बिहार विधानसभा चुनाव से पहले सियासी पारा सातवें आसमान पर है. राजद – कांग्रेस बीजेपी और जदयू को बैकफुट पर धकेलने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन पहले वक्फ बोर्ड बिल और अब मुस्लिम आरक्षण का शोर जिस तरह उठ रहा है, वह बिहार में तेजस्वी यादव के सीएम बनने के सपने पर पानी फेरने वाला है. डीके शिवकुमार ने मुस्लिम आरक्षण, संविधान बदलने को लेकर कथित तौर पर जो बयान दिया, वह कांग्रेस के पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है. आइए समझते हैं कैसे?
आपको याद होगा कि 2015 में बिहार विधानसभा चुनाव से पहले आरएसएस चीफ मोहन भागवत ने आरक्षण की समीक्षा वाला बयान दिया था. इस पर खूब हंगामा मचा. विपक्षी दलों ने मुद्दा बनाया कि बीजेपी आरक्षण को खत्म करना चाहती है. बाद में भागवत दावा करते रहे कि उन्होंने आरक्षण खत्म करने की बात कभी नहीं कही. बीजेपी कहती रही कि आरक्षण कोई खत्म नहीं कर सकता, इसके बावजूद विपक्ष अपनी बात जनता तक पहुंचाने में कामयाब रहा और बीजेपी को काफी नुकसान उठाना पड़ा. अब कुछ ऐसी ही स्थिति राहुल गांधी और तेजस्वी यादव के लिए बीजेपी बना रही है.
राहुल गांधी से छिन जाएगा बड़ा मुद्दा?
कर्नाटक के डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार ने मुस्लिम आरक्षण को लेकर कथित तौर पर संविधान बदलने की वकालत की तो बीजेपी पूरे जोर शेर के साथ सामने आ गई. बीजेपी नेताओं ने कहा, कांग्रेस की सोच यही है. वे ओबीसी का रिजर्वेशन छीनकर मुस्लिमों को देना चाहते हैं. हम ऐसा नहीं होने देंगे. संसदीय कार्यमंत्री किरण रिजिजू ने इसे संसद में उठा दिया. अब कांग्रेस सफाई देती फिर रही है कि डीके शिवकुमार ने ऐसा नहीं कहा. सूत्रों के मुताबिक- बाद में शिवकुमार से स्पष्टीकरण भी मांगा गया. कांग्रेस समझती है कि अगर इसे नहीं संभाला गया तो जिस संविधान की दुहाई राहुल गांधी हर सभा में देते हैं, वही मुद्दा खत्म हो जाएगा. इतना ही नहीं, बीजेपी इस पर हमलावर रहेगी.
दूसरी मुसीबत वक्फ बोर्ड
अब दूसरा मुद्दा, वक्फ बोर्ड बिल का है. जब वक्फ बोर्ड बिल पर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने दिल्ली में रैली की तो सभी विपक्षी दलों के नेता उनके समर्थन में आ गए. लेकिन अब वही ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ऐलान कर रहा है कि वह बिहार में बड़ी रैलियां करेगा. बिहार इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि वहां चुनाव होने हैं. ऐसे में बीजेपी लोगों को यह समझाने की कोशिश कर रही है कि जहां भी बीजेपी को हराना होता है, विपक्षी दल और मुस्लिम संगठन एक साथ हो जाते हैं. इस बार बिहार में वही कोशिश की जा रही है. इस कोशिश के जरिए बीजेपी हिन्दुओं को एकजुट करने के प्रयास में है. अगर ऐसा हुआ तो धर्म के आगे जाति की बाधाएं टूट जाएंगी जो उसे फायदा पहुंचाएगी. जातिगत खांचे में बंटी बिहार की राजनीति बिहार को अक्सर परेशान करती है.
बिहार में आरक्षण इतना बड़ा मुद्दा क्यों हो जाता है
1. बिहार की आबादी में पिछड़ा वर्ग (OBC), अति पिछड़ा वर्ग (EBC), अनुसूचित जाति (SC), और अनुसूचित जनजाति (ST) की संख्या काफी अधिक है. ये वर्ग आरक्षण के सबसे बड़े लाभार्थी हैं, इसलिए किसी भी चुनाव में आरक्षण पर उठने वाली बहस का सीधा असर वोटरों पर पड़ता है.
2.1990 के दशक में बिहार मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू करने वाला पहला राज्य बना, जिससे पिछड़े वर्गों को 27% आरक्षण मिला. इसके बाद लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार जैसे नेताओं ने खुद को सामाजिक न्याय के पैरोकार के रूप में स्थापित किया और यह मुद्दा बिहार की राजनीति में केंद्रीय बन गया. इसलिए यह आरक्षण की राजनीति का केंद्र भी है.
किसके पास किस वर्ग का समर्थन
सबसे खास बात, बिहार की राजनीति जाति आधारित समीकरणों पर निर्भर करती है. लालू प्रसाद यादव की पार्टी आरजेडी OBC, खासकर यादव और मुस्लिम वोट बैंक पर निर्भर है. जबकि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी JDU अति पिछड़ा वर्ग (EBC) और कुर्मी जाति के समर्थन से जीतती रही है. बीजेपी को सवर्ण और अन्य हिंदू वोटरों का भरपूर समर्थन मिलता रहा है. किसी के भी पाले से कोई भी वोट खिसका तो उसका बड़ा नुकसान तय है.







