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कैसे घिरे तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि

UB India News by UB India News
April 16, 2025
in खास खबर, दक्षिण भारत
0
तमिलनाडु के राज्यपाल ने पांच ही घंटे में अपने ही फैसले को पलटा
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तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि को सुप्रीम कोर्ट से फटकार लगे अभी हफ्ता भी नहीं बीता और एक नया विवाद खड़ा हो गया। 12 अप्रैल को मदुरै के एक कॉलेज में उन्होंने छात्रों से ‘जय श्री राम’ के नारे लगवा दिए। विपक्षी पार्टियों का कहना है कि किसी संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति ऐसे धार्मिक नारे नहीं लगवा सकता, उन्हें इस्तीफा दे देना चाहिए।

‘जय श्री राम’ नारे पर मचा पूरा विवाद क्या है?

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तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि 12 अप्रैल 2025 को मदुरै के त्यागराज इंजीनियरिंग कॉलेज के एक कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में पहुंचे। उन्होंने साहित्य प्रतियोगिता के विजेताओं को पुरस्कार बांटे और वहां मौजूद लोगों को संबोधित किया।

राज्यपाल ने कम्ब रामायण लिखने वाले कवि चक्रवर्ती कम्बन के सम्मान में स्टूडेंट्स से आग्रह किया,

आइए हम उस व्यक्ति को श्रद्धांजलि अर्पित करें जो श्री राम का महान भक्त था। मैं कहूंगा और आप दोहराएंगे- जय श्री राम।

इसके बाद राज्यपाल आरएन रवि और स्टूडेंट्स ने तीन बार ‘जय श्री राम’ का नारा लगाया। तमिलनाडु गवर्नर का यह वीडियो सामने आने के बाद विवाद शुरू हो गया।

राज्यपाल के ‘जय श्री राम’ नारा लगवाने पर विवाद क्यों मच रहा है?

 इस वीडियो पर तमिलनाडु के स्टेट प्लेटफॉर्म फॉर कॉमन स्कूल सिस्टम यानी SPCSS-TN ने कहा कि राज्यपाल आरएन रवि ने अपने पद की शपथ का उल्लंघन किया है। SPCSS-TN के बयान की 3 प्रमुख बातें…

  • आरएन रवि ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 159 के तहत शपथ ली है और अपनी शपथ में उन्होंने प्रतिज्ञा ली कि वे अपनी पूरी क्षमता से संविधान और कानून का संरक्षण, सुरक्षा और बचाव करेंगे। वे तमिलनाडु के लोगों की सेवा और भलाई के लिए खुद को समर्पित करेंगे।
  • राज्यपाल को कॉलेज में साहित्यिक प्रतियोगिता के विजेताओं को पुरस्कार देने के लिए मुख्य अतिथि के तौर पर बुलाया गया था। उन्हें किसी खास धर्म के प्रचारक के तौर पर आमंत्रित नहीं किया गया था। उन्हें धार्मिक उपदेश देने के लिए नहीं कहा गया था।
  • राज्यपाल रवि तमिलनाडु के स्कूलों और कॉलेजों में अपनाए जाने वाले पाठ्यक्रम और सिलेबस से अनजान हैं। अपनी अज्ञानता और अहंकार के कारण वह शांति भंग करने और एक समूह को दूसरे के खिलाफ भड़काने के उद्देश्य से गलत विचारों का प्रचार कर रहे हैं।

आरएन रवि संवैधानिक पद पर हैं। उन्हें ऐसे काम शोभा नहीं देते। रवि किसी धार्मिक नेता की तरह बोल रहे हैं। वे RSS और भाजपा के प्रचार मास्टर बन गए हैं।

वहीं, DMK प्रवक्ता धरणीधरन ने कहा, ‘यह देश के धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के खिलाफ है। राज्यपाल बार-बार संविधान का उल्लंघन क्यों करना चाहते हैं? उन्होंने अभी तक इस्तीफा क्यों नहीं दिया है? वह आरएसएस के प्रवक्ता हैं। हम जानते हैं कि उन्होंने देश के संघीय सिद्धांतों का उल्लंघन कैसे किया और सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें उनकी जगह कैसे दिखाई है।’

क्या होता है संवैधानिक पद, जिसका जिक्र इस विवाद में सभी लोग कर रहे हैं?

संवैधानिक पदों को भारतीय संविधान में स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है। यह पद देश के शासन, न्याय और प्रशासन को बेहतर तरीके से चलाने के लिए बनाए गए हैं। इन पदों पर बैठे लोगों कh विशेष शक्तियां और जिम्मेदारियां होती हैं और उन्हें संविधान द्वारा सुरक्षा दी जाती है।

मसलन- इनमें से कुछ पदों पर बैठे व्यक्ति को सिर्फ संसद के विशेष प्रस्ताव यानी महाभियोग से ही हटाया जा सकता है। संविधान के अनुच्छेद 52, 74, 124, 148 में संवैधानिक पदों का उल्लेख किया गया है।

क्या राज्यपाल जैसे संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति ‘जय श्री राम’ का नारा नहीं लगवा सकते?

