कर्नाटक में 2014 में शुरू हुआ जाति सर्वेक्षण अब चर्चा में है. यह सर्वे 2015 में हुआ था, लेकिन हाल ही में इसका डाटा लीक होने की खबरें हैं. इसकी रिपोर्ट में कई बड़े बदलावों की सलाह दी गई है, खासकर ओबीसी (पिछड़ा वर्ग) की जनसंख्या और उनके लिए आरक्षण को बढ़ाने की. लेकिन इस रिपोर्ट ने राजनीतिक और सामाजिक विवाद को जन्म दे दिया है.
1. ओबीसी की जनसंख्या में बड़ा इजाफा
सर्वे के मुताबिक, कर्नाटक में ओबीसी की जनसंख्या 69.6% है. यह पुराने अनुमानों से 38% ज्यादा है. यानी पहले के मुकाबले ओबीसी की संख्या बहुत बढ़ गई है. इस वजह से सरकार को सुझाव दिया गया है कि ओबीसी के लिए आरक्षण को बढ़ाया जाए.
क्या है सुझाव?
ओबीसी आरक्षण: अभी ओबीसी को 32% आरक्षण मिलता है, लेकिन रिपोर्ट में इसे बढ़ाकर 51% करने की सलाह दी गई है.
मुस्लिम आरक्षण: मुस्लिम समुदाय के लिए आरक्षण 4% से बढ़ाकर 8% करने का प्रस्ताव है.
लिंगायत और वोक्कालिगा: लिंगायत समुदाय के लिए 5% से 8% और वोक्कालिगा के लिए 4% से 7% आरक्षण बढ़ाने की बात है.
नई श्रेणी (I B): एक नई श्रेणी बनाई जाएगी, जिसमें कुरुबा जैसी जातियां शामिल होंगी. इसके लिए 12% आरक्षण का सुझाव है.
पुरानी श्रेणी (II A): इस श्रेणी का आरक्षण 15% से घटाकर 10% करने की सलाह है.
अन्य पिछड़ा वर्ग (I A): इनके लिए आरक्षण 4% से 6% करने का प्रस्ताव है.
अनुसूचित जाति (एससी) और जनजाति (एसटी): एससी की जनसंख्या 18.27% और एसटी की 7.15% है. इनके लिए आरक्षण 17% और 7% ही रहेगा.
सामान्य वर्ग: इनकी जनसंख्या 4.97% बताई गई है.
2. राजनीतिक विवाद
इस रिपोर्ट ने कर्नाटक में सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी में बंटवारा पैदा कर दिया है. कई बड़े नेता, खासकर लिंगायत और वोक्कालिगा समुदाय के, इस रिपोर्ट से नाराज हैं.
कांग्रेस में मतभेद
विरोध: लिंगायत और वोक्कालिगा समुदाय के नेता इस सर्वे पर सवाल उठा रहे हैं. उनका कहना है कि उनकी जनसंख्या को कम दिखाया गया है.
राजनीतिक चिंता: इन समुदायों के पास विधानसभा में अच्छी संख्या में सीटें हैं. उन्हें डर है कि इस सर्वे से उनकी राजनीतिक ताकत कम हो सकती है.
उपमुख्यमंत्री का रुख: डी.के. शिवकुमार (वोक्कालिगा नेता) पहले इस सर्वे के खिलाफ थे, लेकिन अब वे पार्टी के साथ चलने को तैयार हैं.
कैबिनेट की बैठक
17 अप्रैल को एक विशेष कैबिनेट बैठक होगी, जिसमें इस मुद्दे पर चर्चा होगी. मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने कहा है कि विधानसभा में भी इस पर बहस होगी.
3. लिंगायत और वोक्कालिगा का विरोध
कर्नाटक के दो बड़े समुदाय, लिंगायत और वोक्कालिगा, इस सर्वे से बहुत नाराज हैं.
उनकी शिकायतें
गलत आंकड़े: उनका कहना है कि उनकी जनसंख्या को कम दिखाया गया है. लिंगायत नेता एम.बी. पाटिल का दावा है कि उनकी जनसंख्या 70 लाख नहीं, बल्कि 1 करोड़ से ज्यादा है.
पुराना डेटा: यह सर्वे 2015 का है, इसलिए इसे पुराना और गलत बताया जा रहा है.
नया सर्वे की मांग: दोनों समुदाय चाहते हैं कि सरकार नया सर्वे कराए.
