंडन से आगे सोचा जाए और यह अमेरिका के साथ देशों से संबंधित विशिष्ट व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर करके नहीं किया जा सकता। हम इसे जितनी जल्दी समझ लें, उतना ही बेहतर है।







