बिहार में एनडीए एकजुट है तो अब महागठबंधन में भी एकजुटता दिखने लगी है. कांग्रेस के बदले तेवर से जो खतरा महागठबंधन में दिख रहा था, अब वह टलता नजर आ रहा है. दिल्ली में बिहार के नेताओं के साथ कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने 25 मार्च 2025 को हुई बैठक में ही स्पष्ट कर दिया था कि दिल्ली और हरियाणा वाली गलती पार्टी अब नहीं दोहराएगी. उसके बाद ही तेजस्वी यादव के नेतृत्व में आरजेडी के नेताओं ने 15 अप्रैल को दिल्ली जाकर राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे से मुलाकात की थी. दो दिन बाद 17 अप्रैल को पटना में महागठबंधन की 6 पार्टियों के नेता आरजेडी दफ्तर में जुटे और कोआर्डिनेशन कमिटी बनाने का निर्णय लिया. तेजस्वी को सीएम फेस घोषित करने पर निर्णय तो नहीं हुआ, लेकिन उन्हें कोआर्डिनेशन कमिटी की सदारत की जिम्मेदारी देकर इतना तो बता ही दिया गया कि देर-सवेर उन्हें महागठबंधन सीएम का चेहरा जरूर बनाएगा.
महागठबंधन उत्साहित
कोआर्डिनेशन कमिटी बनने के बाद महागठबंधन कुछ अधिक उत्साहित दिख रहा है. कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने 20 अप्रैल को बक्सर में नरेंद्र मोदी सरकार के 11 झूठ गिनाए तो प्रदेश कांग्रेस के नेता शकील अहमद खां ने सत्ता पक्ष की पोल खोल का संकेत दिया है. महागठबंधन कोआर्डिनेशन कमिटी की दो बैठकें लगातार होनी हैं. 23 अप्रैल को समन्वय समिति के लोग तेजस्वी यादव के आवास पर शाम में जुटेंगे और 24 को कांग्रेस कार्यालय सदाकत आश्रम में दिन भर बैठक होगी. शकील अहमद खां के मुताबिक उसी दिन महागठबंधन के नेता सत्ता पक्ष की पोल भी खोलेंगे. सनद रहे कि 24 को ही पीएम मोदी बिहार आ रहे हैं. मिथिलांचल या यूं कहें कि वे उत्तर बिहार के मधुबनी में यकीनन विपक्ष के खिलाफ गरजेंगे. शकील अहमद खां कहते हैं कि ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बार बार बिहार दौरे को लेकर कहा कि मोदी बार-बार बिहार आकर सिर्फ लोकलुभावन वादे करते रहते हैं. अब तक पूर्व में किए उनके वादे पूरे नहीं हुए.
पोल खोल की है तैयारी!
इसका अनुमान लगाना अधिक कठिन नहीं है. टुकड़े-टुकड़े में तेजस्वी यादव इसके संकेत देते रहे हैं. गुजरात के मुकाबले बिहार को मिली केंद्रीय मदद का लेखा-जोखा देकर महागठबंधन साबित करना चाहेगा कि बिहार के प्रति उदासीन हैं. इस क्रम में वे यह भी पूछ सकते हैं कि भोजपुर में पीएम मोदी ने जनता से पूछ-पूछ कर कि कितना चाहिए, उस दिन जितना देने की उन्होंने घोषणा की थी, उस पैसे का क्या हुआ. बिहार में अपराध और भ्रष्टाचार का मुद्दा उठा कर तेजस्वी यादव जरूर नीतीश कुमार की अचेत अवस्था का जिक्र करेंगे. इस क्रम में वे युवा नेतृत्व वाली सरकार बनाने का युवाओं को जरूरत भी समझा देंगे. पोल खोल में ढहते पुलों और ईडी की पकड़ में आए धन कुबेर सरकारी अफसरों के नाम और उनकी फेहरिस्त को जारी किया जा जा सकता है. अपराध के आंकड़े बता कर महागठबंधन के नेता लालू-राबड़ी राज और नीतीश कुमार के सुशासन के पोल खोल सकते हैं.