संविधान विशेषज्ञ और लोकसभा के महासचिव रहे पीडीटी आचार्य बताते हैं, ‘भारत एक सेक्युलर देश है और सेक्युलरिज्म भारत के संविधान के बेसिक स्ट्रक्चर में है। राष्ट्रपति, राज्यपाल जैसे संवैधानिक पद पर बैठे लोग संविधान की रक्षा की शपथ लेते हैं, इसलिए उन्हें एक खास धर्म की बातें या नारे सार्वजनिक तौर पर नहीं कहना चाहिए।’

सुप्रीम कोर्ट के वकील और संविधान के जानकार विराग गुप्ता कहते हैं,

राज्यपाल को कैसे और क्या बोलना चाहिए, इस बारे में संविधान या किसी कानून में जिक्र नहीं है। संविधान के अनुच्छेद-19 के तहत राज्यपाल को भी अभिव्यक्ति की आजादी है। जय श्रीराम बोलना संविधान विरोधी भी नहीं है, लेकिन राज्यपाल के पद पर आसीन व्यक्ति अगर कुछ बोलता है, तो उससे दूसरे धर्म के लोगों को ये एहसास नहीं होना चाहिए कि ये धर्म के आधार पर पक्षपात कर सकते हैं। इसलिए ऐसे नारों से राज्यपाल के पद की संवैधानिक गरिमा का हनन होता है।

संविधान के जानकार और मध्यप्रदेश विधानसभा के पूर्व प्रमुख सचिव भगवानदेव इसरानी कहते हैं…

  • भारत में जब भी किसी व्यक्ति को संवैधानिक पद मिलता है, तो उन्हें भारतीय संविधान के अनुच्छेद 159 के तहत शपथ दिलाई जाती है। इसमें वे प्रतिज्ञा लेते हैं कि संविधान की रक्षा करेंगे और उल्लंघन नहीं करेंगे।
  • भारत के संविधान में अलग-अलग जगहों पर सेक्युलर और सेक्युलरिज्म का जिक्र है। संविधान की उद्देशिका में भी ‘सेक्युलर’ शब्द का इस्तेमाल किया गया है।
  • संविधान के आर्टिकल 25, 26, 27 और 28 नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देते हैं। ऐसे में संवैधानिक व्यक्ति और सरकार किसी भी धर्म का प्रचार या पक्ष नहीं ले सकते। ये उनकी नैतिक बाध्यता है।

26 जनवरी 1950 में भारत का संविधान लागू हुआ था, तब इसमें ‘सेक्युलर’ यानी ‘धर्मनिरपेक्ष’ का कहीं उल्लेख नहीं किया गया, लेकिन 1976 में 42वें संविधान संशोधन में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने ‘सेक्युलर’ शब्द जुड़वा दिया, जिसका हिंदी में अर्थ ‘धर्मनिरपेक्ष’ नहीं बल्कि ‘पंथनिरपेक्ष’ लिखा गया।

‘धर्मनिरपेक्ष’ का मतलब है कि राज्य किसी भी धर्म को प्राथमिकता नहीं देता और धर्म से अलग रहकर काम करता है। जबकि ‘पंथनिरपेक्ष’ का मतलब होता है कि सरकार किसी भी पंथ या संप्रदाय के लिए पक्षपात नहीं करती और सभी को समान रूप से देखती है। यानी सरकार किसी खास धार्मिक गुट यानी शैव, वैष्णव, शिया या सुन्नी का पक्ष नहीं लेगी।

इन दिनों संवैधानिक पदों पर बैठे लोग ‘पंथनिरपेक्ष’ व्यवहार क्यों नहीं दिखाते?

पॉलिटिकल एक्सपर्ट रशीद किदवई कहते हैं, ‘किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति की पंथनिरपेक्षता उसका व्यक्तिगत फैसला है। पहले पंडित नेहरू, इंदिरा गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी और अब नरेंद्र मोदी या योगी आदित्यनाथ का धर्म को लेकर अलग-अलग नजरिया है। संविधान में धार्मिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेना या न लेने का जिक्र नहीं है। पहले धार्मिक गतिविधियों को संविधान के खिलाफ समझा जाता था और अब इसे संवैधानिक पद पर रहते हुए किया जाता है।’

रशीद किदवई कहते हैं, ‘भारत की राजनीति के कई दौर रहे। पहले सेक्युलरिज्म को महत्व दिया जाता था और अब हिंदुत्व को, यानी जिसकी लाठी उसकी भैंस। धर्म के नाम पर राजनीति चरम पर है। इस कारण इसका जमकर फायदा उठाया जा रहा है। संविधान में इसका जिक्र नहीं होना सोने पर सुहागा हो गया है।’

भारत में संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के धार्मिक व्यवहार का विवाद कितना पुराना है?

पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का मानना था कि संवैधानिक पद पर पदस्थ व्यक्ति को न्यूट्रल रहना चाहिए। उसे किसी धार्मिक गतिविधि, आयोजन या धार्मिक स्थलों पर नहीं जाना चाहिए। इससे अन्य धर्मों के लोगों में गलत संदेश जाता है। इससे ऐसा लगता है कि वह व्यक्ति किसी खास धर्म का प्रचार कर रहा है। इससे जुड़ा एक किस्सा भी है…

वरिष्ठ पत्रकार दुर्गा दास की किताब ‘इंडिया फ्रॉम कर्जन टु नेहरू’ के मुताबिक, मई 1950 में तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को गुजरात के सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन पर जाने का निमंत्रण मिला, लेकिन तब के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इस पर एतराज जताया। नेहरू का मानना था कि राष्ट्रपति के किसी मंदिर के कार्यक्रम में जाने से दूसरे धर्म के लोगों में गलत संदेश जाएगा। लेकिन प्रसाद नेहरू की इच्छा से सहमत नहीं हुए। प्रसाद ने कहा,

मैं अपने धर्म में विश्वास करता हूं और अपने आप को इससे अलग नहीं कर सकता। मैंने सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार के उद्धाटन समारोह को सरदार पटेल और नवांनगर के जामसाहेब की उपस्थिति में देखा है।

राजेंद्र प्रसाद के इस जवाब से नेहरू बेहद नाराज हुए थे। नेहरू ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को निर्देश दिए थे कि इस मौके पर राजेंद्र प्रसाद के दिए गए भाषण को सरकारी माध्यमों में कवर न किया जाए।

मई 1950 की तस्वीर। तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन समारोह में पूजा करते हुए।
मई 1950 की तस्वीर। तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन समारोह में पूजा करते हुए।

इन दिनों विवादों में रहने वाले तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि कौन हैं?

आरएन रवि ने पत्रकारिता से अपने करियर की शुरुआत की। इसके बाद वे IPS ऑफिसर बने और अब तमिलनाडु के राज्यपाल हैं…

आरएन रवि पहले भी कई बड़े विवादों में घिर चुके हैं…

  • विधानसभा से वॉकआउट: जनवरी 2023 में राज्यपाल रवि ने तमिलनाडु विधानसभा के उद्घाटन सत्र में राज्य सरकार के भाषण को पढ़ने से इनकार कर दिया और सदन से वॉकआउट कर गए। इस घटना को मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने लोकतांत्रिक परंपराओं का उल्लंघन बताया।
  • राष्ट्रगान विवाद और वॉकआउट: 6 जनवरी 2024 को राज्यपाल ने विधानसभा सत्र की शुरुआत में राष्ट्रगान न बजाने पर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि सत्र की शुरुआत और अंत दोनों में राष्ट्रगान बजाया जाना चाहिए। उन्होंने सरकार के अभिभाषण के कुछ हिस्सों को नैतिक और तथ्यात्मक आधार पर अस्वीकार करते हुए भाषण पूरा नहीं किया और सदन से वॉकआउट कर गए।
  • सरकार ने राज्यपाल हटाने की मांग कीः 2022 में सीएम एमके स्टालिन की पार्टी DMK ने राष्ट्रपति से राज्यपाल रवि को हटाने की मांग की थी। स्टालिन सरकार ने राज्यपाल रवि को हटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में भी याचिका लगा चुकी है। हालांकि, 3 जनवरी 2025 को याचिका खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘हम इस तरह के मामले में कोई आदेश नहीं दे सकते हैं।’
  • सुप्रीम कोर्ट से फटकारः 8 अप्रैल 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल के पास कोई वीटो पावर नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के जरूरी बिलों को राज्यपाल की ओर से रोके जाने को अवैध बताया और कहा, ‘विधानसभा से पास बिल पर राज्यपाल एक महीने के भीतर कदम उठाएं।’ तमिलनाडु की स्टालिन सरकार ने गवर्नर आरएन रवि के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। स्टालिन सरकार ने कहा, 10 बिलों को बिना कारण बताए विधानसभा लौटा दिया है। वहीं 2 बिलों को राष्ट्रपति के पास भेज दिया है।

क्या हालिया विवादों के बाद राज्यपाल आरएन रवि को इस्तीफा देना पड़ सकता है?

 राज्यपाल के पक्षकारों की तरफ से 2 तर्क दिए जा सकते हैं। पहला- राज्यपाल ने गैर-शासकीय कार्यक्रम में यह नारा लगवाया, जिससे संविधान का कोई उल्लंघन नहीं होता। दूसरा- कार्यक्रम का विषय कम्ब रामायमणम था, जिसमें नारा लगवाते हुए कहा कि राम के महान भक्त को श्रद्धांजलि दी जानी चाहिए।

विराग गुप्ता कहते हैं,

चार दशक पुरानी सरकारिया आयोग की रिपोर्ट से साफ है कि राज्यपाल केंद्र सरकार के प्रतिनिधि के बजाय सत्तारुढ़ पार्टी के एजेंट के तौर पर काम करने लगे। विधानसभा से पारित बिलों की मंजूरी में विलम्ब के लिए सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु के राज्यपाल की कठोर निंदा की है। उसके बावजूद उन्होंने इस्तीफा नहीं दिया। इसलिए जय श्री राम के नारे पर विवाद के आधार पर उनसे त्यागपत्र की अपेक्षा नहीं की जा सकती।

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