टैरिफ या सीमा शुल्क संबंधी विवाद का लगातार बढ़ना दुखद है। अचरज नहीं कि ब्राजील के रियो डी जेनेरियो में आयोजित ब्रिक्स के शिखर सम्मेलन में भी टैरिफ का मुद्दा उठा और सभी सदस्य देशों ने ट्रंप की टैरिफ नीति को गलत व मनमाना बताया। गौर करने की बात है कि ब्रिक्स की बैठक से ट्रंप नाराज हैं। उन्होंने कहा है कि ब्रिक्स के सदस्य देशों पर वह दस प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लगाएंगे। इससे भी व्यापार जगत में चिंता और बढ़ गई है। हालांकि, ब्रिक्स में शामिल देश चीन ने बिना समय गंवाए अपनी प्रतिक्रिया दी है। ट्रंप यह मानते हैं कि ब्रिक्स का गठन अमेरिकी हितों को नुकसान पहुंचाने के लिए हुआ है। चीन ने अपनी ओर से यह समझाने की कोशिश की है कि ब्रिक्स समूह टकराव नहीं चाहता, पर क्या ट्रंप इस बात को मानेंगे? क्या राजनीतिक या कूटनीतिक हथियार के रूप में टैरिफ का इस्तेमाल रुकेगा?
कुल मिलाकर, यही लगता है कि ब्रिक्स के खिलाफ ट्रंप का रोष आने वाले दिनों में बढ़ सकता है। ब्रिक्स के शिखर सम्मेलन में ईरान पर किए गए प्रहार को भी गलत माना गया है। ब्रिक्स के महत्व को नकारा नहीं जा सकता, क्योंकि इस 10 सदस्यीय संगठन में ब्राजील, चीन, मिस्र, इथियोपिया, भारत, इंडोनेशिया, ईरान, रूस, दक्षिण अफ्रीका और संयुक्त अरब अमीरात शामिल हैं। ब्राजील में आयोजित ब्रिक्स सम्मेलन की एक सुखद बात यह है कि घोषणापत्र में पहलगाम हमले की भी कड़ी निंदा की गई है। इतना ही नहीं, आतंकियों और उनके वित्त-पोषण के नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई का भी इरादा जताया गया है। ध्यान रहे, एससीओ की बैठक में पहलगाम हमले का जिक्र न होने की वजह से भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने संयुक्त घोषणापत्र पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया था। अत: ब्रिक्स के घोषणापत्र में पहलगाम का जिक्र होना स्वागतयोग्य है। आतंकवाद के खिलाफ एकजुटता जरूरी है, अगर दुनिया के ताकतवर देश आतंकवाद के खिलाफ कदम उठाएंगे, तो इससे भारत को लाभ होगा। अब ज्यादातर देश अपने आर्थिक आधार पर ही अपने कूटनीतिक या राजनीतिक फैसले ले रहे हैं। ट्रंप तो यहां तक दावा करते हैं कि उन्होंने भारत-पाकिस्तान के बीच संघर्ष विराम भी आर्थिक आधार पर कराया था। विश्व शांति के लिए आर्थिक आधार पूरी तरह से गलत नहीं है, पर आर्थिक आधार पर अगर पाकिस्तान जैसे आतंकवाद समर्थक देशों को भी चौतरफा लाभ मिलने लगे, तो चिंता वाजिब है।
ट्रंप की ओर से कमी यह रही है कि उन्होंने आतंकवाद समर्थक और आतंकवाद विरोधी, दोनों प्रकार के देशों से समान स्तर की मित्रता दर्शाने की चालाकी बरती है। जब ट्रंप पाकिस्तान के प्रति प्रेम का इजहार करते हैं, तब उनके स्वार्थ का व्यापार समझ में आता है। यह व्यापार ऐसा है, जो स्वयं अमेरिका पर भारी पड़ चुका है, पर वह समझने को तैयार नहीं है। ऐसा लगता है कि अमेरिका सबको साधकर चलना चाहता है, मतलब, सबसे लाभ उठाते हुए चलना चाहता है। समस्या तब होती है, जब उसकी नीति अपने लिए सबसे खास रहती है और दूसरों के लिए अलग या आम हो जाती है। फिलहाल, दुनिया की अनेक समस्याओं के लिए अमेरिकी अस्पष्टता जिम्मेदार है। एक कदम आगे और दो कदम पीछे खींचने की नीति किसी का भी भला नहीं कर रही है। टैरिफ चाहे जितना तय हो जाए, भारत को अपने अनुकूल फैसलों के लिए अमेरिका से दोटूक बातचीत जारी रखनी चाहिए। सतर्क रहना होगा, ताकि भारतीयों के हित प्रभावित न होने पाएं।