वंशवाद पर बोलती बंद
भाजपा लालू यादव की वंशवादी राजनीति को लेकर आरजेडी पर हमलावर थी. लोकसभा चुनाव में इसे मुद्दा बनाने की भाजपा पूरी तैयारी कर चुकी थी. प्रधानमंत्री मोदी से लेकर गृहमंत्री शाह तक बिहार आते ही लालू यादव की राजनीति में परिवारवाद पर खूब बोलते थे. तेजस्वी ने तरकीब निकाली. उन्होंने एनडीए नेताओं की परिवारवादी राजनीति की पोल खोल दी. राजद ने 2024 के लोकसभा चुनाव में उन एनडीए उम्मीदवारों का पूरा ब्यौरा सोशल मीडिया पर जारी कर दिया था कि कैसे पिता के बाद उनकी संतान राजनीति में हैं. सूची में जो कुछ प्रमुख नाम थे, उनमें पटना साहिब से पूर्व मंत्री और जनसंघ के संस्थापक सदस्य ठाकुर प्रसाद के बेटे रविशंकर प्रसाद (भाजपा), सासाराम- शिवेश राम- पूर्व केंद्रीय मंत्री मुन्नी लाल के बेटे (भाजपा), हाजीपुर- चिराग पासवान- रामविलास पासवान के बेटे (लोजपा-आर), जमुई- अरुण भारती- रामविलास पासवान के दामाद (लोजपा-आर), समस्तीपुर- शांभवी चौधरी- मंत्री अशोक चौधरी की बेटी और पूर्व मंत्री स्व महावीर चौधरी की पौत्री (लोजपा-आर) के नाम थे. सूची जारी होने के बाद भाजपा ने परिवारवादी राजनीति पर बोलना बंद कर दिया था.

सब तो ठीक, पर सीटें!
महागठबंधन में सीएम फेस को लेकर भले अब तक औपचारिक ऐलान न हुआ हो, पर तेजस्वी यादव को छोड़ कर दूसरे नाम की तो कल्पना ही नहीं की जा सकती. अब यह भी साफ हो गया है कि कांग्रेस का सारा टोटका सिर्फ सीटों के मोल-भाव के लिए था. कन्हैया कुमार का बिहार आना, प्रदेश अध्यक्ष का बदलना, पप्पू यादव को एआईसीसी की बैठक में बुलाना, राहुल गांधी का तीन महीने में तीन बार बिहार आना; ये सारे काम का सिर्फ एक ही मकसद था कि पिछली बार से बहुत ज्यादा सीटें न घटें, भले ज्यादा मिले-न मिले. अब तो यह भी लगने लगा है कि सीटों के लिए ही कांग्रेस ने सीएम फेस में पेच फंसा दिया है. यानी सीटों की संख्या तय होने तक महागठबंधन कोआर्डिनेशन कमिटी ही चलाएगी, जिसके अध्यक्ष सीएम पद के प्रबल दावेदार तेजस्वी यादव हैं.
क्यों हो रही है दिक्कत
दरअसल महागठबंधन में पहले से ही 5 पार्टियां थीं. लोकसभा चुनाव से मुकेश सहनी की विकासशील इंसान पार्टी (VIP) भी आ गई है. कभी एनडीए में रही राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी (RLJP) के नेता पूर्व केंद्रीय मंत्री पशुपति कुमार पारस को साथ लेने की शुरुआती बातचीत भी हुई है. यानी पिछले 5 के मुकाबले इस बार 7 दलों में सीटें बंटनी हैं. नए साथियों ने उलझा दिया है. पिछली बार 144 सीटों पर आरजेडी, 70 पर कांग्रेस, 19 पर सीपीआई एमएल और 10 पर दो अन्य वामपंथी पार्टियों- सीपीआई और सीपीएम के उम्मीदवार लड़े थे. इस बार कांग्रेस अभी तक 70 सीटों पर अड़ी है तो सीपीआई एमएल भी पहले से अधिक तो चाहेगा ही. उसका स्ट्राइक रेट औरों से बेहतर था. मुकेश सहनी डेप्युटी सीएम बनने के लिए 60 सीटों की मांग मीडिया के माध्यम से कर चुके हैं. पारस भी आफर जानने के लिए टकटकी लगाए हुए हैं.
समिति बनी, समन्वय!
कांग्रेस के शीर्षस्थ नेता मल्लिकार्जुन खड़गे की बक्सर में सभा की खाली कुर्सियों के सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो बता रहे हैं कि कुर्सियां खाली रह गईं. समन्वय समिति को अभी तक नहीं सूझा है कि चुनावी साल में अकेले-अकेले प्रयास का प्रयोग अच्छा नहीं माना जाएगा. बक्सर संसदीय सीट से आरजेडी के सुधाकर सिंह ही सांसद हैं. उनके पिता जगदानंद सिंह राजद के प्रदेश अध्यक्ष हैं. तेजस्वी अगर समन्वय समिति को लीड कर रहे हैं तो उन्हें साथी दलों की बड़ी सभाओं को सम्मिलित रूप से सफल बनाने का प्रयास भी करना चाहिए. अभी तक ऐसा नहीं दिख रहा. खड़गे की सभा का सूनापन से महागठबंधन को सबक लेनी चाहिए. इसका मैसेज ऐसे ही प्रसारित होता रहा तो परसेप्शन बिगड़ जाएगा.







