बिहार में इसी साल चुनाव है. सभी पार्टियां अपनी अपनी धमक बढ़ाने के लिए कमर कस चुकी है लेकिन महागठबंधन के साथ चुनाव लड़ने वाली कांग्रेस क्या इस बार अपने दम पर चुनाव मैदान में जाएगी, यह सवाल जरूर सबके मन में कौंध रहा है. यह सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि पहले बिहार के कांग्रेस प्रभारी बदले गए हैं. फिर लालू परिवार के करीबी माने जाने वाले कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष भी बदल दिए गए. यहां तक कि कन्हैया कुमार की ‘बिहार में पलायन रोको नौकरी दो’ यात्रा चल रही है लेकिन महागठबंधन के नेताओं को पूछा तक नहीं गया है. क्या ये कांग्रेस का संकेत है जिसमे कांग्रेस बी टीम के साये से बाहर आना चाहती है.
बिहार में चुनाव का ऐलान भले ही नहीं हुआ है लेकिन उसकी आहट अभी ही दिखने लगी है. सभी पार्टियां ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतें, इसके लिए जोर आजमाइश भी शुरू हो चुकी है. क्या इस बार कांग्रेस अपने दम पर चुनाव मैदान में जाएगी, इसके संकेत साफ दिखाई देने लगे हैं.
आरजेडी के साये से बाहर निकलना चाहती है कांग्रेस
हैरानी की बात यह है कि बिहार में कांग्रेस के पहले ऐसे प्रभारी हैं कृष्णा अल्लावरु जो बिहार आने के बाद लालू परिवार से मिलने नहीं गए. इससे पहले जो भी बिहार में कांग्रेस का प्रदेश प्रभारी हुआ लालू के आशीर्वाद के बिना कांग्रेस दफ्तर नहीं जाते थे. वहीं अखिलेश प्रसाद सिंह को लालू परिवार के करीबी होने का खामियाजा भुगतना पड़ा. कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष पद से हटना पड़ा. दरअसल, महागठबंधन में कांग्रेस को हमेशा आरजेड़ी की पिछलग्गू पार्टी कहा जाता है. ऐसे में इस साये से कांग्रेस खुद को बाहर निकालना चाहती है. माना जा रहा है कि महागठबंधन में अगर सीटों का तालमेल गड़बड़ हुआ तो कांग्रेस दिल्ली वाला रुख बिहार में भी अपना सकती है. इसके संकेत साफ साफ दिख रहे हैं.
इस बात से इनकार भी नहीं किया जा सकता है कि अगर कांग्रेस ने अलग राह अपनाई तो आरजेडी के लिए मुश्किल पैदा हो सकती हैं. लिहाजा कांग्रेस एक तीर से दो निशान करके लालू यादव को उनको उनकी जमीनी हकीकत भी बता सकती है और बी टीम के साये से बाहर भी आ सकती है.







