राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर ने फरवरी 2023 से लेकर 2024 के अंत तक, केरल जाने तक लगभग 22 महीने तक बिहार के राज्यपाल के रूप में कार्य किया. बिहार में भी उनके कार्यकाल और गतिविधियों को विवादों से मुक्त नहीं कहा जा सकता है. शैक्षणिक जगत में उनके निर्देश में जो बदलाव हुए, उनसे बिहार के राजनीतिज्ञों को ही नही, अफसरशाही को भी दिक्कत होती रही. शिक्षा विभाग में जब केके पाठक की नियुक्ति हुई थी, उस दौर में शिक्षा विभाग और राजभवन के बीच का गतिरोध स्पष्ट ही रहा. इसके अलावा बीच में राजद के समर्थन वाली सरकार बिहार में थी तो राजद नेता चंद्रशेखर यादव शिक्षा मंत्री थे. शिक्षा के क्षेत्र में किसी काम के बदले उन्हें “रामचरितमानस” पर विवादित बयान देने के लिए याद किया जाता है. ये वो दौर था जब उच्च शिक्षा के क्षेत्र में बिहार के विश्वविद्यालयों की दशा सुधारने के लिए राज्यपाल आर्लेकर लगातार काम कर रहे थे.
निवर्तमान राज्यपाल राजेंद्र आर्लेकर और सरकारी रिश्ते
राजेंद्र आर्लेकर ने 17 फरवरी, 2023 को फागू चौहान के स्थान पर बिहार के 41वें राज्यपाल के रूप में शपथ ली थी. शपथ पटना उच्च न्यायालय के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश चक्रधारी शरण सिंह ने दिलाई थी. उनकी नियुक्ति एक फेरबदल का हिस्सा थी. वे पहले हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल थे. अपने कार्यकाल के दौरान, आर्लेकर बिहार में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय रूप से सक्रिय थे. वे राज्य के विश्वविद्यालयों को बेहतर बनाने के उद्देश्य से हुए कई निर्णयों में शामिल थे, जिसमें नालंदा विश्वविद्यालय के नए परिसर का उद्घाटन और दीक्षांत समारोह और सम्मेलन जैसे विभिन्न शैक्षणिक कार्यक्रमों में भाग लेना शामिल था. उनके कार्यकाल में संघर्ष भी हुए, खासकर शिक्षा विभाग के तत्कालीन अतिरिक्त मुख्य सचिव केके पाठक के साथ. शैक्षिक नीतियों और विश्वविद्यालय प्रशासन पर उनकी असहमति की व्यापक रूप से रिपोर्ट की गई, जिसके परिणामस्वरूप महत्वपूर्ण प्रशासनिक चर्चाएं और कार्यवाहियां हुईं.
अति-सक्रिय थे राज्यपाल आर्लेकर
बिहार में राज्यपाल आर्लेकर के समय में प्रमुख राजनीतिक हस्तियों के साथ बातचीत महत्वपूर्ण रही. उदाहरण के लिए, उन्होंने बिहार के सीएम नीतीश कुमार से कई मौकों पर मुलाकात की. राज्य के समारोहों के दौरान और जब राजनीतिक गठबंधनों पर चर्चा हो रही थी या बदलाव हो रहे थे, उस दौर में वो नीतीश कुमार से मिलते रहे. उनकी आखिरी उल्लेखनीय सार्वजनिक बातचीत तब हुई जब उन्होंने पटना में राजभवन में बिहार के नवनियुक्त राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान और निवर्तमान सीएम नीतीश कुमार से मुलाकात की. वे सांस्कृतिक आदान-प्रदान में शामिल थे, जैसे कि भगवान बुद्ध के अवशेषों को थाई प्रधान मंत्री को सौंपना, भी उनके कार्यकाल में ही हुआ. ये उनके राज्यपाल पद के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय संपर्क करने के पहलू को भी प्रदर्शित करता है. बिहार में राज्यपाल आर्लेकर का कार्यकाल तब समाप्त हुआ जब उन्हें 24 दिसंबर, 2024 को केरल के राज्यपाल के रूप में स्थानांतरित कर दिया गया.
अब आरिफ मोहम्मद खान बिहार के राज्यपाल का पदभार संभाल रहे हैं. आर्लेकर के प्रस्थान को औपचारिक विदाई के साथ चिह्नित किया गया, जिसमें पटना हवाई अड्डे पर गार्ड ऑफ ऑनर भी शामिल था. आरिफ मोहम्मद खान के बिहार पहुंच जाने की वजह से ही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अपनी यात्रा को संक्षिप्त कर लौट आए, क्योंकि प्रोटोकॉल के तहत उनका आना जरूरी था. इसके साथ ही उन्होंने उन कयासबाजियों को भी बंद करने का उद्योग किया, जिसमें एनडीए के अंदर बिहार में खींचतान की बातें चल रही थीं. गोवा के पणजी में 23 अप्रैल, 1954 को जन्मे आर्लेकर बचपन से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े रहे हैं. वे 1989 में भाजपा में शामिल हुए और 1980 के दशक से गोवा भाजपा के सक्रिय सदस्य रहे हैं. आर्लेकर 2002 में दक्षिण गोवा में वास्को दा गामा निर्वाचन क्षेत्र से विधायक चुने गए थे. उन्होंने गोवा में भाजपा के महासचिव और बाद में भाजपा की दक्षिण गोवा जिला इकाई के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया. उन्हें 2012 में गोवा विधानसभा के अध्यक्ष के रूप में चुना गया, इस पद पर वे 2015 तक रहे. इस दौरान, उन्हें गोवा विधानसभा को कागज रहित बनाने का श्रेय दिया गया, जिससे डिजिटल कार्यवाही शुरू हुई. इस परिचय को बताने का उद्देश्य यही है कि आर्लेकर एक तो भाजपा से बहुत गहरे जुड़े हुए हैं, दूसरे उनको सक्रियता पसंद है, चाहे पद कोई भी हो. शायद यही वजह रही कि बिहार के शिक्षा विभाग में उनके रहते कई नयी चीजें भी हुईं और उनकी खींचतान अफसरशाही से चलती भी रही.