4. कुरुबा समुदाय पर विशेष ध्यान?
रिपोर्ट में एक नई श्रेणी (I B) बनाने की सलाह दी गई है, जिसमें कुरुबा समुदाय को 12% आरक्षण मिलेगा. कुरुबा मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की अपनी जाति है. कुछ कांग्रेस नेता इसे “पक्षपात” बता रहे हैं. उनका कहना है कि इससे कुरुबा को ज्यादा फायदा होगा, जबकि दूसरी जातियों का आरक्षण कम हो सकता है.
5. विपक्ष का रुख
बीजेपी और जेडी(एस) जैसे विपक्षी दल इस सर्वे को सिद्धारमैया का “राजनीतिक हथकंडा” बता रहे हैं.
उनकी आलोचना
मुस्लिम तुष्टिकरण: बीजेपी नेता आर. अशोक ने कहा कि यह सर्वे मुस्लिमों को “अधिक जनसंख्या” दिखाकर उनका तुष्टिकरण कर रहा है.
नया सर्वे की मांग: विपक्ष भी नया और वैज्ञानिक सर्वे चाहता है.
6. कानूनी और संवैधानिक चुनौतियां
रिपोर्ट में सुझाए गए 51% ओबीसी आरक्षण से कुल आरक्षण 50% की सीमा को पार कर जाएगा. सुप्रीम कोर्ट ने 1992 के इंद्रा साहनी मामले में 50% की सीमा तय की थी.
क्या हैं मुश्किलें?
कानूनी अड़चन: 50% से ज्यादा आरक्षण को लागू करने के लिए संवैधानिक संशोधन की जरूरत होगी.
ईडब्ल्यूएस कोटा: हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने 10% ईडब्ल्यूएस (आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग) कोटा को मंजूरी दी थी, जो 50% की सीमा को पार करता है. इसे आधार बनाकर कर्नाटक सरकार कोशिश कर सकती है.
केंद्र की भूमिका: इस बदलाव के लिए केंद्र की बीजेपी सरकार का समर्थन चाहिए होगा.
7. सिद्धारमैया का रुख
मुख्यमंत्री सिद्धारमैया इस सर्वे को लागू करने के लिए प्रतिबद्ध हैं.
उनकी बात
सामाजिक न्याय: सिद्धारमैया का कहना है कि जाति सर्वे से सामाजिक और आर्थिक स्थिति को समझने में मदद मिलेगी.
नया सर्वे का विकल्प: अगर विरोध बढ़ा, तो वे नया सर्वे कराने पर विचार कर सकते हैं.
8. डेटा पर सवाल
सर्वे को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं.
क्या हैं शिकायतें?
पुराना डेटा: यह सर्वे 10 साल पुराना है. 2015 के बाद जनसंख्या में बदलाव हो सकता है.
गलत तरीका: कुछ लोग सर्वे के तरीके को “अवैज्ञानिक” बता रहे हैं.
9. भविष्य की राह
यह सर्वे कर्नाटक की राजनीति और समाज के लिए बड़ा मुद्दा बन गया है. इसे लागू करने में कई चुनौतियां हैं:
राजनीतिक सहमति: कांग्रेस के अंदर और बाहर सहमति बनाना मुश्किल होगा.
कानूनी लड़ाई: 50% से ज्यादा आरक्षण को लेकर कोर्ट में चुनौती मिल सकती है.
सामाजिक तनाव: लिंगायत और वोक्कालिगा जैसे समुदायों का विरोध बढ़ सकता है.
राष्ट्रीय प्रभाव
कांग्रेस पूरे देश में जाति सर्वे और ओबीसी आरक्षण बढ़ाने की मांग कर रही है. कर्नाटक का यह सर्वे उस दिशा में एक कदम हो सकता है. लेकिन इसका असर राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ेगा.
कर्नाटक का जाति सर्वे सामाजिक न्याय की दिशा में एक बड़ा कदम हो सकता है, लेकिन यह विवादों से घिरा हुआ है. 17 अप्रैल की कैबिनेट बैठक और उसके बाद विधानसभा में होने वाली चर्चा से यह तय होगा कि सरकार इस रिपोर्ट को कैसे लागू करती है. यह मुद्दा न केवल कर्नाटक, बल्कि पूरे देश की राजनीति को प्रभावित कर सकता है.