फेरबदल राजनीतिक-रणनीतिक समायोजन
राज्यपाल अर्लेकर को 24 दिसंबर, 2024 को, केरल का राज्यपाल नियुक्त किया गया, जहां वे आरिफ मोहम्मद खान की जगह लेंगे, जिन्हें बिहार का राज्यपाल नियुक्त किया गया है. यह फेरबदल राज्य के विधानसभा चुनावों से पहले राजनीतिक रणनीति समायोजन का हिस्सा माना जा रहा है. उनके तबादले के साथ ही नीतीश कुमार के भाजपा के साथ संबंधों पर भी चर्चा और अफवाहों का बाजार गर्म होने लगा. आर्लेकर को उन राज्यों में शैक्षिक सुधारों की दिशा में उनके प्रयासों के लिए पहचाना जाता है जहाँ उन्होंने विशेष रूप से विधायी कार्यवाही और विश्वविद्यालय प्रशासन को अधिक कुशल बनाने के लिए राज्यपाल के रूप में कार्य किया. हिमाचल और बिहार में उनका कार्यकाल विवादों से अछूता नहीं रहा. बिहार में, शैक्षिक नीतियों पर राज्य के अधिकारियों के साथ उनकी असहमति उल्लेखनीय थी. इसी तरह, उनकी प्रशासनिक शैली और निर्णयों ने कभी-कभी सार्वजनिक और राजनीतिक बहस को जन्म दिया है. आर्लेकर के राजनीतिक करियर में गोवा की स्थानीय राजनीति से राज्य स्तर पर महत्वपूर्ण पदों तक और अंततः तीन अलग-अलग राज्यों में राज्यपाल की भूमिका तक उनका उत्थान ध्यान देने लायक है. भाजपा और आरएसएस के साथ उनका जुड़ाव निरंतर बना रहा है, जिसने उनके पूरे करियर में उनके राजनीतिक रुख और निर्णयों को प्रभावित किया है.
आरिफ मोहम्मद की नियुक्ति में विशेष क्या है?
आरिफ मोहम्मद खान की नियुक्ति की आधिकारिक घोषणा भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 24 दिसंबर, 2024 को की. महामहिम खान ने 2 जनवरी, 2025 को पटना के राजभवन में बिहार के 42वें राज्यपाल के रूप में पद की शपथ ली. पटना उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन ने उन्हें शपथ दिलाई. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और राज्य के अन्य मंत्री इस अवसर पर उपस्थित थे. राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान की नियुक्ति ने राज्य विधानसभा चुनावों के मद्देनजर राजनीतिक बहस छेड़ दी है. पर्यवेक्षक इसे बिहार में मुस्लिम मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए द्वारा एक रणनीतिक कदम के रूप में देखते हैं. राज्यपाल खान की एक सुधारवादी मुस्लिम व्यक्ति के रूप में प्रतिष्ठा को देखते हुए ऐसा कहा तो जा रहा है. हालांकि, केरल में उनका कार्यकाल विवादों से भरा रहा, जिसके कारण बिहार की राजनीति पर उनके प्रभाव को लेकर राजद और कांग्रेस जैसे विपक्षी दलों अपना संदेह दर्शाने से चूके नहीं हैं.
पदभार ग्रहण करने के तुरंत बाद, आरिफ खान ने पूर्व राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को पुष्पांजलि अर्पित की और राजद नेता राबड़ी देवी के जन्मदिन पर उनसे मिलने गए, जो बिहार में प्रमुख राजनीतिक हस्तियों के साथ सौहार्दपूर्ण संबंध स्थापित करने के उनके प्रयास का संकेत है. हालांकि, लालू से उनकी मुलाकात ने फिर से उन अफवाहों को भी हवा दे दी जो बिहार में ‘कुछ तो परिवर्तन’ होनेवाला है की माला रट रहे थे. पिछले राज्यपाल अर्लेकर की तुलना में आरिफ मोहम्मद खान का लम्बा राजनीतिक जीवन बदलावों से भरा रहा है. इसकी शुरुआत अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में एक छात्र नेता के रूप में हुई थी. वे कांग्रेस, जनता दल, बसपा और भाजपा सहित कई राजनीतिक दलों से जुड़े रहे हैं, जहां उन्होंने विभिन्न मंत्री पदों पर कार्य किया है. बिहार में उनकी नियुक्ति केरल के राज्यपाल के रूप में पांच साल के कार्यकाल के बाद हुई है, जहाँ वे राज्य सरकार के साथ अपने विवादास्पद संबंधों के लिए जाने जाते थे. यानी, सक्रिय तो महामहिम खान भी रहते रहे हैं, लेकिन उनकी शैली समायोजन की भी है. खासकर, नीतीश कुमार से उनके काफी ठीक संबंध हैं और चुनावी साल में भाजपा अपने सभी कल-पुर्जे शायद कस रही है.
बिहार में 26 साल तक मुस्लिम राज्यपाल के बिना रहने के बाद खान का राज्यपाल बनना एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, लेकिन चुनावों से पहले राजनीतिक निहितार्थ और शासन के प्रति उनके दृष्टिकोण पर बारीकी से नज़र रखी जाएगी.







